उसके बाद औरत का मुस्कुराता हुआ चेहरा होगा? या फिर दर्द को बयाँ करती उसकी आँखें? या अपनी ज़िन्दगी के लिए सही और गलत का फैसला करने पर संतुष्टि का भाव? या एक खुदगर्ज इंसान की झलक?

अबॉर्शन के बाद किसी औरत के भाव को हम बेहद आसानी से उसके खुदगर्ज या गैर-जिम्मेदार होने से आंकते है| पर इसमें आपका नहीं बल्कि समाज में अबॉर्शन को लेकर प्रचलित धारणाओं का दोष है जिसके तहत हमने हमेशा से ‘अबॉर्शन’ के संदर्भ में यही सीखा है कि ‘ये गलत है|’ ‘असंवैधानिक या अमानवीय है|’ और जब एक औरत इसे खुद चुनती है तो ‘ये एक संज्ञेय अपराध है|’

देश के विकास के साथ हम लाख कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हों पर कुछ मुद्दों पर आज भी हमारी सोच बेहद संकीर्ण है| जिनमें से एक गंभीर मुद्दा है – अबॉर्शन| जिस तरह सेक्स करना किसी भी महिला का अपना फैसला है, ठीक उसी तरह अबॉर्शन भी अपने शरीर, जीवन और भविष्य को लेकर उसका अपना फैसला है| मैं यहाँ अबॉर्शन की वकालत नहीं कर रही और न ही मैं इसे असंवेदनशील बनाने की कोशिश कर रही हूँ| मेरी इन बातों का सीधा मतलब यह है कि जिस तरह काम करना, खाना-नहाना, चलना-फिरना या किसी के साथ सेक्स करना हमारा अपना फैसला है, ठीक उसी तरह अबॉर्शन भी किसी भी स्वस्थ महिला का अपना फैसला है और जिसके आधार पर महिला के चरित्र, संस्कार या व्यक्तित्व पर सवाल खड़े करना मूर्खतापूर्ण है|

हमारे समाज में अबॉर्शन एक ऐसा विषय है जिसके बारे में हर किसी की एक मजबूत राय होती है| फिर चाहे वो इसका समर्थन करते हों या इसके खिलाफ हों| साथ ही इससे जुड़े कई सारे गलत मिथ्य भी समाज में प्रचलित है जिनके आधार पर अबॉर्शन को लेकर लोगों के मन में कई सारी गलत धारणाएं अपनी पैठ मजबूत कर लेती है| इस लेख में हम अबॉर्शन से जुड़ें ऐसे ही कुछ गलत मिथ्य की चर्चा करेंगे|

 मिथ्या 1 गर्भसमापन करवाना गैर क़ानूनी है|

बिल्कुल नहीं| भारत में, अलग-अलग परिस्थितियों में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 के तहत 12-20 सप्ताह तक की गर्भावस्था में गर्भसमापन है|

मिथ्या 2 : गर्भसमापन बाँझपन की वजह बन सकता है|

एक से अधिक बार भी करवाया गया गर्भपात आपके आगे की स्वस्थ गर्भावस्था पर कोई बुरा असर नहीं डालेगा| लेकिन किसी भी और चिकित्सा प्रक्रिया की ही तरह गर्भपात के भी अपने खतरे हैं| अगर इस दौरान कोई जटिलता आती है, तो उर्वरता पर बुरा असर पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता| लेकिन अगर गर्भपात पहली तिमाही में कर दिया जाये तो यह फीसद केवल 0.05 % ही होता है – इसलिए यह प्रक्रिया सुरक्षित है|

मिथ्या 3: गर्भसमापन आगे चलकर स्तन कैंसर का कारण बन सकता है|

यह एक गलत धारणा है| करीब पन्द्रह लाख महिलाओं पर किये गए सर्वे ये दर्शाते हैं की गर्भसमापन से स्तन कैंसर का कोई खतरा नहीं है| स्तन कैंसर की संभावना गर्भसमापन की बजाय तब ज्यादा होती जब आपके परिवार में किसी को स्तन कैंसर की समस्या रही हो|

मिथ्या 4 : सिर्फ युवा और गैर ज़िम्मेदार महिलाएं गर्भसमापन कराती हैं|

ऐसा कहना बिल्कुल गलत है| पहली बात यह है कि कोई भी गर्भ निरोधक सौ फीसद असरकारक नहीं होता है| गर्भसमापन का युवा होने या गैर जिम्मेदार होने से कोई लेना-देना नहीं है| लेकिन पितृसत्ता में यह महिलाओं पर शिकंजा कसने का ज़रूर एक जरिया है| अपनी शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के आधार पर अगर कोई महिला गर्भसमापन करवाने का फैसला लेती तो यह कहीं से उसे गैर जिम्मेदार साबित नहीं करता है|

