This essay is part of the #IndianWomenInHistory campaign for Women’s History Month to remember the untold legacies of women who shaped India, especially India’s various feminist movements. Each day one Indian woman is profiled for the whole of March 2017. 

महाश्वेता देवी भारतीय साहित्य के उन लेखकों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनके लिए लेखन एक आंदोलन है, सतत चलने वाला आंदोलन| ऐसा आंदोलन जो समाज के हाशिये पर जीने वाले लोगों से सम्बद्ध है| उसके ऐतिहासिक विकासक्रम, समाज निर्माण में उनके योगदान को चिन्हित करने वाला है और देश व लोकतंत्र के भीतर छुपे हुए आर्थिक उपनिवेशवाद और सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को चुनौती देने वाला है|

महाश्वेता देवी ने भारतीय समाज में परम्परागत तौर पर चलने वाले शोषणतंत्रों को बेनकाब करने की कोशिश की है| साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि शोषण का एक पूरा तंत्र है जिनके विविध सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक उपादान हैं और सब एक-दूसरे के अन्योन्याश्रित है| इस शोषण तंत्र में सदियों से दमित आबादी ही इनके लेखन का प्रस्थान-बिंदु है|

महाश्वेता की राष्ट्रद्रोही ‘द्रौपदी’

महाश्वेता देवी भारत के उन कुछ लेखकों में हैं जिन्हें एक्टिविस्ट भी कहा जा सकता है| जिनके सामने एक बेहतर समाज-निर्माण का लक्ष्य होता है| जो दमन के सभी हथियारों के खिलाफ अपने लेखन को आगे बढ़ाते रहते हैं| यही कारण है कि तथाकथित राष्ट्रवादी ऐसे संघर्षशील लेखकों को राष्ट्रद्रोही सिद्ध करने में ही अपनी सारी राष्ट्रवादिता दिखाते हैं|

महाश्वेता की कहानी ‘द्रौपदी’ को लेकर भी इसी तरह का आरोप लगाया गया| वास्तव में यह तथाकथित राष्ट्रवादियों की तरफ से एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी जो सिर्फ एक लेखिका पर नहीं बल्कि पश्चिम-बंगाल, झारखंड और उड़ीसा की एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता के प्रति थी| यह प्रतिक्रिया उस बुद्धिजीवी के प्रति थी जिसका देश सिर्फ हिन्दू राष्ट्रवाद की परिकल्पना में नहीं अंटता है|

मुख्यधारा के इतिहास और सभ्यतागत विकास पर प्रश्नचिन्ह लगाता लेखन

विषय के मूल स्रोतों के तलाश की यही पद्धति महाश्वेता को लेखिका के साथ ही साथ प्रतिबद्ध सामाजिक-कार्यकर्ता के रूप में खड़ी करती है| इसीलिए महाश्वेता का लेखन एक ऐतिहासिक-सामाजिक दस्तावेज के रूप में सामने आता है| ऐसा दस्तावेज जो मुख्यधारा के इतिहास और सभ्यतागत विकास पर जहाँ प्रश्नचिह्न लगता हैं वहीं उसका प्रति-आख्यान भी रचता है|

लेखन में ‘समाज और सभ्यता की पहचान’ वंचितों की गलियों से

महाश्वेता ने अपने कथासाहित्य में इतिहास और सभ्यतागत विकास के इसी एकरेखीय और बंधी-बंधाई दृष्टि को तोड़ने की कोशिश की है| उन्होंने भारतीय समाज और सभ्यता की पहचान उस धरातल से करने की कोशिश की है जिसे मुख्यधारा में कभी भी जगह नहीं दी गई और यदि दी भी गई तो घृणा के साथ| रचनात्मक लेखन करने वाले ऐसे बहुत कम लेखक हैं जिन्होंने वंचित तबके के नजरिये से उनकी समस्याओं को चित्रित किया है| उनके उपलब्ध स्रोतों के आधार पर उनकी जड़ों और सांस्कृतिक-विकास में उनके योगदान को रेखांकित किया है| उनकी अस्मिता की पहचान उनके अपने आधारभूत मान्यताओं के आधार पर की हो| यह किसी भी रचनाकार की रचना-प्रक्रिया और उसकी संवेदनशीलता की भी कसौटी बन जाती है|

‘जंगल के दावेदार’ और ‘चोटी मुंडा और उसका तीर’ दोनों उपन्यासों में महाश्वेता का यह दृष्टिकोण और अधिक स्पष्ट रूप में सामने आया है|

‘चोटी मुंडा और उसका तीर’

चोटी मुंडा और उसका तीर में महाश्वेता ने लिखा है कि ‘मुंडा लोगों की भाषा की लिपि नहीं है| इसलिए महत्त्वपूर्ण घटनाओं की कहानी बनाकर वे किंवदन्ती बना देते हैं, गाना बनाकर रखे रहते हैं| वही उनका इतिहास भी है| इस तरह के इतिहास को समझे बिना उसे महत्त्व दिए बगैर उस समुदाय के सम्बन्ध में लिखना वास्तव में बेमानी है| यह रचनाकार की लेखकीय ईमानदारी पर भी सवाल खड़ा करने वाला है|’

