By संजय स्वतंत्र

शब्द यात्रा करते हैं। खुद को घिसते हैं, मांजते हैं। न जाने कहां-कहां से घूमते-घामते हुए जब वे मन के प्लेटफार्म पर पहुंचते हैं, तो एक यात्रा शुरू होती है विचारों की। यह कविता के स्टेशन पर पहुंचती हैं या फिर कहानी और उपन्यास के स्टेशन पर। रास्ते में व्यंग्य का पड़ाव आता है। नाटकों की भी मंजिल आती है। आलोचना-शोध तो बड़े स्टेशन हैं। आज के दौर के तमाम लेखक इन्हीं स्टेशनों को अपना लक्ष्य बनाते हैं। बाल साहित्य वाले स्टेशन पर तो कोई रुकता ही नहीं। छोटा स्टेशन है न! इसलिए बड़े लेखक किशोरों और युवा पीढ़ी के लिए साहित्य रचने को महत्त्व नहीं देते। और जो लिख रहे हैं, उन्हें कोई पूछता नहीं।

ऐसे में काशी की युवा लेखिका स्वाती सिंह ने एक सार्थक पहल की है। उनकी लिखी किताब – ‘कंट्रोल Z’ का ताना-बाना कोई डेढ़ साल पहले बुना गया, जब वे एक वेबसाइट के लिए नो योर लीडर नाम से नियमित रूप से एक कॉलम लिख रही थीं। महापुरुषों पर कई आलेख लिखने के बाद एक दिन उन्होंने मुझसे कहा – आज के किशोरों के सामने कई चुनौतियां हैं। अभिभावक अपनी उम्मीदें उन पर थोप रहे हैं। लिहाजा उनके जीवन-आदर्श बदल रहे हैं। फिर क्यों न उन्हें प्रेरित करने के लिए उनके नए आदर्शों के बारे में लिखा जाए। ये आदर्श ऐसे हैं, जिन पर देश गर्व करता है। कुछ ऐसे हैं, जो इतिहास के पन्नों में गुम हो गए, लेकिन उनकी स्मृतियां चमकती हैं। हमें राह दिखाती हैं।

लिहाजा तय हुआ कि लेखिका किस्सागोई नहीं करेंगी। बच्चों को परियों के देश नहीं ले जाएंगी, बल्कि देश की चर्चित और यहां तक की गुमनाम हो गर्इं शख्सियतों के बारे में किशोरों से संवाद करते हुए ऐसा ताना-बाना बनेंगी, जो मनोरंजक होने के साथ ज्ञानवर्धक हो। साथ ही प्रेरक हो।

आधी दुनिया भी है कंट्रोल Z में

इस किताब में लेखिका ने कुल सत्रह शख्सियतों की कहानियां साझा की है। इन शख्सियतों में नौ महिलाएं हैं। जिनके नाम से हो सकता है एक सीमित दायरे के लोग परिचित हों, लेकिन उनके व्यक्तित्व व संघर्षगाथा को जानने वाले लोग बेहद सीमित हैं। नारीवादी दृष्टिकोण से यह किताब अपने आप में अनूठी पहल है, क्योंकि इसने अपनी भावी पीढ़ी को अपने इतिहास एवं वर्तमान की ऐसी महिलाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास किया है जिनका अस्तित्व ज्यादा से ज्यादा सामान्य ज्ञान के दो नंबर वाले सवालों तक सीमित रह गया है, बात चाहे देश की पहली रिकार्डेड सिंगर गौहरजान की हो या लाखों बेसहारा बच्चों का सहारा बनी सिंधुताई की, इस किताब ने अपने हर एक किस्से में शख्सियतों के व्यक्तित्व के प्रेरणादायी पहलू को उजागर किया है। इसमें भारतीयता की महान पुजारिन भीकाजी कामा से लेकर सावित्री बाई फुले, दुर्गा भाभी और देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई की संघर्ष गाथा तो है ही वहीं स्टंट फिल्मों की नायिका नादिया से लेकर आज के दौर में अपनी उद्यमिता का लोहा मनवा चुकीं कल्पना सरोज की दास्तां भी लिखी गई है।

