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कौन रोक पायेगा उस ज्वाला को
जो शुरू हुई थी एक चिंगारी कि तरह
पर चली है आज जलाने को यह दुनिया
किये बिना किसी रीती रिवाज़ कि परवाह

कौन रोक पायेगा उस तूफानी नदी को
जो शुरू हुई थी एक हिमनद के ज़रिये
पर आज चली है तबाह करने
पितृसत्ता कि खोखली जड़ों को

कौन रोक पायेगा उस चक्रवात को
जो शुरू था हवा के झोंके से
पर आज चली है मिटाने लिंग भेद को
लोक सत्ता का सही मतलब बताने

कौन रोक पायेगा, कौन रोक पायेगा
जब शुरू हो जायेगा एक परिवर्तन इस भ्रमांड में
जब जाग जायेगी हर वो सोई भावना
बदल जायेगी हर प्रथा, हर रसम

शुरू हो चुकी है यह कहानी
शायद अभी नहीं सुनी है तुमने
जब चलेगा संपूर्ण बदलाव का चक्र
सोये नहीं रेह पाओगे


Disclaimer: This poem was previously published on the author’s blog here

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