‘जंगल के दावेदार’

‘जंगल के दावेदार में’ बिरसा की लड़ाई सिर्फ आर्थिक शोषण के खिलाफ और भूमि आंदोलन से ही नहीं जुड़ी है बल्कि हर तरह के वर्चस्ववाद के भी खिलाफ है| बिरसा की लड़ाई जहाँ एक ओर ब्रिटिश हुकुमत और साम्राज्यवाद से है वहीं दूसरे शोषणतंत्र सामंतवाद, जमीदारी व्यवस्था और धार्मिक छलावे से भी है| बिरसा का ‘अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज’ (हमारे देश में हमारा शासन) हर तरह के उपनिवेशवादी मानसिकता का प्रतिकार है| उसे सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ही खिलाफ नहीं सीमित किया जा सकता है|

समय और समाज की संपूर्णता वाला महाश्वेता का लेखन

महाश्वेता ने अपने सम्पूर्ण लेखन में यह बात बहुत ही मजबूती से स्थापित की है कि साहित्य के कलात्मक मूल्य संघर्ष को रूपायित किये बिना सम्पूर्ण नहीं कहे जा सकते| पूरे उत्तर भारत की बदलती राजनीतिक स्थिति के साथ ही साथ होने वाले तमाम सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को जिस तरह साहित्य में ढालकर नये मानवीय मूल्यों की तलाश महाश्वेता ने की है वह बहुत कम रचनाकारों के यहाँ मिलता है| वास्तव में अपने समय और समाज को सम्पूर्णता में पकड़ना इसी को कहते हैं| मूर्त ऐतिहासिक तथ्यों से लेकर अमूर्त सामाजिक परिवर्तनों का पूरा विवरण महाश्वेता के लेखन में मौजूद है| आश्चर्यजनक यह है कि इन्हें पढ़ते हुए ये विवरण नहीं लगते बल्कि कहीं बहुत गहरे उतरकर आत्मा को आंदोलित करते हैं, आत्ममंथन को मजबूर करते हैं|

इतिहास ने नकारा महाश्वेता के संघर्ष और विद्रोह की अभिव्यक्ति

वस्तुतः महाश्वेता के लेखन में एक स्तर पर उस संघर्ष और विद्रोह को अभिव्यक्ति मिली है जिसे इतिहास ने नकार दिया है| वहीं दूसरे स्तर पर बहुत तेजी से विघटित मानवीय मूल्यों को भी उतनी ही गहराई से रूपायित किया गया है| जहाँ एक ओर महाश्वेता ने स्वतंत्रता से पूर्व उपेक्षित पर महत्वपूर्ण जननायकों के ऐतिहासिक अवदान को चिन्हित किया है, उनके खड़े किये जनांदोलनों की भूमिका की पहचान की है| वहीं दूसरी ओर स्वतंत्रता के बाद निर्मित होने वाले नवउपनिवेशवादी राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक प्रवृत्तियों की भी पहचान की है| बदलते सामाजिक-राजनीतिक पटल को रूपायित करने वाले उपन्यासों में अग्निगर्भ, भूख, एक और विभाजन, मर्डरर की माँ, हजार चौरासी की माँ और मास्टर साहब आदि हैं|

‘भूख’ में दिखती है गुलामी की कीलें

अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी देश का एक बड़ा हिस्सा किस तरह परम्परागत तौर पर सामाजिक और आर्थिक गुलामी में जीने को मजबूर है उसे ‘भूख’ की पूरी संरचना में देखा जा सकता है| वर्तमान झारखंड की पृष्ठभूमि पर लिखे गये इस उपन्यास में उस पूरी सामाजिक ढांचे को देखा जा सकता है जिसमें वंचित तबके के लोग मरते दम तक जीने को मजबूर हैं| आदिवासियों से लेकर वे स्त्रियाँ भी जो इन्हीं शोषण के संस्थानों में जन्म लेने वाली हैं| जिस तरह आदिवासी बेगारी से मुक्त नहीं हो सकते उसी तरह इन जंगलों के सामंतों से ब्याही गई स्त्रियों की भी मुक्ति असम्भव है|

पुरुषवादी सामंती परिवेश के हर सूत्र वाली ‘भूख’

महाश्वेता ने पुरुषवादी सामंती परिवेश के करीब हर सूत्र को इस उपन्यास में उभारा है| जितनी अमानवीयता आदिवासियों के प्रति है उतनी ही घर में रहने वाली स्त्रियों के प्रति भी| वस्तुतः पुरुषवादी सामंती संरचना में स्त्री या निम्न तबके को मनुष्य का दर्जा ही नहीं दिया जा सकता| कुंवरानी से लेकर लाजवंती, गोमती और विपाशा जैसी स्त्रियाँ इस पितृसत्तात्मक ढांचे में निर्वासित जीवन जीने और उसी में मर जाने के लिए अभिशप्त हैं|

लोकतंत्र से वंचितों की ‘भूख’

