सुजाता हिंदी की महत्वपूर्ण कवि और स्त्रीवादी लेखक हैं। उनका एक कविता संकलन ‘अनन्तिम मौन के बीच’ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित किया गया है। उनका लिखा गया एक उपन्यास और स्त्रीवाद पर एक किताब जल्द ही प्रकाशित होने वाली है। आप पाठकों से साझा कर रही हूँ उनसे मेरी बातचीत के कुछ अंश –

मानवी : आपने लिखना कब शुरू किया और किन बातों ने आपको लिखने के लिए प्रेरित किया?

सुजाता : पीएचडी के साथ शोधपरक लेखन और स्त्रीवाद में विशेष रुचि की शुरुआत हुई। मैं अकादमिक पर्चे और
पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखती रही| लेकिन रचनात्मक लेखन नहीं छोड़ा। पिछले साल कविता-संग्रह आया भारतीय
ज्ञानपीठ से। एक उपन्यास और स्त्री विमर्श पर एक किताब इस साल के मध्य तक आएगी।

मानवी : किन लेखकों का लेखन आपको बेहद पसंद है?

सुजाता  : ऐसे बहुत सारे लेखक हैं जिन्हें पढ़ती और पसंद करती आई हूँ| वैसे मुझे कृष्णा सोबती जी का लेखन
बहुत पसंद है। मुझे उनकी भाषा और रचनाओं के सशक्त स्त्री किरदार बहुत पसंद आते हैं|

मानवी : आप हिंदी के शुरुआती ब्लॉगर्स में से रहीं हैं और चोखेर बाली (ब्लॉग) संचालित करती हैं, उसकी
शुरुआत के बारे में कुछ बताएं ?

सुजाता : जब हमने ब्लॉगिंग करना शुरू किया था तो हमें यह लगा था कि यहाँ की दुनिया ज़्यादा सभ्य और खुले
विचारों की होगी क्योंकि ज़ाहिर है जितने भी ब्लॉगर्स थे, वे सभी देश – विदेश में बैठे शिक्षित लोग थे। लेकिन जब हम
स्त्रियां ब्लॉगिंग ( हिंदी ब्लॉगिंग ) के क्षेत्र में आईं तो हमारा लिखना इन लोगों को नागवार गुज़रा। जैसे यह तो सिर्फ
पुरुषों की ही दुनिया है, यहाँ स्त्रियां कैसे आ सकतीं हैं और वाकई हिंदी ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में पुरुष ब्लॉगर्स ही
अधिक थे| सिर्फ कुछ ही पढ़ी – लिखी महिलाएं ब्लॉगिंग कर रही थीं। पर इसके बाद भी महिलाओं को ब्लॉग जगत में
ट्रोलिंग झेलनी पड़ रही थी। इसके अलावा ब्लॉगिंग कर रही महिलाओं को अपने आसपास, निजी जीवन में भी
बातें सुननी पड़ती थीं – जैसे वे क्यों ब्लॉगिंग कर रही हैं ? यह तो फालतू शौक हैं| रसोई संभालनी चाहिए, इतना ही
समय है तो आचार – पापड़ बनाए, क्या दिनभर ब्लॉग पर समय बर्बाद करती हैं| किचन कौन संभालता होगा,
इत्यादि।

मतलब यह मानसिकता है कि स्त्रियां तो बनी ही रसोई के लिए हैं| इसके अलावा गर वे कुछ करतीं हैं तो उसे समय
बर्बाद करना मान लिया जाता है| हाँ, अगर नौकरी कर रही हैं तो अलग बात है क्योंकि उससे घर में एक्स्ट्रा इनकम
आती है| लेकिन इसके अलावा, वे अपना कोई शौक या कोई निजी स्पेस तलाशती हैं तो फिर वह फालतू बात मान ली
जाती है| लेकिन पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है, वे नौकरी करें, ब्लॉगिंग करें या अपने कोई भी शौक पूरे करें, उन्हें कोई
टोकने वाला नहीं है जैसे यह तो सिर्फ उनका हक है| इन सब बातों को देखते हुए, हमने कुछ स्त्रियों के साथ मिलकर ‘चोखेर बाली; (ब्लॉग) की शुरुआत की|

