यूँ तो बनारस सदियों से प्रसिद्ध शहरों में रहा है| समय के हिसाब से अपनी अलग-अलग खासियत के चलते बनारस का पान, साड़ी, गलियाँ और अब देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के तौर पर बनारस की हर बात सुर्खियाँ बटोरती है| हाल ही में, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के महिला महाविद्यालय (एमएमवी) से खबर आई कि वहां के हास्टल से एक लड़की को इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि वो लेस्बियन थी| पर इस खबर ने बनारस की बाकी खबरों की तरह सुर्खियाँ नहीं बटोरी| इसकी कई वजहें हो सकती है…जिसपर विस्तार से चर्चा फिर कभी होगी| आज सिर्फ चर्चा इस संवेनशील खबर पर जिसका ताल्लुक सीधे से मानवाधिकार और सम्मान से जुड़ा है| चूँकि मैं खुद भी एमएमवी की स्टूडेंट रही हूँ इसलिए इस घटना पर न केवल प्रशासन बल्कि छात्राओं से मिली पुख्ता जानकारी के आधार पर ही मैंने इस खबर पर इस लेख को तैयार किया|

लड़कियों की शिकायत बनी सजा का आधार

एमएमवी की कुछ छात्रायें मिलकर इस घटना के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठा रही है जिसके लिए उन्होंने एमएमवी हास्टल के नियम संबंधित जानकारियों के लिए आरटीआई भी फाइल किया है| उन्हीं में से एक छात्रा (जो कि मौजूदा समय में वहां की स्टूडेंट है और एमएमवी हास्टल में रहती है) ने इस घटना के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि जिस अंडरग्रेजुएशन की छात्रा के ऊपर यह आरोप लगाया गया उससे कोई भी संपर्क नहीं हो पा रहा है, क्योंकि उसने अपना फ़ोन बंद किया हुआ है| लिहाजा शुरूआती दौर में इस घटना के बारे में उसके साथ रहने वाली लड़कियों और एडमिनिस्ट्रेशन से ही हमें जानकारी मिल पायी है|

‘मानसिक समस्या से पीड़ित थी छात्रा’ – वार्डन

छात्रा ने बताया कि हास्टल की वार्डन से जब हमलोगों ने इस घटना के बारे में जानने की कोशिश की तो उन्होंने बताया कि उस लड़की के खिलाफ अट्ठारह लड़कियों ने लिखित तौर पर शिकायत दी थी कि वो लड़की अपने साथ ही लड़कियों को सेक्सुअली परेशान करने की कोशिश करती थी| लड़कियों की इस शिकायत को जब प्रिंसिपल तक पहुंचाया गया तो लड़की को बुलाकर उसे समझाया गया और कुछ दिनों का समय देकर कहा गया कि अगर तुम इन लड़कियों (शिकायत करने वाली अठ्ठारह लड़कियां) के आरोप से और पनिशमेंट से बचना चाहती हो तो तुम्हें अपने पक्ष में यह साबित करना होगा कि तुम लेस्बियन नहीं हो और इनसे ज्यादा लड़कियों के साइन उसपर करवाकर हमें देना होगा| पर मोहलत के अंतिम दिन उस लड़की ने जब अपने पक्ष में प्रिंसिपल को लेटर दिया तो उसमें केवल चार लड़कियों के ही साइन थे| इसके बाद लड़की के भाई और माँ को प्रिंसिपल ने बुलवाया और उसे हास्टल से निकाल दिया गया|

‘लेस्बियन’ शब्द को ही सही नहीं मानते हुए इसे सीधे साइकोलॉज़िक्ल प्रॉब्लम बताया जा रहा है|

साथ ही वार्डन ने बताया कि शिकायत करने वाली लड़कियों ने बताया कि अक्सर वो लड़की अपने साथ रहने वाली लड़कियों से साथ गलत तरीके के यौनिक व्यवहार करने की कोशिश करती थी और जब कभी भी उसकी शिकायत करने की बात कही जाती तो आत्महत्या करने की धमकी देती थी| कुछ लड़कियों ने ये भी बताया कि कई बार वो लड़की अपने कमरे में चिल्लाती थी, रोती थी और अपना सिर दीवाल पर मारती थी| उसकी इन सब हरकतों से साफ़ लगता था कि वो किसी मानसिक बिमारी से पीड़ित है| नतीजतन लड़कियों ने गोपनीय तरीके से उस लड़की के खिलाफ अपनी शिकायत की|

नहीं दिया मौका अपनी बात रखने का

इन सबके बीच कई लड़कियों का ये भी कहना है कि उस लड़की को अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया गया और उसे सिर्फ ये कहकर हास्टल से निकाला गया कि ‘वो लेस्बियन है|’ कुछ लड़कियों ने बताया कि उस लड़की को प्रिंसिपल रूम में उसके भाई और माँ के सामने बुरी तरह बेईज्ज्त किया गया और भली-बुरी बातें भी कही गयी|