अतीत को वर्तमान से जोड़ती किताब

स्वाती सिंह की इस पुस्तक की रचनाओं को पढ़ते हुए लगा कि वे अतीत को वर्तमान से जोड़ रही हैं। इस पुस्तक के शीर्षक – ‘कंट्रोल Z’ का अर्थ ही यही है कि इतिहास के अंधेरे में गुम हो गर्इं शख्सियतों को हम फिर से लौटा लाएं अपनी नई पीढ़ी के लिए। ठीक उसी तरह जब कंप्यूटर पर कुछ लिखा हमारी अपनी गलती से जब गायब हो जाता है, तो कंट्रोल जेड के कमांड से हम उसे वापस ले आते हैं। इसी अर्थ को ग्रहण करते हुए लेखिका ने पुस्तक का शीर्षक सुझाया तो मैंने सहर्ष सहमति जता दी। निश्चित तौर पर यह गौरवशाली अतीत को नए सिरे से संजोने का अनूठा प्रयास है।

दर्ज हो गए उनके उल्लेखनीय कार्य

इस पुस्तक में ऐसे रोल मॉडल मिलेंगे जो समाज में आज अहम योगदान दे रहे हैं। उन्हें इतिहास याद करेगा या नहीं, मुझे नहीं मालूम। मगर लेखिका ने उनके उल्लेखनीय कार्यों को अपनी पुस्तक में जरूर दर्ज कर लिया है। यह पुस्तक महज एक पुस्तक न होकर गैजेट की दुनिया में गुम और मोबाइल गेम्स व वाट्सऐप पर चैटिंग में खोई-अलसाई इस पीढ़ी को जगाने की कोशिश है। स्वाती सहज होकर लिखती हैं। अपनी हर प्रस्तुति में उन्होंने उत्सुकता बनाए रखी है। वे अपनी रचनाओं से आंखें नम कर देती हैं, तो कहीं उमंग पैदा देती हैं। इससे यह पुस्तक पठनीय बन गई है। साथ ही यह प्रेरक है, इससे कौन इनकार करेगा।

युवाओं के लिए है सकारात्मक संदेश

लेखिका उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले की रहने वाली हैं। यों तो वाराणसी को संस्कृति की राजधानी माना जाता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आधुनिकता के नाम पर अंधी दौड़ वाले इस युग में युवा चाहते हुए भी भाषा और साहित्य में अपना सक्रिय योगदान नहीं दे पा रहे हैं। अब जहां एक ओर शिक्षा की सार्थकता सिर्फ जीविकापार्जन के उचित साधन जुटाने मात्र तक सीमित हो रही है, वहीं युवाओं में भी अपनी रूचि को अपना काम बनाने की बजाय अच्छे पैकेज वाली नौकरी प्राथमिक होती जा रही है। ऐसे में न केवल हमारी संस्कृति का प्रवाह बाधित हो रहा है बल्कि भाषा, खासतौर पर हिंदी के भी संक्रमणकाल की झलक भी दिखाई पड़ रही है, जहां युवाओं की रचनाएं सिर्फ उपन्यास और काव्य विधा तक सीमित दिखाई पड़ रही है, वहीं कंट्रोल जेड के जरिए लेखिका ने न केवल युवाओं में हिंदी की सीमित होती विधा के द्वार दोबारा खोले है साथ ही युवा-लेखकों के नामों के बीच आधी दुनिया की भागीदारी भी दर्ज करा दी है लेखिका ने मास कम्युनिकेशन जैसे प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद भी लेखन को न केवल अपना करियर चुना बल्कि अपनी पहली किताब के जरिए अपने काम की एक मुकम्मल तस्वीर भी हमारे सामने रखी है, जो युवाओं के लिए एक सकारात्मक संदेश है।


संजय स्वतंत्र, मुख्य उप संपादक, जनसत्ता, नई दिल्ली

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