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प्रतीक श्रीवास्तव

कभी-कभी ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लम्हें आते हैं जब हमें लगता है कि मानों हमें सारे जहाँ की ख़ुशी मिल गयी हो और हमारी आँखों से आंसू अपने आप बह जाने को तैयार हो| वो पल दिल को इतना सुकून देता है कि हम चाहने लगते है कि ये पल बस यहीं ठहर जाए|

कई महीनों की मेहनत या यों कहें की करीब एक साल की मेहनत को अपनी आँखों के सामने सफल होते देखने की ख़ुशी को शायद ही कोई शब्द बयां कर पाये जिसे मैंने जिया है|

ना समाज की चिंता है ना उनके द्वारा दिए जाने वाले तानो का कोई ग़म है|

उस दिन वो खुश थे| वो झूम रहे थे| वो नाच रहे थे| मानो सब कुछ भूल गए हो वो| मानो उनकी उम्मीदों को पंख लग गए हो और वो क्षितिज के पार तक उड़ जाने को तैयार हो| वे समाज के सारे रस्मों-दस्तूरों को तोड़ देने को आतुर हों।

ना समाज की चिंता है ना उनके द्वारा दिए जाने वाले तानों का कोई ग़म है| वो भूल गए हैं कि लोग क्या कहेंगे| लोग क्या करेंगे| उन्हें बस अपनी पहचान याद है और वो अपनी पहचान का उत्सव दिल खोल के मनाना चाहते हो।

जी हाँ यही नजारा था 9 अप्रैल का जब लखनऊ अपना पहला गौरव उत्सव मनाने सड़क पर उतरा था। लोग सारे खौफ और दिलों के ग़म को भुला के ख़ुशी के पल जी लेने को आतुर थे।

मुझे आज भी याद है जब इस दिन की परिकल्पना की गयी थी, तब हम सभी के दिल में ये संदेह था कि क्या ये सच्चाई के धरातल पर उतर पायेगा या यूँ ही ख्वाब बनकर दिल में ही रह जायेगा और ये संदेह तब और भी मजबूत होता रहता था, जब सभी कोशिशों के बाद भी हम लोगो को प्रेरित नहीं कर पा रहे थे| जब लोग यह कह रहे थे कि लखनऊ जैसे शहर में ये संभव ही नहीं है, यह कोशिश व्यर्थ जायेगी, लोग हँसेगे तुम सब पर और न जाने कौन-कौन से ताने मारेंगे।

ऐसी बातें उस दौरान लगातार हम सभी को पीछे हटने के लिए मजबूर करने की कोशिश करती रहीं| पर हमने अपनी कोशिशों को एकपल के लिए भी कम नहीं होने दिया था| मुझे आज भी याद है वो फर्स्ट मीट जब हमसे मिलने सिर्फ चार लोग ही आये थे| इतना ही नहीं, इसके बाद की अगली कई मीटिंग में वही चार चेहरे ही नज़र आते रहे| इस बात ने भी हमलोगों को कई बार अपने पैर पीछे करने के लिए हमलोगों को आगाह किया| पर जब हमलोगों ने ‘कैंडल लाइट विजिल’ का आयोजन किया तब वहां करीब सत्तर लोगों ने शिरकत ली| इसबात ने हम सभी की रेगिस्तान बनती उम्मीद पर बारिश की बूंदों का काम किया और हमारा विश्वास बढ़ता गया|

लोग यह कह रहे थे कि लखनऊ जैसे शहर में ये संभव ही नहीं है|

इसके बाद, लोग मिलते गए और कारवां बढ़ता गया| धीरे-धीरे ही सही हम मंजिल की तलाश में बढ़ते गए। हमारे संकल्प को रफ़्तार मिली| जनवरी में जब हमने गौरव यात्रा की तारीख तय की तब नए लोग भी हमारे इस संकल्प का हिस्सा बनने लगे तो इससे हमारी टीम में भी एक नए जोश का संचार हुआ| इससे ख्वाब सरीखा दिखने वाला ये संकल्प मानो सच्चाई के धरातल पर उतरने को तैयार होने के लिए अपने कदम बढ़ाने लगा था। सभी लोग जोश में थे| सभी में साथ चलने का जज्बा दिखाई देने लगा था| पर फिर भी दिल के एक कोने में जाने क्यों एक डर अपने पैर पसार कर बैठा ही था| पर हमें बढ़ना ही था और इस डर को झूठ साबित करना ही था।

धीरे-धीरे लोग आगे बढ़ने लगे और हम अपने तमाम डर को कहीं पीछे छोड़ते गए| हमारे खिलाफ तमाम परिस्थितियाँ अपना फन फैलाए सामने खड़ी थी पर इन सभी की कोई प्रवाह न करते हुए हमलोगों ने सभी इवेंट्स का खाका तैयार कर लिया|

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फ़ोटो प्रदर्शनी, पोस्टर मेकिंग, फ़िल्म उत्सव और गौरव यात्रा। 3 मार्च को फ़ोटो प्रदर्शनी से शुरू हुआ उत्सव 26 मार्च को पोस्टर मेकिंग से होता हुआ 2 अप्रैल को फ़िल्म उत्सव पर पंहुचा, जहां 100 से ज्यादा लोगों की मौजूदगी ने हमलोगों पर सवाल उठाने वालों की बोलती बंद कर दी थी|

और फिर वो दिन भी आया जिसका हम सब बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। 9 अप्रैल यानी कि हमारी पहचान का उत्सव मनाने का दिन| जैसे-जैसे समय गुजरता  गया, लोगों का हुजूम बढ़ता गया| हर तबके और हर समुदाय के लोगों को एकसाथ देखकर मैंने सुकून की सांस ली| उस दिन वहां कोई माँ अपनी बेटी के सपोर्ट में आई थी  तो कोई अपने या भाई का साथ देने आई थी| और कोई अपने दोस्तों का साथ दे रहा था।

मुझे अब भी वो पल याद है जब ये हुजूम लखनऊ के सबसे व्यस्त चौराहे पर पंहुचा तब मैं थोड़ा आगे बढ़कर लोगों के हुजूम को देख रहा था| लोग नारे लगा रहे थे| नाच रहे थे| उस पल उनलोगों को इस बात का तनिक भी डर नहीं था कि उन्हें उनका कोई घर या जान-पहचान वाला देख लेगा| या कि इसके बाद उन्हें लोगों के ताने कही और भी ना सहने पड़ेंगे| उस वक्त सभी हर खौफ को दिलों से मिटाकर खुद को जी लेना चाहते थे। हर तरफ गाड़िया रुकी हुई थी और सड़क के बीचोंबीच सिर्फ और सिर्फ लोग नजर आ रहे थे| ये वो लोग थे जो अपनी पहचान और अस्मिता की लड़ाई लड़ने सड़क पर उतर चुके थे।

इस नज़ारे ने मेरी आँखों को सुकून के आंसुओं से भर दिया था| शायद ये मेरी ख़ुशी और समाज में बेहतरी के उम्मीद के आंसू थे।


ये लेख प्रतीक श्रीवास्तव ने लिखा है|

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