This essay is part of the #IndianWomenInHistory campaign for Women’s History Month to remember the untold legacies of women who shaped India, especially India’s various feminist movements. Each day one Indian woman is profiled for the whole of March 2017. 

‘एक पुरुष के प्रति अन्याय की कल्पना से ही सारा पुरुष-समाज उस स्त्री से प्रतिशोध लेने को उतारू हो जाता है और एक स्त्री के साथ क्रूरतम अन्याय का प्रमाण पाकर भी सब स्त्रियाँ उसके अकारण दंड को अधिक भारी बनाए बिना नहीं रहती| इस तरह पग-पग पर पुरुष से सहायता की याचना न करने वाली स्त्री की स्थिति कुछ विचित्र सी है| वह जितनी ही पहुंच के बाहर होती है, पुरुष उतना ही झुंझलाता है और प्राय: यह झुनझुलाहत मिथ्या अभियोगों के रूप में परिवर्तित हो जाती है|’

– यह वाक्यांश सालों पहले महादेवी वर्मा की लिखी कहानी ‘लछमा’ से लिया गया है| वाकई पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री-पुरुष की सामाजिक व मानसिक स्थिति का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण कर पाना किसी आम इंसान के बस की बात नहीं है|

हिंदी साहित्य के छायावादी युग की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित कवियत्री महादेवी वर्मा की गद्य एवं पद्य की रचनाओं से उनके व्यक्तित्व के दो पहलू देखने को मिलते हैं| उनकी कविता में रहस्यवादी प्रवृत्ति और दुखवाद की अधिकता है, भावुकता है| लेकिन गद्य में विचारक के रूप में उनका बौद्धिक पक्ष प्रखर है| ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएं’, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ जैसी रचनाओं के ज़रिए महादेवीजी ने भारतीय स्त्री-जीवन के अनदेखे पहलुओं पर प्रकाश डाला है| इसी कारण, स्त्री विमर्श के संदर्भ में उनकी गद्य रचनाओं का मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है| महादेवी नारी-चेतना की भारतीय परंपरा पर विचार करनेवाली अद्वितीय विचारक रही हैं| उनके विचार रेखाचित्रों से होकर श्रृंखला की कड़ियाँ बनकर हमारे सामने उभर आते हैं| ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ भारतीय नारी की समस्याओं का जीवंत विवेचन ही है|

बालिकावधू महादेवी का एक समझौता अपनी कविता-सम्मान के नाम

महादेवी का जन्म फर्रुखाबाद में वकीलों के परिवार में हुआ था| वह गोविन्द प्रसाद और हेमरानी की पुत्री थीं| उनकी संतानों में वह सबसे बड़ी थी| उनके दो भाई और एक बहन श्यामा थी| मात्र सात साल की उम्र में साल 1914 में इंदौर में डॉ स्वरूप नारायण वर्मा से महादेवी का विवाह संपन्न हुआ| शुरू में वह अपने माता-पिता के साथ रहीं क्योंकि उनके पति लखनऊ में अपनी ऊंची शिक्षा में संलग्न थे| साल 1920 में वह अपने पति के पास टमकोई स्टेट गई| साल 1929 में उन्होंने इलाहाबाद से स्नातक की परीक्षा पास की और साल 1932 में संस्कृत में स्नाकोतर की उपाधि ग्रहण की| महादेवी और उनके पति, दोनों के उद्देश्य अलग थे| वह पति से समझौता कर अपने कविता के सम्मान को आगे बढ़ाने इलाहाबाद चली गई| अलग-अलग रुचियों के चलते वे दोनों अधिकांशतया अलग-अलग रहे| साल 1996 में उनके पति का देहावसान हो गया और वह स्थायी रूप से इलाहाबाद रहने लगीं और अंत तक इलाहाबाद में रहीं|

बचपन में महादेवी ने अपना विवाह अस्वीकार कर दिया था| वह बौद्ध धर्म से प्रभावित हुई और उन्होंने भिक्षुणी बनने का प्रयास भी किया था| उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों में भी भाग लिया|

महादेवी इलाहाबाद महिला विद्यापीठ में प्रथम प्रधानाध्यापिका नियुक्त हुई, जिसमें वह हिंदी माध्यम से लड़कियों को सांस्कृतिक व साहित्यिक शिक्षा देने लगीं| बाद में वह उस संस्था की चांसलर बना दी गई|

‘आधुनिक मीरा’ थी वो

महादेवी वर्मा हिंदी छायावाद के चार स्तंभों में से एक मानी जाती हैं| इनके अतिरिक्त वे तीन स्तंभ हैं – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’. सुमित्रानंदन पंत और जयशंकर प्रसाद|

महादेवी एक प्रभावशाली सक्रिय महिला कार्यकर्ती थीं| पर विरोधी नारी अधिकारवादी नहीं थी| उन्होंने अपनी रचना ‘श्रृंखला की कड़ियों’ में भारतीय नारी की दयनीय दशा, उनके कारणों और उनके सहज नूतन सम्पन्न उपायों के लिए अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए हैं| इतना ही नहीं, उन्होंने उन विचारों पर स्वयं जी कर भी दिखाया है| महादेवी वर्मा को ‘आधुनिक मीरा’ भी कहा जाता है| उन्हें हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘साहित्य अकादमी फैलोशिप’ 1976 में प्रदान किया गया| साल 1982 में उन्हें ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्रदान किया गया|

महादेवी एक जानी-मानी चित्रकार भी थीं| उन्होंने अपनी कृति ‘दीप शिखा’ के लिए बहुत से वर्णन चित्रित किए| उनका देहांत 11 सितंबर, 1987 को हुआ|