सामने आ रहे है घटना के पेचीदा पहलू

इस पूरी घटना पर प्रशासन और स्टूडेंट्स से कई तरह की जानकारियाँ मिल रही है| कोई लड़की को बेक़सूर बता रहा तो कोई मानसिक रूप से पीड़ित| लेकिन इनमें एक वाजिब पक्ष यह भी है कि अगर वह लड़की अपने साथ रहने वाली लकड़ियों के साथ उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर उनके साथ गलत यौनिक व्यवहार करती थी तो इसके लिए उसे सजा मिलनी चाहिए| पर जब तक लड़की स्वयं आमने आकर इस मुद्दे पर अपने पक्ष नहीं रखती तब तक किसी भी निर्णय पर पहुंचना सही नहीं होगा| क्योंकि इस घटना के कई और भी पहलू धीरे-धीरे सामने आ रहे है|

जिनमें से एक यह है कि – इस मुद्दे पर जब एक न्यूज़ वेबपोर्टल ने बकायदा कॉलेज की वार्डेन से बातचीत की और उनसे पूछा कि उस लड़की को क्या दिक्कत थी? तो इसपर वार्डेन ने साफ़ कहा कि उसे साइकोलॉज़िक्ल प्रॉब्लम थी| इसपर जब बातचीत करने वाले रिपोर्टर ने पूछा कि क्या उसका लेस्बियन होना उसकी साइकोलॉज़िक्ल प्रॉब्लम है? इसपर वार्डन ने जवाब दिया कि ‘देखिये ऐसे शब्द का प्रयोग हम नहीं करते हैं, ये शब्द सही नहीं है| गौर करें कि यहाँ ‘लेस्बियन’ शब्द को ही सही नहीं मानते हुए इसे सीधे साइकोलॉज़िक्ल प्रॉब्लम बताया जा रहा है|

यह दलील देकर सजा दी जाए कि वो लेस्बियन है या गे है…ये पूरी तरह से गलत है|

दूसरे ज़रूरी पहलू के बारे में मुझे छात्रा ने बताया कि जब धीरे-धीरे ही सही एमएमवी की यह घटना सुर्ख़ियों में आने लगी तो इसपर हास्टल की वार्डेन ने छात्रा से कहा कि तुम्हारे जान-पहचान में अगर इस खबर को लिखने वाले लोग है तो उन्हें कहो कि इस मुद्दे पर न लिखे|यहाँ संशय का विषय यह है कि प्रशासन ने जब अब अपना निर्णय ले लिया है तो फिर इसपर लिखे जाने से (वो भी उनके बतायी जानकारियों के आधार पर) इतना डर क्यों?

तीसरा पहलू यह है कि छात्रा से अपने पक्ष में लिखे लेटर में न केवल खुद पर लगे आरोपों को गलत साबित करने की बात हुई बल्कि यह भी मेंशन किया गया कि वह साबित करे कि ‘वो लेस्बियन नहीं है|’

इन तीनों पहलुओं ने इस घटना को और भी पेचीदा रूप दे दिया है क्योंकि इसमें होमोसेक्सुअल के मुद्दे पर विश्वविद्यालय प्रशासन के विचार तो सामने आ ही रहे है| वहीं दूसरी ओर, प्रशासन की दी गयी जानकारी के आधार पर इस मुद्दे का खबरों के आने से उनकी बौखलाहट, कई और पहलुओं की तरफ भी इशारा कर रही है|

पर होमोसेक्सुअल के मुद्दे पर प्रशासन की सोच पर ज़रूर गौर करना होगा कि यह बात एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय की है जो अपनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए दुनियाभर में जाना जाता है, जहाँ जेंडर के नामपर पूरा एक अलग भी केंद्र है, ऐसे में अगर किसी भी लड़की या लड़के को उसकी गलती की बजाय यह संबोधित करके या यह दलील देकर सजा दी जाए कि वो लेस्बियन है या गे है…ये पूरी तरह से गलत है| सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में राइट टू प्राइवेसी पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया था कि सेक्सुअल आधार पर किसी भी तरीके का भेदभाव मान्य नहीं होगा| आखिर में अगर एक पूर्व-छात्रा के तौर पर मैं अपने अनुभव की बात करूँ तो यह ज़रूर कहूंगी कि विश्वविद्यालय में एमएमवी एक अलग ही दुनिया है, जहाँ मैंने कई बार नियम-अनुशासन के नामपर प्रशासन की तानाशाही भी देखी तो वहीं स्वतंत्रता के नामपर स्टूडेंट्स के स्वछंद रूप का बिगड़ा रूप देखा है| इसलिए जब तक इस घटना से संबंधित हर पहलू सामने न आ जाए कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा|

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