चोखेर बाली के ज़रिए न केवल साझा स्त्री प्रश्नों पर सदस्यों ने लेखन किया| बल्कि इस तरह के पोस्ट समय – समय पर आते रहे जो देखने में साधारण थे लेकिन जिनसे स्त्री विमर्श की थ्योरी इमर्ज होती है। चोखेर बाली के ज़रिए हमने न केवल भाषा पर बल्कि कंटेंट पर भी अपना नियंत्रण स्थापित करने के प्रयास किए। बदलाव का एक माहौल तैयार हुआ। हम स्त्रियां न केवल अपनी बात कहती रहीं बल्कि ट्रोलिंग करने वालों से भी निपटती रहीं, अगर कोई अपने या किसी और के ब्लॉग पर असभ्य भाषा का उपयोग करता या कोई भी स्त्री-विरोधी बात कहता तो हम उसे तुरंत टोकते। शुरुआत में या तो हमें उपेक्षा और चुप्पी मिली या उपहास और आलोचना। सलाहें खूब जमकर मिलीं जैसे हम अबोध बालिकाएँ पथभ्रष्ट हो जाएंगी और हमें बचाने का पुनीत कर्तव्य मर्द ही कर सकते हैं। लेकिन धीरे – धीरे हमारी कोशिशों का यह प्रभाव हुआ कि
कहीं कोई कुछ अनुचित लिख रहा होता तो लोग कहते कि “अरे ऐसा मत लिखो| चोखेर बालियां आ जाएंगी|’

मानवी : आपकी आने वाली किताब के बारे में कुछ बताएं?

सुजाता : स्त्रीवाद क्या है ? बहुत से लोगों को शुरुआत में यह बात बहुत उलझाती है। मेरी आने वाली किताब में
इसका जवाब देने की कोशिश की गई है। एक शुरुआत की जा सकेगी इस किताब से – स्त्रीवाद को जीवन और थ्योरी
के स्तर पर समझने की। कुछ महत्वपूर्ण किताबों की समीक्षा भी इस किताब में शामिल होगी।

मानवी : हिंदी के फेमिनिस्ट लिटरेचर के बारे में आप क्या सोचतीं हैं ? क्या कोई ऐसा विषय है जिसपर अब
तक चर्चा नहीं की गई है ?

सुजाता :  ‘स्त्री लेखन’ और ‘स्त्रीवादी लेखन’ को अलग – अलग समझने की ज़रूरत है। हालांकि स्त्री का लिखना
साहित्य के क्षेत्र में अपना स्पेस क्लेम करना ही है। लेकिन स्त्रीवादी लेखन के लिए हमारे यहाँ प्रशंसित नहीं। कविता
का इलाक़ा तो बेहद क़िलाबद्ध है। स्त्री – कवि इस वक़्त बड़ी संख्या में लिख रही हैं लेकिन कोई मज़बूत पहचान नहीं
बना पा रही हैं। कथा – लेखन में स्त्रियों ने बहुत अच्छा काम किया है। एक तो आलोचना के क्षेत्र में स्त्रियों को आना
होगा। हमें अच्छे स्त्री – आलोचक चाहिए और साथ ही स्त्री – पाठक भी। स्त्रीवाद की कुछ समझ के साथ जब तक
हमारे पास स्त्रियाँ पाठक के रूप में नहीं बढ़ेंगी, तब तक स्त्री – लेखन का वास्तविक मूल्यांकन नहीं होगा।

मानवी : आप नए लेखक / लेखिकाओं और उन लोगों के लिए जो फेमिनिज़्म के कॉन्सेप्ट को समझ
रहें हैं, इस क्षेत्र में काम कर रहें हैं उन्हें आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

सुजाता : मैं यह ज़रूर कहूंगी कि जल्दबाज़ी में नतीजों पर न पहुंचें। स्त्रीवाद के क्लासिक्स को ज़रूर पढ़ें।
स्त्रीवाद के सवालों को निजी के दायरों से निकालकर क्लास, जेण्डर और रिलीजन तक ले जाने की कोशिश करें तो
भविष्य के लिए बहुत लाभकारी होगा।


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