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हिंदी कविता का दायरा बहुत बड़ा है| यहाँ इतने विषयों पर इतनी उम्दा कविताएँ लिखी गईं हैं कि उन सबके बारे में एक साथ चर्चा कर पाना बेशक मुश्किल काम होगा। अगर ‘हिंदी कविता में नारीवाद‘ के बारे में बात की जाए तो भी इस विषय से जुड़े सभी नामों पर एक साथ चर्चा कर पाना मुमकिन नहीं है। इस लेख में फिलहाल मौजूदा समय की कवयित्रियों की कुछ चुनिंदा कविताओं के बारे में बात की जा रही है। ये कविताएँ बहुत उग्रता से महिलाओं की स्थिति के बारे में बात नहीं करतीं बल्कि धीरे – धीरे स्त्रियों की ज़िंदगी के दर्द और हकीकत की परतों को खोलतीं हैं तो आइये रु-ब-रु होते है इन कवियत्रियों की रचनाओं से –

1. तितलियाँ फिर उड़ेंगी

कवयित्री – उपासना झा

इस कविता में जिन तितलियों का ज़िक्र किया गया है, मेरे लिए वह लड़कियाँ हैं।

हर क्षण खंडित होती उनकी आत्मा में
अब भी सपनें है आसमानों के
लाख पहरे हों
लाख दीवारें
कौन रोक पाया है उड़ानों को…

घर में, परिवार में, स्कूल, कॉलेज, दफ्तर या पूरी दुनिया में ही – लड़कियाँ हर रोज़ कई – कई तरह की परेशानियों
को झेलतीं हैं| अपने हालातों से लड़तीं हैं| चोट खातीं हैं| गिरतीं हैं| संभलती हैं| लेकिन फिर भी अपने सपनों को
ज़िंदा रखने की कोशिशें करतीं हैं। कितनी भी बंदिशें हों लेकिन ये लड़कियाँ अपने सपनों को पूरा करके ही मानती हैं|

‘तितलियाँ ख़ोज लेंगी अपना रास्ता
नोंचे हुए
मटमैले परों को
समेटना और उठना भी उनको आता है
तितलियाँ फिर उड़ेंगी…।’

2. लड़कियों का घर

यह कविता भी उपासना जी ने लिखी है। अक्सर यह कहा जाता है कि लड़कियाँ पराया धन होतीं हैं| उनका अपना
घर सिर्फ उनका ससुराल होता। एक साधारण परिवार की लड़की को यह सिखाया जाता है कि मायका उसका अपना
घर नहीं है, उसे पति के घर को ही अपना घर समझना चाहिए।

‘कौन – सा घर होता है लड़कियों का
जहाँ चलना सीखा और यह भी कि
ठीक से चलो एक दिन अपने घर जाना है।
जहाँ बचपन के खिलौने भी
गुड्डे-गुड़िया हुआ करते हैं
उनकी शादी, डोली और विदाई
और उनसे समय बचे तो
उसकी अनकही तैयारियां…।’

इस पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों की ज़िंदगी का इकलौता मकसद मानो शादी करके ‘अपना घर बसाना’ ही है।
इसके अलावा लड़कियाँ कुछ और करें तो वह गैर – ज़रूरी मान लिया जाता है।

‘क्यों बोये जाते हैं
अनगिन लड़कियों के मन में सेमल के फ़ूल
जो देखने में इतने सुन्दर
और रस-गंध हीन होते हैं
हर लड़की के जीवन की एकमात्र
उपलब्धि अपने घर जाना
क्यों बनाया जाता है…।’

और इन लड़कियों के साथ शादी के बाद क्या होता है? क्या इन्हें ‘अपना घर’ मिलता है? क्या पति का घर
इनका घर बन पाता है? शायद नहीं।

‘हल्दी, मेहन्दी और आलते
से रचे हाथों और पैरों से
जब आती हैं लड़कियाँ दुल्हन बनके
‘अपने घर’ अपना असली घर छोड़ के
वही अपना घर जो कभी अपना नहीं होता
जहाँ एक छोटी – सी कमी काफी है
बाप के घर वापिस भेजने के लिए…।’

बहुत से भारतीय परिवारों में आज भी बहुओं की यही हालत है| उन्हें ताने दिए जातें हैं| प्रताड़ित किया जाता है और
न तो उन्हें अपने मायके से मदद मिलने की कोई उम्मीद रहती है| न ही वे अपने ससुराल को छोड़कर जा सकतीं
हैं। वे एक घुटनभरी ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर हो जातीं हैं –