‘भारतीय शास्त्रों में महिलाएं पुरुष की संगिनी रही है, छाया मात्र नहीं’

उन्होंने नारीजगत को भारतीय संदर्भ में मुक्ति का संदेश दिया| नारी मुक्ति के विषय में उनका विचार है कि भारत की स्त्री तो भारत माँ की प्रतीक है| वह अपनी समस्त सन्तान को सुखी देखना चाहती है| उन्हें मुक्त करने में ही उनकी मुक्ति है| मैत्रेयी, गोपा, सीता और महाभारत के अनेक स्त्री पात्रों का उदाहरण देकर वह निष्कर्ष निकालती हैं कि उनमें से प्रत्येक पात्र पुरुष की संगिनी रही है, छाया मात्र नहीं| छाया और संगिनी का अंतर स्पष्ट है – ‘छाया का कार्य, आधार में अपने आपको इस प्रकार मिला देना है जिसमें वह उसी के समान जान पड़े और संगिनी का अपने सहयोगी की प्रत्येक त्रुटि को पूर्ण कर उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनाना|’

‘नारीत्व एक अभिशाप है’

‘हमारी श्रृंखला की कड़ियाँ’ लेख उन्होंने साल 1931 में लिखा था| स्त्री और पुरुष के पति-पत्नी संबंध पर विचार करते हुए महादेवीजी ललकार भरे स्वर में सवाल उठाती हैं – अपने जीवनसाथी के हृदय के रहस्यमय कोने-कोने से परिचित सौभाग्यवती सहधर्मिणी कितनी हैं? जीवन की प्रत्येक दिशा में साथ देनेवाली कितनी हैं? ये सवाल साल 1931 में उठाये गए सवाल हैं|

मौजूदा समय में भी इन सवालों के जवाब संतोष प्रदान करने लायक नहीं हो सकते| रामायण की सीता पतिव्रता रहने के बावजूद पति की परित्यक्ता बन गयी| नारी की नियति ऐसी क्यों? महादेवीजी इसे नारीत्व का अभिशाप मानती है| साल 1933 में उन्होंने नारीत्व के अभिशाप पर लिखा है – ‘अग्नि में बैठकर अपने आपको पतिप्राणा प्रमाणित करने वाली स्फटिक सी स्वच्छ सीता में नारी की अनंत युगों की वेतना साकार हो गयी है|’ सीता को पृथ्वी में समाहित करते हुए राम का हृदय विदीर्ण नहीं हुआ|

‘भारतीय संस्कृति और नारी’ शीर्षक निबंध में उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति में स्त्री के महत्वपूर्ण स्थान पर गंभीर विवेचना की है| उनके अनुसार मातृशक्ति की रहस्यमयता के कारण ही प्राचीन संस्कृति में स्त्री का महत्वपूर्ण स्थान रहा है, भारतीय संस्कृति में नारी की आत्मरूप को ही नहीं उसके दिवात्म रूप को प्रतिष्ठा दी है|

‘आधुनिक नारी – उसकी स्थिति पर एक दृष्टि’

महादेवी आधुनिक नारी की स्थिति पर नज़र डालते हुए भारतीय नारी के लिए समाज में पुरुष के समकक्ष स्थान पाने की ज़रूरत पर जोर देती हैं| साल 1934 में लिखित ‘आधुनिक नारी-उसकी स्थिति पर एक दृष्टि’ लेख में वे कहती हैं – ‘एक ओर परंपरागत संस्कार ने उसके हृदय में यह भाव भर दिया है कि पुरुष विचार, बुद्धि और शक्ति में उससे श्रेष्ठ है और दूसरी ओर उसके भीतर की नारी प्रवृत्ति भी उसे स्थिर नहीं करने देती|’

‘पुरुष ने स्त्री के वास्तविक रूप को कभी नहीं देखा’

महादेवी अपनी लेखनी से सजगता और निडरता के साथ भारत की नारी के पक्ष में लड़ती रहीं| नारी शिक्षा की ज़रूरत पर जोर से आवाज़ बुलंद की और खुद इस क्षेत्र में कार्यरत रहीं| उन्होंने गांधीजी की प्रेरणा से संस्थापित प्रयाग महिला विद्यापीठ में रहते हुए अशिक्षित जनसमूह में शिक्षा की ज्योति फैलायी थी| शिक्षा प्रचार के संदर्भ में वे सुधारकों की अदूरदर्शिता और संकुचित दृष्टि पर खुलकर वार करती हैं| वह लिखती हैं – ‘वर्तमान युग के पुरुष ने स्त्री के वास्तविक रूप को न कभी देखा था, न वह उसकी कल्पना कर सका| उसके विचार में स्त्री के परिचय का आदि अंत इससे अधिक और क्या हो सकता था कि वह किसी की पत्नी है| कहना न होगा कि इस धारणा ने ही असंतोष को जन्म देकर पाला और पालती जा रही है|’

नारी में यौन तत्व को ही प्रधानता देनेवाली प्रवृतियों का उन्होंने विरोध किया| उनके अनुसार निर्जीव शरीर विज्ञान ही नारी के जीवन की सृजनतात्मक शक्तियों का परिचय नहीं दे सकता| उनका मानना है कि ‘अनियंत्रित वासना का प्रदर्शन स्त्री के प्रति क्रूर व्यंग ही नहीं जीवन के प्रति विश्वासघात भी है|’

संदर्भ

  1. महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियाँ, तृतीय सं. लोकभारती-2001, पृ.13
  2. नासिरा शर्मा – आधा आबादी और इलाहाबाद-हिंदी अनुशीलन, जून-2004, पृ.42

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