जनप्रतिनिधियों का अपनी जनता से किस तरह का सीमित सम्बन्ध है और क्यों आज भी बहुसंख्यक आबादी मुख्यधारा की जनता में नहीं गिनी जाती इसे महाश्वेता ने ‘भूख’ में परत दर परत खोला है| विकास परियोजनाओं के नाम पर होने वाले लूट-खसोट और अमानवीय दमन की जो संस्कृति भारतीय लोकतंत्र में विकसित हुई उसे रचनात्मक लेखन में इस तरह बहुत कम लेखकों ने रखा है|

महाश्वेता ने बहुत स्पष्ट तौर पर लोकतंत्र के भीतर फल-फूल रहे नवउपनिवेशवाद की तलाश अपने लेखन में की है| जंगलों से लेकर गांवों तक, कस्बों से लेकर महानगरों तक लूट और हिंसा की जिस संस्कृति का विस्तार स्वतंत्र भारत में तेजी से हुआ उसके कारणों को और उनको प्रश्रय देने वाले तत्वों की पहचान ही ‘मर्डरर की माँ’ और ‘एक और विभाजन’ जैसे उपन्यासों का मूल कथ्य है| महाश्वेता का रचना-कर्म इस सड़ चुकी समाज व्यवस्था के उन नासूरों को खोल के रख देता है|

अनुभव और स्रोतों की पुख्ता तलाश ‘झाँसी की रानी’

लेखन किस तरह सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़ता है, यह महाश्वेता देवी के रचना कर्म में देखा जा सकता है| अपने पहले उपन्यास ‘झाँसी की रानी’ को लिखने के लिए इन्होंने 1857 के गदर से जुड़े स्थानों पर जाकर उसे सम्पूर्णता में समझने की कोशिश की| महाश्वेता देवी सिर्फ कागजी विवरणों के आधार पर लिखने वाली लेखिका नहीं हैं और न ही कल्पना का सहारा लेकर रुमानी ऐतिहासिकता गढ़ने वाली| उनके रचना कर्म में जहाँ एक ओर वह आत्मानुभव अभिव्यक्त होता है जो समाज के वंचित तबकों के साथ रहने से निर्मित हुआ वहीं दूसरी ओर मुख्यधारा के साहित्य और इतिहास में उपेक्षित स्रोतों की तलाश भी है| इसीलिए इस तरह के ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन का मूल स्रोत जहाँ मुख्यधारा का इतिहास है वहीं उन क्षेत्रों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली लोककथाएँ हैं, जिनमें आम जनमानस अभिव्यक्ति पाता है|

धर्म और पूंजी के गठजोड़ की हर परत खोलता महाश्वेता का लेखन

धर्म और पूँजी के गठजोड़ की वीभत्सता को भी महाश्वेता के लेखन में देखा जा सकता है| धर्म से लेकर स्टेटस तक की दिखावापरस्ती किस तरह अपनी जड़ों में बाजारवादी हिंसा को छुपाये हुए है इसकी महाश्वेता ने बहुत तीव्र आलोचना की है| ‘एक और विभाजन’ में ‘केतकी’ के चिंतन द्वारा इसे स्पष्ट तौर पर पढ़ा जा सकता है – ‘बढ़-चढ़कर ठाठ-बाट, मॉड आउटलुक या विशाल खर्च वाला धार्मिक आयोजन यह सब अतिशयता देखते ही, उनका मन सिमट आता है| सारा कुछ बेहद फूहड़ और कुरुचिभरा लगता है|’

महाश्वेता का लेखन जहाँ एक ओर दमित, शोषित और वंचित तबके की आवाज है वहीं दूसरी ओर सत्ता-संरचना और दमन के औजारों की करारी आलोचना भी| उसमें जहाँ एक ओर मानवतावाद की अनुगूँज है वहीं दूसरी ओर संगठन और जनांदोलनों की पुकार भी है| उनका सम्पूर्ण रचना-कर्म जहाँ एक ओर हिंसा और अपराध की संस्कृति पर चोट करता है वहीं दूसरी ओर तटस्थता को भी कटघरे में खड़ा करता है|

संदर्भ

1. चोट्टी मुंडा और उसका तीर, पृ. 16, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, संस्करण 1998, आवृत्ति 2001
2. झाँसी की रानी, पृ. 10, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, संस्करण 2010
3. इतिहास क्या है, पृ. 9-10, दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, 1976
4. चोट्टी मुंडा और उसका तीर, पृ. 27, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, संस्करण 1998, आवृत्ति 2001
5. झाँसी की रानी, पृ. 10, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, संस्करण 2010
6. भूख, पृ. 31, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, 2008
7. भूख, पृ. 1, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, 2008
8. भूख, पृ. 57, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, 2008
9. मर्डरर की माँ, पृ. 9, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2008
10. मर्डरर की माँ, पृ. 8, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2008
11. एक और विभाजन, पृ. 16, वाणी प्रकाशन, संस्करण, 2006
12. एक और विभाजन, पृ. 41, वाणी प्रकाशन, संस्करण, 2006

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