पलामू से खैरलांजी तक, बदायूं से चेन्नै तक और मिर्चपुर से नवीं मुंबई तक हर जगह सिर्फ़ पृष्ठभूमि बदली पर महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा की घटनाएँ समान रही हैं| साथ ही, एक कड़वा सच यह भी है कि यदि महिला निचली जाति की हो तो उसके साथ होने वाली हिंसा अधिक वहशीयत भरी होती है| हमारे समाज में जाति प्रथा पर बनी बर्बर सत्ता-संरचना की व्यवस्थित कार्यवाइयां हाल के दिनों में अपने वीभत्स रूप में सामने आयी हैं| संदर्भ अलग रहा है – कहीं शादी में घोड़ी चढ़ना, कहीं प्रेम प्रसंग या शादी तो कहीं संपत्ति का स्वामित्व और परंपरागत काम|

आज राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय अखबार दलित महिलाओं के साथ हो रही अमानवीय घटनाओं की खबरों से पटे पड़े हैं, जो आज भी इस सामाजिक पायदान के सबसे निचले स्तर पर हैं| उन्हें वे अधिकार नहीं दिए गए हैं जो दूसरों को ‘स्वाभाविक’ रूप से हासिल हैं| आज महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए हमारे पास जो भी संवैधानिक सुरक्षाकवच, क़ानूनी प्रावधान और संस्थागत उपाय मौजूद हैं तो इसका श्रेय एक ऐसे मनुष्य को जाता है जिसने इनके लिए अथक और निरंतर प्रयास किए| वे हैं डॉ. बी. आर. आंबेडकर| भारतीय संदर्भ में जब भी समाज में व्याप्त जाति, वर्ग और जेंडर के स्तर पर व्याप्त असमानताओं और उनमें सुधार के मुद्दों पर चिंतन हो तो डॉ. आंबेडकर के विचारों और दृष्टिकोण को शामिल किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती|

आंबेडकर का सफर – ‘छुआछूत के कड़वे अनुभव से ‘भारतरत्न’ तक’

स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार भीमराव रामजी आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) का जन्म ब्रिटिश भारत के मध्य भारत प्रान्त में स्थित नगर सैन्य छावनी महू में हिंदू ‘महार’ (अछूत) जाति में हुआ था| स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद बचपन से ही उन्हें अपनी जाति के कारण कई तरह के सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था| उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की| उन्होंने विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान के शोधकार्य में ख्याति प्राप्त की| जीवन के प्रारंभिक करियर में वह अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे और वकालत भी ज़ारी रखी| उनका बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में बीता| साल 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया| उनके मरणोपरांत साल 1990 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया|

समझा ‘जाति प्रथा के मकड़जाल में फंसी महिलाओं की स्थिति’

 

Comic credit: Shankar

भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो आंबेडकर संभवत: पहले अध्येता रहे हैं, जिन्होंने जातीय संरचना में महिलाओं की स्थिति को जेंडर की दृष्टि से समझने की कोशिश की| उनके संपूर्ण विचार मंथन के दृष्टिकोण में सबसे महत्वपूर्ण मंथन का हिस्सा महिला सशक्तिकरण था| उन्होंने भारतवर्ष की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनैतिक व्यवस्था का सूक्ष्म अध्ययन करके जाना कि सभी समस्या के समाधान की मूल शर्त सामाजिक न्याय और परिवर्तन की क्रांति से है, न की अन्य किसी उपाय से है|

महाड़ सत्याग्रह से की महिला सशक्तिकरण की शुरुआत

आंबेडकर ने अपने अध्ययन और दूरदृष्टि से यह भांप लिया था कि भारतीय महिला सवालों (शोषण, उत्पीड़न, अज्ञान, अपमान और सामाजिक विषमता) की मूल वजह कुछ और नहीं बल्कि भेदभावपूर्ण समाज व्यवस्था और शिक्षा का अभाव है| संदर्भ के तौर पर उनके जीवन के पहले आन्दोलन के रूप में महाड़ सत्याग्रह को हम महिला सशक्तिकरण की शुरुआत मान सकते है| हालांकि यह आन्दोलन पीने के पानी के संबंध में था पर महिलाओं के सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से उन्होंने आन्दोलन में शामिल महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा कि ‘तुम्हारी कोख से जन्म लेना गुनाह क्यों माना जाए और ब्राह्मण स्त्रियों के कोख से जन्म लेना पुण्य क्यों माना जाए?’

