सोनिया चोपड़ा

हमारे भारत देश में महिलाएं देश की आबादी का आधा हिस्सा हैं लेकिन राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम है। आजादी के सत्तर साल के बाद आज भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पाई है। महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। पर इन सबके बावजूद, राजनीतिक हिस्सेदारी के मामले में सभी पार्टियों का रवैया करीब एक जैसा है। विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है| इसलिए पार्टियों का तर्क है कि सरकार बनाने के लिए जिताऊ उम्मीदवारों को टिकट देना उनकी मजबूरी है।

आजादी के सात दशक बाद भी संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 12 फीसद है। विधान सभाओं, लोकसभा और  राज्य सभा में महिलाओं को 33 f फीसद आरक्षण देने के लिए साल 1996 में देवेगौड़ा सरकार के समय बिल लाया गया था, जो 22 सालों के बाद भी लंबित है। इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन और यूएन वुमन रिपोर्ट के अनुसार इस समय लोकसभा में 64 (542 सांसदों का 11.8 फीसद) और राज्यसभा में 27 (245 सांसदों का 11 फीसद) महिला प्रतिनिधि हैं। अक्तूबर, 2017 के आंकड़ों के अनुसार 4118 विधायकों में से सिर्फ 9 फीसद महिलाएं हैं।

महिलाओं का हिस्सा सिर्फ बारह फीसद

महिला अधिकार संगठनों के गठबंधन “द नैशनल अलायंस फॉर द वुमन रिजर्वेशन बिल” के एक शोध के मुताबिक गत वर्ष जिन पांच राज्यों- पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर में विधानसभा चुनाव हुए हैं| वहां महज 6 फीसद महिला उम्मीदवारों को ही चुनाव लड़ने का मौका मिला है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी संसद के दोनों सदनों में कुल 12 फीसद है। साल 2010 में संसद और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीट आरक्षित करने वाला विधेयक उच्च सदन द्वारा पारित किया जा चुका है| लेकिन निचले सदन यानि लोकसभा में यह अब तक चर्चा के लिए भी पेश नहीं किया जा सका है।

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विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी अपने पड़ोसी देशों से भी कम है। पाकिस्तान में महिलाओं की भागीदारी करीब 21 फीसद, अफगानिस्तान में 28 फीसद, नेपाल में 30 फीसद और बांग्लादेश में 20 फीसद है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अगर महिलाओं की भागीदारी इसी तरह से कम रही तो लिंग असंतुलन को पाटने में पचास साल से अधिक समय लगेंगे। हालांकि एक उम्मीद की किरण यह है कि महिलाएं जागरूक हुई हैं और अपने मताधिकार का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने लगी हैं। पंचायतों और नगर निकायों के मामले में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसका सीधा-सा कारण कई राज्यों में पंचायतों और नगर निकायों में 50 फीसद आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई है, जिसके कारण पंचायतों और नगर निकायों में 12.7 लाख महिला प्रतिनिधि अपना दायित्व बखूबी निभा रही हैं और पंचायतों और नगर निकायों में इनकी संख्या 43.56 फीसद हो गई है।

सुधार के लक्षण लेकिन बदलाव नदारद

उत्तर प्रदेश में बीते सालों में हुए विधानसभा चुनावों में विधानसभा की कुल 403 सीटों में से 41 सीटों पर महिला विधायक चुनी गई हैं| जबकि पिछली विधानसभा में केवल 36 महिलाएं ही विधायक बन पाई थीं। पंजाब में सम्पन्न हुए चुनावों में विधानसभा की कुल 117 सीटों में से केवल 6 महिलाएं ही विधायक चुनी गई हैं जबकि 2012 यानि पिछली विधानसभा में 14 महिलाएं चुनाव जीतकर विधायक बनी थीं। राजस्थान में पिछली विधान सभा में 29 महिला विधायक चुनी गई थीं जबकि वर्तमान में 200 सीटों वाली विधानसभा में केवल 27 महिला विधायक हैं। मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटों में से 30 पर महिला विधायक हैं।

बिहार की वर्तमान विधानसभा में भी महिला विधायकों की संख्या घटकर 28 रह गई है जबकि पिछली विधानसभा में कुल 243 सीटों में से 34 पर चुनाव जीतकर महिलाएं विधायक बनी थीं। पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 39 महिला विधायक हैं जबकि पिछली विधानसभा में इनकी संख्या 33 थी। पश्चिम बंगाल और केरल ऐसे राज्य रहे हैं, जहाँ महिला मुख्यमंत्रियों ने अपनी पार्टियों की ओर से अधिक महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था और उनकी अधिक महिला विधायक चुनी गयी हैं। पश्चिम बंगाल में सुश्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी की 15 फीसद महिलाओं को टिकट दिया था। असम में भी पिछली विधानसभा की अपेक्षा महिलाओं की संख्या घटी है। पिछली बार 14 महिला विधायक थीं जबकि इस बार केवल 8 ही जीतकर विधानसभा में पहुंच पाई हैं। हिमाचल में बीते नवम्बर माह में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में दो प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस ने 67 सदस्यीय विधानसभा के लिए क्रमश: भाजपा ने 6 और कांग्रेस ने 5 महिलाओं को टिकट दिया था। इनमें केवल तीन ही जीत कर विधायक बन पाई हैं जबकि पिछली बार भी विधानसभा में कमोवेश यही स्थिति थी।