और पढ़ें: अनसेफ रिलेशन से ज्यादा सेफ है अबॉर्शन

मिथ्या 5 : गर्भपात कारवाने वाली महिला को भावनात्मक तकलीफ होती है|

ऐसा ज़रूरी नहीं है| महिलाएं जब स्वयं सोच-विचार कर गर्भपात करवाने का फैसला लेती है तो ऐसे में उनमें किसी भी तरह की भावात्मक तकलीफ की समस्या नहीं होती है| वहीं दूसरी ओर अगर किसी शारीरिक समस्या की वजह से महिला को न चाहते हुए भी गर्भपात करवाना पड़े तो यह ज़रूर उन्हें भावात्मक तकलीफ दे सकता है| साथ ही, गर्भधारण करने के जितने ज्यादा समय बाद गर्भपात करवाया जाएगा महिला में भावात्मक तकलीफ होने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है|

मिथ्या 6: गर्भधारण एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत होती है|

यह तथ्य नहीं सोच है| अपनी-अपनी सोच है, क्यूंकि असल में जीवन के शुरू होने के सही पल के बारे में कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है| कुछ लोग मानते है कि जीवन गर्भाधान से शुरू होता है जबकि कुछ लोग  मानते हैं की जीवन शिशु के जन्म लेने के बाद शुरू होता है| आप इसमें से क्या मानते हैं, यह आपका अपना निर्णय है, जो धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करता है| मानवाधिकार संबंधी कई अन्तर्राष्ट्रीय संधियों में यह माना गया है कि जन्म के बाद से ही इंसान का जीवन होता है, न कि गर्भाशय में उसका विकसित होने जीवन कहलाता है|

तथ्य यह है कि भ्रूण में केवल गर्भाधान के  24 से 28 हफ़्तों तक ही जीवन सक्षम है| उसके बाद इसे बच्चादानी की ज़रूरत पड़ती है और यह समय गर्भपात की निश्चित समय सीमा से काफी बाहर है|

मिथ्या 7: गर्भपात घर में आसानी से संभव है|

ऐसा कतई नहीं है| आपने गरम पानी, अरंडी के तेल या विटामिन-सी के डोज़ के बारे में जो भी कहानियां सुनी हैं, वो सही नहीं हैं| इनसे आपके शरीर को नुक्सान पहुंचेगा| गर्भपात करने का सही तरीका केवल शल्य चिकित्सा ही है और सभी मापदंडों के बारे में पहले डॉक्टर से सलाह करना ज़रूरी है|

मिथ्या 8: गर्भपात के दौरान भ्रूण में दर्द महसूस होता है|

वैज्ञानिकों का मानना है की भ्रूण में आखिरी तिमाही तक दर्द जैसी कोई संवेदना होती ही नहीं| भ्रूण के तंत्रिका तंत्र का गर्भावस्था के दौरान इतना विकास नहीं होता की उसमे दर्द जैसी कोई संवेदना हो|

अबॉर्शन के जुड़े इन तमाम गलत मिथ्यों को जानने के बाद अब आप इस मुद्दे पर क्या नजरिया रखते हैं?

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1 COMMENT

  1. Dear Faye,
    Appreciate your zeal in dealing with the rape of a 10 year old. You mentioned introduction of sex education in schools. The Equivalent of sex education under the term”Family Life Education” was introduced in schools, — Govt, KVs, & Public Schools in the mid 80s by the NGO Parivar Seva Sanstha. I was part of this pioneer programme. It was later supposed to be taken up by NCERT who introduced a diluted version through topics in various books, english, social studies, general science, in abstract terms with reference to plants, not humans. The impact would have been lost. I wrote & published 3 booklets for different age-groups titled ‘Learning to Fly’ translated into hindi under the behest of Janaki Rajan the Director of MCD schools in the early nineties. She got transfered before they got printed. These booklets may seem out-dated today as children are more aware today with the advent of social media.
    What is required today are counselling centres attatched to schools, hospitals, nursing homes where children, teens, can be encouraged to seek advice / discuss their apprehensions.
    Do keep up the good work. You actually succeeded in ‘bolti band’ of your panelists as you summed up. God bless

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