‘मनुस्मृति दहन’ भारतीय स्त्री उत्थान के इतिहास में अविस्मर्णीय घटना

आज़ादी से पहले भारत की राष्ट्र व्यवस्था में धार्मिक नीति निर्देशों का बोलबाला होने के कारण आंबेडकर ने महिला सशक्तिकरण के रूप में प्राचीन नीति निर्देश विधि ‘मनुस्मृति’ का दहन किया| यह भारतीय स्त्री उत्थान के इतिहास में एक अविस्मर्णीय घटना है| यह भारतीय विशाल शोषित वर्ग के मुक्ति का दरवाजा खुलने जैसा था| मनुस्मृति के विरोध के बिंदु यह थे – ‘सभी स्त्री-पुरुषों को शूद्र कहा था, सभी को सारे सामाजिक अधिकारों से वंचित कर दिया था, इतना ही नहीं, इस व्यवस्था ने स्त्रियों में भी भेद निर्माण कर दिया था|’ इस व्यवस्था को पूर्णत: अमान्य कर उसे तिलांजलि दे दी गई थी| इसलिए ‘मनुस्मृति दहन’ स्त्री स्वतंत्रता (सशक्तिकरण) की दिशा में एक उज्ज्वल कदम माना जाता है| इस घटना के बाद स्त्री आन्दोलन को एक व्यापक रूप मिला|

आंबेडकर का नारीवादी चिंतन

भारतीय नारीवादी चिंतन और आंबेडकर के महिला चिंतन की वैचारिकी का केंद्र ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था और समाज में व्याप्त परंपरागत धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं रही हैं, जो महिलाओं को पुरुषों के अधीन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती रही है| इसलिए महिलाओं को महाड़ सम्मेलन में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि – ‘अपने आप को कभी अछूत मत समझो| स्वच्छ जीवन जियो| सवर्ण महिलाओं की तरह कपड़े पहनों| यह मत देखो कि तुम्हारी कपड़ों में जगह-जगह चिंगालिया लगी हैं, बस यह देखो कि वे साफ़ तो है|’

‘नारी शिक्षा पुरुष शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है’ – आंबेडकर

शिक्षा में समानता के संदर्भ में आंबेडकर के विचार स्पष्ट थे| उनका मानना था कि ‘यदि हम लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा पर और ध्यान देने लग जाए तो हम अतिशीघ्र प्रगति कर सकते है| शिक्षा किसी वर्ग की बपौती नहीं| उस पर किसी एक ही वर्ग का अधिकार नहीं है| समाज के प्रत्येक वर्ग को शिक्षा का समान अधिकार है| नारी शिक्षा पुरुष शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है| चूँकि पूरी पारिवारिक व्यवस्था की धुरी नारी है, उसे नकारा नहीं जा सकता है|’

आंबेडकर का ‘शिक्षित करो’ फंडा जाति के पिछड़ेपन पर डंडा

आंबेडकर के प्रसिद्ध मूलमंत्र की शुरुआत ही ‘शिक्षित करो’ से होती है (Educate-Agitate-Organize)| इस मूलमंत्र से आज कितनी महिलाएं शिक्षित होकर आत्मनिर्भर बन रही है| समाज के विकास के लिए दिए इस सिद्धांत के ज़रिए आज हजारों साल पुरानी जाति प्रथा में विभाजित वर्ग (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग) आज के सामान्य वर्ग के साथ बराबरी से खड़े होने में सक्षम है|

आंबेडकर का ‘हिंदू कोड बिल’ महिला सशक्तिकरण का असली आविष्कार

Comic credit: B. Verma

किसी भी स्वस्थ समाज को एक दायरे में रखने के लिए कुछ सामाजिक कायदे कानून होने चाहिए ताकि समाज उनका पालन करता हुआ अपना अस्तित्व बनाये रखे| इसलिए संवैधानिक रूप से भारत के महिला सशक्तिकरण के लिए पहला कानूनी दस्तावेज ‘हिंदू कोड बिल’ तैयार किया गया था| आंबेडकर ने ‘महिला वर्ग’ के सशक्तिकरण के लिए ‘हिंदू कोड बिल’ नामक प्रामाणिक कानूनी दस्तावेज़ साल 1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित ज. नेहरु के मंत्रिमंडल में केंद्रीय विधि मंत्री रहते हुए संसद में पेश किया| पर कुछ धार्मिक मतभेदों के कारण बहुत सांसदों ने बिल का विरोध किया| लिहाजा यह बिल पारित नहीं हो सका|

