सुंदरता, सभ्यता, इज्जत और संस्कृति इन सभी की परिभाषा हमेशा मर्दों ने गढ़ी है| कहते है समय बदल रहा है पर इसके बावजूद कुछ चीज़ें आज भी स्थायी है| खासतौर पर महिलाओं के संदर्भ में| उनके जीवनशैली, अस्तित्व और अधिकारों के संदर्भ में – हमारी सोच| ऐसी सड़ी हुई सोच जिसकी जड़े बेहद गहरी और मजबूत है| जब कभी महिलाएं अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीना शुरू करती है और इस बात की भनक समाज को लगती है तब-तब पितृसत्ता अपनी उस सड़ी सोच से महिलाओं को जकड़ने की कोशिश करने लगती है| पितृसत्ता का यह इतिहास बेहद पुराना है जिसके तहत महिला के खिलाफ़ होने वाली हर हिंसा का जिम्मेदार उन्हें ही ठहराया जाता है और उससे बचने के उपाय भी महिलाओं पर शिकंजा कसने वाले ही बताए जाते है| आधुनिकता के इस दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है| अब उनका अस्तित्व सिर्फ घूंघट तक सीमित नहीं है| और बस यही बात जमाने को बुरी लगती है| फिर क्या, कोई सेलेब्रिटी हो या आम महिलाएं तपाक से उनके लिए कह दिया जाता है कि –

‘इतने छोटे कपड़े पहनकर बाहर जाएगी तो लड़के छेड़ेंगे ही|’

‘लूज़ कैरेक्टर की है वो, देखते नहीं कैसे उटपटांग कपड़े पहनती है|’

‘इन हिरोइनों का क्या है ऐसे कपड़े पहनती है और न जाने क्या-क्या करती होंगी|’

कितनी आसानी से हम ये बातें कह देते है न| कभी नेता के रूप में तो कभी सोशल मीडिया के ट्रोल के रूप में या कभी धर्म के ठेकेदार के रूप में| मर्दों की सत्ता में हर ऊंची बिसात वालों की ये कुछ ऐसी ओछी बातें है जिन्हें हम आये दिन अपने आसपास, न्यूज़ चैनल या विकास के मंचीय भाषणों में सुनते है|

मर्दों की सत्ता में ‘महिलाओं का कैरेक्टर उनके कपड़े डिसाइड करते है’

मर्दों की सत्ता में महिलाओं का कैरेक्टर उनके कपड़ों पर निर्भर करता है| घूंघट लंबा हो तो महिला को परिभाषित करने के लिए एक शब्द – ‘संस्कारी’| शॉर्ट्स में महिला को परिभाषित करने के लिए एक शब्द – ‘कैरेक्टरलेस,चरित्रहीन,रंडी या छिनाल’| बात सिर्फ परिभाषा तक सीमित नहीं होती है| इससे महिलाओं की सुरक्षा का दायरा भी तय किया जाता है| लड़की सलवार-कमीज़ में हो तो उसके साथ होने वाली किसी भी तरह की हिंसा पर कहा जाता है कि – ‘बहुत गलत हुआ, आजकल लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं है|’ वहीं लड़की शॉर्ट्स या जीन्स में हो तो उसके साथ किसी भी तरह की हिंसा होने पर बेहद आसानी से अपना संस्कारी सीना चौड़ा करते हुए कहा जाता है – ‘ऐसे कपड़े पहनने वालियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए, बहुत गर्मी रहती हैं इनको|’

अब ‘हजामत कर लो अपनी सड़ी सोच की’

लेकिन अब महिलाओं ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए ऐसे लोगों को ज़वाब देना शुरू किया है| खासकर औरतों के कपड़ों पर संस्कार के नामपर अपनी सड़ी सोच के गंदे कीचड़ उछालने वालों के खिलाफ़| एक हैशटैग के ज़रिए| जेनिफ़र विंगेट, रागिनी खन्ना, मंदिरा बेदी, बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा जैसी कई नामचीन हस्तियों ने सोशल मीडिया में #ShaveYourOpinion के ज़रिए यह मुहीम छेडी है|

Image Credit: #ShaveYourOpinion via Twitter
Image Credit: #ShaveYourOpinion via Twitter

इस सोशल कैंपेन में अलग-अलग फील्ड से जुड़ी महिला हस्तियां भाग ले रही हैं| चेहरे पर गुस्सा और हाथ में रेज़र लिए ये महिलाएं संदेश दे रही है ‘अपनी सोच की हज़ामत की|’ वो सोच, जिसमें महिलाओं के कपड़ों के लिए बिना सोचे समझे अपनी सड़ी सोच का परिचय दे दिया जाता है| उन्हें भद्दी गालियों के संबोधित करते हुए गंदी टिप्पणियाँ दी जाती है| उनका मजाक बनाया जाता है| संदेश – ऐसे लोगों के लिए, जिनके लिए समाज, संस्कृति, सभ्यता और इज्जत की माप महिलाओं के कपड़ों की माप पर निर्भर करती है और इसके लिए वे कहीं भी कभी भी अपनी छोटी-बदबूदार-सड़ी सोच का परिचय देना नहीं भूलते| फिर चाहे वो शहर की सड़कें हो या सोशल मीडिया का मंच|