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गुजरात में इस बार बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने 2012 के विधानसभा चुनावों की तुलना में कम महिलाओं को मुकाबले में उतारा और नई विधानसभा में उनकी संख्या घट गई है। इस बार 13 महिलाएं ही विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो पाई हैं जबकि 2012 में 16 महिलाएं चुनी गई थीं। भाजपा की 9 और कांग्रेस से 4 महिलाएं विधानसभा के चुनी गई हैं। भाजपा ने इस बार के चुनाव में 12 महिलाओं को टिकट दिया था, जबकि कांग्रेस ने 10 महिलाओं को उतारा था। साल 2012 के चुनाव में दोनों मुख्य दलों ने 33 महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया था। उस समय भाजपा ने 19 को और कांग्रेस ने 14 को चुनावी मुकाबले में उतारा था और उसमें विजेताओं में 12 भाजपा से और 4 कांग्रेस से थीं।

पिछले बीस सालों में इस अनुपात में थोड़ा सा सुधार हुआ है लेकिन कुल मिलाकर तस्वीर नहीं बदली है लेकिन पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का जितना असर विधानसभाओं में दिखाना चाहिए था उतना नहीं हुआ है। निम्नस्तर से महिला नेतृत्व तैयार हो रहा है। चुनाव में महिलाएं अब पुरुषों के बराबर वोट डाल रही हैं लेकिन सभी पार्टियों पर मर्दों दबदबा है। असली दिक्कत यह है कि पार्टियाँ महिलाओं को टिकट देने के लिए ही तैयार नहीं है।

पितृसत्ता की महिला प्रतिनिधि

दरअसल महिलाओं की आवाज़ इन आंकड़ों से भी बहुत कमजोर है। महिला उम्मीदवारों, विधायकों और सांसदों में एक बड़ी संख्या उन बहू बेटियों की है जो राजनीतिक घरानों से आयीं है, जिनका अपना स्वतंत्र वजूद नहीं है। राजनीतिक मजबूरी के चलते परिवार के मर्द के बजाय औरत को चुनाव में खड़ा किया जाता है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद यह महिलाएं मर्दों के हिसाब से काम करती हैं। इन महिला प्रतिनिधियों का महिलाओं के मुद्दों से कोई खास वास्ता नहीं होता और वैसे भी महिला सांसदों और विधायकों को मंत्रिमंडल में केवल समन्वय बनाने के लिए जगह मिलती है।

महिलाएं महिला कल्याण और बाल कल्याण विभाग की मंत्री तो बनाई जाती हैं लेकिन चंद अपनायें को छोड़कर ताकतवर मंत्रालयों से महिलाओं को दूर ही रखा जाता है। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का जितना भी दंभ भर लें लेकिन सच्चाई यह है कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में हमारे शक्तिशाली सदन अभी शैशवकाल में ही नजर आते हैं।

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हमारी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की आवाज़ दबी रहने का असर सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है। ज्यादा महिलाओं के चुने जाने से हमारी संसद और विधानसभाएं एकदम शक्तिशाली भले ही न हो जाएँ लेकिन उनकी मौजूदगी से महिलाओं का सशक्तिकरण तो जरूर होगा। अगर सांसद और विधायक महिलाएं होंगी तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन प्रताड़ना के मामलों में पुलिस और प्रशासन पर दबाव जरुर पड़ेगा।

असली सवाल यह है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या कैसे बढ़े? महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाने के लिए कानूनी मजबूरी का सहारा लेना पड़ता है। इसी परिकल्पना को साकार करने के लिए 1996 में महिला आरक्षण बिल संसद में लाया गया था और इसमें यह प्रस्ताव किया गया था कि लोकसभा और विधानसभाओं की 33 फीसद सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जायेंगी। हालांकि इस बिल में कुछ कमजोरियां थी लेकिन 20 साल बाद भी उसपर चर्चा न होना राजनीतिक दलों की मानसिकता तो दर्शाता ही है।


ये लेख सोनिया चोपड़ा ने लिखा है|                                                                                              (फ़ोटो साभार : गूगल)

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