कमलेश माथेनी

हाल ही में आई दंगल फिल्म में एक छोटा सा दृश्य है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी बात कहता है। उस दृश्य में महावीर सिंह फोगाट अपनी बेटियों गीता और बबिता रोज सुबह दौड़ने के लिए कहते हैं। वो रोज दौड़ने भी निकलती हैं। लेकिन कुछ दिन दौड़ने के बाद दोनों अपने पिता से बोलती हैं कि पापा सूट में दौड़ा नहीं जाता। तब उनके पिता महावीर सिंह दोनों को निक्कर और शर्ट पहनने के लिए देते हैं और दोनों उन्हें पहनकर बिना परेशानी के दौड़ भी लगाती हैं।

फिल्म का यह छोटा-सा दृश्य स्त्री-पुरुष के बीच पहनावे में उस भेदभाव की ओर ईशारा करता है, जिसने औरत को असुविधाजनक कपड़ों में बांध दिया है। हमारे समाज में स्त्री-पुरुष के लिए अलग-अलग पहनावा तय किया गया है। समय के साथ इसमें बदलाव भी आए लेकिन लड़कियों के पहनावे में बदलाव अब भी लोग सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते।

औरत की सक्रियता पर कपड़ों से शिकंजा

औरत के लिए तय किए गए कपड़े ऊपरी तौर पर तो असुविधाजनक नहीं लगते क्योंकि वो रोज उन्हें पहनकर चलती हैं और अब उसे आदत बना लिया है| लेकिन अगर स्त्री और पुरुष के कपड़ों की तुलना की जाए तो अंतर साफ नजर आता है। बच्चियों और महिलाओं के कपड़े न सिर्फ इस तरह तय किए गए हैं कि पूरा शरीर ढक दें बल्कि इन कपड़ों की वजह से  उनकी सक्रियता और चुस्ती-फुर्ती भी कम हो जाती है।

लड़कियों के पहनावे में बदलाव अब भी लोग सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते।

बचपन से ही देखें तो एक उम्र के बाद लड़कियों को फ्रॉक और स्कर्ट पहनाना शुरू हो जाता है। फ्रॉक एक ऐसा पहनावा है, जिसमें तेजी से भागना-दौड़ना और तुरंत उठना-बैठना मुश्किल होता है। ऊपर से लड़कियों को अपना शरीर छुपाने को लेकर भी माता-पिता अति सजग करने लगते हैं। अब फ्रॉक और स्कर्ट जैसे पहनावे में लड़कियों को हमेशा उसे सिमटा कर बैठना या दौड़ते हुए उड़ने से बचाना पड़ता है। वहीं पैंट-शर्ट जैसा पहनावा इन सब चिंताओं से मुक्त होता है।

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इसी तरह बड़े होने पर सूट-सलवार और चुन्नी पहनने के लिए दे दिए जाते हैं। ये ऐसा पहनावा है जिसमें लड़कियों को आधा ध्यान अपनी चुन्नी संभालने पर ही लगाना पड़ता है। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर क्यों हमारे यहां लड़कियों का सीना दिखना बुरा माना जाता है? इसलिए चुन्नी की अनिवार्यता हमेशा उसके दिमाग में घूमती रहती है। वहीं बिना जेब के इन कपड़ों के साथ उसे एक हैंड बैग तो हमेशा ले जाना पड़ता है। इस सब के साथ अगर तेजी से चलना या दौड़ना पड़ जाए तो कितना असुविधाजनक होगा ये हम खुद सोच सकते हैं और फिल्म में भी देख ही चुके हैं। यही हाल साड़ी का है। पल्ला संभालना और जरा-सा दौड़ने पर साड़ी का टांगों में फंसना या ढीला होने का डर होना स्वाभाविक है। ऊपर से इन्हें पहनने में लगने वाला समय भी अपने आप में एक दिक्कत है।

कपड़ों में प्रत्यक्ष है लैंगिक भेदभाव

अब अगर बुर्के की बात करें तो उसमें ठीक से चल पाना तक मुश्किल लगता है। गर्मी-सर्दी हमेशा दुगने कपड़ों को शरीर ढोना ऐसे ही आपको थका देगा। उस पर चेहरा छुपाने की जद्दोजहद और उलझाकर रख देती है। आधुनिक जमाने के साथ आए गाउन, फ्रॉक और लहंगे वाले सूट सभी व्यक्ति की एक्विटी को धीमा कर देते हैं। इनके अलावा हील पहनना भी नुकसान करता है। धीरे-धीरे चल पाना और पैरों में दर्द होना हील के ये साइडइफेक्ट्स साफ दिख जाते हैं। लेकिन अच्छा दिखने के लिए वो सारी दिक्कतें नजरअंदाज कर देती हैं। पर दिक्कतें सहकर वो उससे होने वाले नुकसान को कम नहीं कर सकतीं।