मर्दानगी की मूंछों के साथ अपनी सोच भी ‘संवार लो’

हमारे देश में मर्द अपनी मूंछों पर ताव देते है| क्योंकि हमारे यहां तो मर्द को मर्द उसकी दाढ़ी-मूंछों के आने के बाद ही माना जाता है| इतना ही नहीं, जिस तरह महिलाओं के लिए बनायी गयी तमाम वेशभूषा व श्रृंगार उनकी धर्म-जाति को परिभाषित करती है| ठीक इसी तर्ज पर मर्दों की दाढ़ी-मूंछों की बनावट-सजावट उनकी धर्म-जाति की परिचायक होती है| इस आधार पर हम कह सकते है कि जैसे आईने को महिलाओं के श्रृंगार का अहम हिस्सा माना जाता है| उसी तरह मर्दों के लिए उस्तुरा या रेज़र उनके श्रृंगार का अहम हिस्सा होता है| जिसके माध्यम से वे अपनी मर्दानगी के चिन्ह यानी दाढ़ी-मूंछों को सजाते-संवारते है|

क्योंकि असली मर्द सूरत से नहीं सीरत से होता है

सेव योर ओपिनियन कैपेन के तहत महिलाओं ने मर्दों के श्रृंगार के अहम हिस्से यानी कि रेजर को अपना औज़ार बनाते हुए यह संदेश देना शुरू किया है वे अपनी दाढ़ी-मूंछों की तरह अपनी सोच को साफ़ करें| क्योंकि असली मर्द सूरत से नहीं सीरत से होता है|

‘हजामत’ में है थोड़ी समस्या’ – आलोचक

लड़कियों के पहनावे और जीने के सलीके पर भद्दे कमेंट या राय बना लेने वालों के खिलाफ सेलिब्रेटी महिलाओं के द्वारा शुरू किये गए इस कैपेन में यह नारा दिया गया है कि – अपनी सोच की हजामत कर लो| लेकिन कुछ समाज विश्लेषकों और आलोचकों को यहां ‘हज़ामत’ पर थोड़ी समस्या नज़र आ रही है|

गौरतलब है कि रेजर से अगर सिर के बाल का मुंडन कर लिया जाए या बढ़ी हुई दाढ़ी साफ कर ली जाए, तो अगर अगले रोज नहीं तो कुछ ही दिनों में फिर से रेजर का इस्तेमाल करके मुंडन या दाढ़ी साफ करने की जरूरत पड़ेगी|

रेजर से सोच की सफाई नहीं होगी| रेजर से मुंडन करने से बाल जड़ों से साफ नहीं होते, फिर उग आते हैं| बल्कि कई बार में बाल मोटे और सख्त हो जाते हैं| तो अगर इस नारे में बालों की तुलना सोच से की गई है और अगर लड़के इसको मानना शुरू कर देते हैं तो इसका उल्टा असर होने वाला है| जो सोच यानी बाल अपने सबसे पहले वाली शक्ल में मुलायम होंगे, वे रेजर से साफ करने के बाद और सख्त हो जाएंगे| तो क्या रेजर से सोच की हजामत करके उसे और मजबूत करने का पैगाम दिया जा रहा है|

समय के साथ बदलते समाज में महिलाओं के बढ़ते कदमों को रोकने वाली पितृसत्ता की संकीर्ण सोच के खिलाफ़ अपने आपमें यह कैंपेन बेहद अहम है| लेकिन इस अहम कैंपेन का केंद्र बना रेज़र इन तर्कों के आधार पर कहीं न कहीं अपनी दिशा को धूमिल करता नज़र आता है| क्योंकि यहां सवाल बाल का नहीं ‘सोच’ का है| ऐसे में इस कैंपेन में दिए जाने वाले नारे और चयनित औज़ार (रेज़र) पर एकबार फिर सोचने की ज़रूरत है|

पर यहां इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है कि सड़ी-बदबूदार संकीर्ण सोच के बीच महिलाओं का एकजुट होकर इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाना कहीं-न-कहीं एक सकारात्मक परिवर्तन को दिखाता है| ऐसा परिवर्तन जिसका आगाज़ महिलाएं खुद कर रहीं है और इसके लिए वे बधाईरूपी समर्थन की भी हकदार है|

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