भारतीय महिला क्रांति के मसीहा थे ‘आंबेडकर’

आंबेडकर यह बात समझते थे कि स्त्रियों की स्थिति सिर्फ ऊपर से उपदेश देकर नहीं सुधरने वाली, उसके लिए क़ानूनी व्यवस्था करनी होगी| इस संदर्भ में महाराष्ट्रीयन दलित लेखक बाबुराव बागुल कहते है, ‘हिंदू कोड बिल महिला सशक्तिकरण का असली आविष्कार है|’ इसी कारण आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल अस्तित्व में लाया जिसकी प्रस्तुति के बिंदु निम्न थे –

• यह बिल हिंदू स्त्रियों की उन्नति के लिए प्रस्तुत किया गया था|
• इस बिल में स्त्रियों को तलाक लेने का अधिकार था|
• तलाक मिलने पर गुज़ारा भत्ता मिलने का अधिकार था|
• एक पत्नी के होते हुए दूसरी शादी न करने का प्रावधान किया गया था|
• गोद लेने का अधिकार था|
• बाप-दादा की संपत्ति में हिस्से का अधिकार था|
• स्त्रियों को अपनी कमाई पर अधिकार दिया गया था|
• लड़की को उत्तराधिकार का अधिकार था|
• अंतरजातीय विवाह करने का अधिकार था|
• अपना उत्तराधिकारी निश्चित करने की स्वतंत्रता थी|

इन सभी बिंदुओं के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि ‘हिंदू कोड बिल’ भारतीय महिलाओं के लिए सभी मर्ज़ की दवा थी| क्योंकि आंबेडकर समझते थे कि असल में समाज की मानसिक सोच जब तक नहीं बदलेगी तब तक व्यावहारिक सोच विकसित नहीं हो सकेगी| पर अफ़सोस यह बिल संसद में पारित नहीं हो पाया और इसी कारण आंबेडकर ने विधि मंत्री पद का इस्तीफ़ा दे दिया| इस आधार पर आंबेडकर को भारतीय महिला क्रांति का ‘मसीहा’ कहना कहीं से भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा|

‘समाज की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करना गुलामी की नई बेड़ियाँ गाड़ने जैसा है’

आंबेडकर के अवलोकन में स्त्री-प्रश्न भारत में किसी भी दूसरे विकसित या पिछड़े मुल्क की तुलना में अधिक जटिल था| यह जटिलता परिवार, समाज, संस्कृति, कानून, रोज़गार हर स्थल पर सैकड़ों रूपों में मौजूद था| वह समझते थे कि इस जटिलता को नज़रअंदाज़ करना देश की आधी आबादी के लिए नई गुलामी की बेड़ियाँ गाड़ने वालों जैसा था| उनका दावा था कि इस विशाल और जटिल देश में स्त्रियों के संघर्ष आज भी कायम है| इन संघर्षों की सांस्कृतिक ज़मीन को पुख्ता करना स्त्री-स्वतंत्रता की प्राथमिक और अनिवार्य शर्त है|

आंबेडकर ने कहा था – ‘मैं नहीं जानता कि इस दुनिया का क्या होगा, जब बेटियों का जन्म ही नहीं होगा|’ स्त्री सरोकारों के प्रति डॉ भीमराव आंबेडकर का समर्पण किसी जुनून से कम नहीं था| सामाजिक न्याय, सामाजिक पहचान, समान अवसर और संवैधानिक स्वतंत्रता के रूप में नारी सशक्तिकरण लिए उनका योगदान पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद किया जायेगा|

संदर्भ

  1. अगेनेस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : शर्मिला रेगे
  2. सचित्र भीम जीवनी रचनाकार : शान्तस्वरूप शान्त
  3. सामाजिक न्याय के पुरस्कर्ता डॉ. भीमराव अम्बेडकर : डॉ. ब्रजलाल वर्मा
  4. हिन्दू कोड बिल और डॉ. अम्बेडकर : सोहन लाल शास्त्री विधावाचस्पति
  5. दलित नारी – एक विमर्श : डॉ. मंजू मोहन सम्यक प्रकशन
  6. स्त्री मुक्ति और महिला आन्दोलन : गीता श्री
  7. महाड़ सत्याग्रह- डॉ. कुसुम मेधवालः भारतीय नारी के उद्धारक डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
  8. स्त्री संघर्ष का इतिहास : राधा कुमार

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