आज अगर लड़कियां अपने पहनावे में बदलाव लाने की कोशिश करती हैं, तो उस पर संस्कृति का हवाला देकर सवाला खड़े किए जाते हैं।

दूसरी तरफ, लड़कों के कपड़ों को देखें तो उनके कपड़े उन्हें सक्रिय बनाये रखने में मदद करते हैं। वक्त के साथ पैंट शर्ट और जींस शर्ट-टीशर्ट जैसे कपड़े उनके पहनावे का हिस्सा बन गए हैं। अमूमन हम अपने घरों में देखते हैं कि लड़कों को बाहर जाना हो तो पर्स जेब में डाला और जूते पहनकर चल दिये। बाहर निकलकर दौड़ने-भागने में भी दिक्कत नहीं होती। उनके दोनों हाथ फ्री होते हैं। हाथ में कुछ संभालना है इसपर उनका ध्यान बंटता और वो तेजी से जहां जाना हो चले जाते हैं। दरअसल हम इस फर्क को ऊपरी तौर पर नहीं समझ पाते क्योंकि हमारे समाज में महिलाएं घर के अंदर ही रही हैं। खेल-कूद भी एक समय बाद छुड़वा दिया जाता है। लेकिन अब जो महिलाएं बाहर निकल रही हैं, उनकी सक्रियता को गहराई से देखें तो ये अंतर साफ देखा जा सकता है।

औरत क्यों न अपनाए सहज पहनावा?

जैसे देर होने पर हमें बस और मेट्रो भागकर पकड़ने पड़ते हैं। बस में तो लोग लटक कर भी जाते हैं। आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसी हालत में साड़ी और सूट में महिला कितनी असहज हो जाएगी। वो दौड़ तो सकती है लेकिन पुरुष जितनी तेजी में नहीं। बस में लटकना तो उसके लिए और मुश्किल होता है। मुझे याद है कि जब मेरे ऑफिस की बस नोएडा मेट्रो स्टेशन छोड़ती थी| जल्दी मेट्रो लेने के लिए जींस या पेंट पहने हुए लड़कियां फट से रेलिंग टाप कर स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ जाती थीं| लेकिन साड़ी और सूट पहनने वालीं लड़कियां घूम कर उस जगह से आती थीं जहां से रेलिंग टूटी हो। उन्हें कुछ समय ज्यादा लगता था। स्कूल में ही देखें, तो लड़कियों को स्कर्ट में खेलने में सहज महसूस नहीं होता। स्पोट्र्स में भाग लेने वाली लड़कियां कभी स्कर्ट पहनकर नहीं खेलतीं। ऐसे में थोड़ा-थोड़ा करके ही सही लेकिन हम पीछे छूट जाते हैं।

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इस मसले पर यह भी तर्क दिया जाता है कि कौन-सा महिलाओं को बाहर जाकर मैराथन में दौड़ना है, जो कपड़ों से समस्या आएगी। लेकिन, छोटी-छोटी चीजों पर गौर करें तो पता लगेगा कि कितने ही काम ऐसे थे, जो हम ज्यादा आसानी से कर सकते थे। वैसे भी बाहर निकलकर व्यक्ति एक रेस में अपने-आप शामिल हो जाता है। स्त्री शरीर को छुपाने की कोशिश में स्त्री पर ऐसे-ऐसे लबादे डाल दिए गए हैं, जिन्होंने उसके शरीर को बांध दिया है। आज अगर लड़कियां अपने पहनावे में बदलाव लाने की कोशिश करती हैं, तो उस पर संस्कृति का हवाला देकर सवाला खड़े किए जाते हैं। लेकिन, पुरुष उस संस्कृति को तोड़कर अपने लिए सबसे सुविधाजनक विकल्प अपना चुका है, इस पर कोई सवाल नहीं उठता। ऐसे में लड़कियां भी क्यों नहीं अपने लिए सबसे सहज विकल्प चुनें?


यह लेख इससे पहले मेरा रंग में प्रकाशित हो चुका है, जिसे ने लिखा है|                                   (फ़ोटो साभार : शार्ट वीमेन

 

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