‘अब भी लड़कियाँ जलाई जाती हैं
अपने घरों में
और जो मरती नहीं
वो रोज़ जलती हैं अपनी ही आग में
और जो स्वीकार नहीं करती मरना
वो बन जाती है
किस्सा और तमाशा
उनका ऐसा कोई घर नहीं होता…।’

और पढ़ें : लड़कियों में प्यार करने का रोग नहीं साहस होता है

3. उपेक्षा जान भी ले सकती है

कवयित्री – शैलजा पाठक

पितृसत्ता ने लड़कियों की सुंदरता के पैमाने तय किए – जैसे कि उनका छरहरा शरीर हो| आकर्षक नैन नक्श हों और
रंग – रंग तो जितना गोरा हो या जैसा कि अक्सर कहा जाता है ‘साफ रंग’ हो तो ही बेहतर है। फिर ऐसे समाज में
जहाँ गोरा रंग ‘साफ रंग’ माना जाता है| यह कहा जा सकता है कि सांवले रंग को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
‘खराब रंग’ मान लिया गया है। और सांवले रंग की लड़कियों को अपने रंग के कारण समाज में जिस तरह के क्रूर
व्यवहार का सामना करना पड़ता है, उसी के बारे में इस कविता में बताया गया है –

‘कहने वाले कहते
वो अमावस की रात में पैदा हुई
अंधेरे में खड़ी हो जाए तो दिखती नहीं
जले तवे को उल्टा कर दें बस
वही रंग उसका…।’

ये लड़कियाँ अपने रंग के कारण जिस उपेक्षा की शिकार होती हैं| उसका दर्द वाकई जानलेवा साबित हो सकता है –

‘ये इतनी काली थी कि मेहंदी नहीं चढ़ती इनपर
इतनी काली कि इनके कटे पर खून नहीं दिखता

इतनी कि ब्याह की मंडी में बड़े अनुनय विनय से स्वीकार की गईं
दहेज में बाइक लेने वाले मर्द ने इन्हें कभी अपने पीछे नहीं बिठाया
ये रात में ही बीमार पड़ीं
रात में ही त्योहार मने इनके साथ…।’

4. ज़िंदगी तू ही बता तेरा इरादा क्या है

यह शैलजा जी की लिखी हुई अगली कविता है। ऐसे हालातों में जीती हैं लड़कियाँ जहाँ ज़िंदा रहना ही मुश्किल है।
हर कदम पर पहरे हैं| बंदिशें हैं| जहाँ इस बात की पूरी कोशिश की जाती है कि लड़कियाँ ज़िंदा लाश से ज़्यादा और
कुछ न रहें –

‘बाल लंबे रखना
कदम छोटे
मुँह में ज़बान रखना
पर जवाब नहीं…’
ये खिलखिलातीं हैं तो भाई बाल से घसीटकर मारता है
कई आँगन में गूंजती है इनकी चीख बार – बार
कौन था बोल कमीनी जिसके साथ चल रही थी, लगता था तेरा भतार ?
घर के आँगन से खाप की बैठक तक
यही हैं घर इज़्ज़त की ज़िम्मेवार
मरने से पहले मारी जा रहीं
ज़िंदा – मुर्दा गाड़ी जा रहीं…।’

पर लड़कियों से उनके सपनों और इच्छाओं को छीन लेने की कितनी भी कोशिशें कर लीं जाएँ, वे फिर भी अपने
सपने देखने और जीने के लिए जगहों को तलाश ही लेतीं हैं –

‘ये लड़कियाँ बाज़ नहीं आ रहीं
कर रहीं फिर भी मनमानी
देह पर नीले स्याह दर्द का है पहरा
देर रात ये लिख रहीं प्यार की कविता
अलसुबह ये एक बार फिर
अपने प्रेमी से मिलने जा रहीं…।’

5. वर्जित

कवयित्री – पूनम विश्वकर्मा ‘वासम’

पितृसत्तात्मक समाज में विधवा महिलाएँ कितने बुरे हालातों में रहीं हैं| यह बात किसी से छिपी नहीं है। अगर किसी
महिला के पति की मृत्यु हो जाए तो उस महिला को भी लाश बना दिए जाने की पूरी कोशिश की जाती है। पहले
‘सती’ जैसी कुप्रथा के ज़रिए पति के शव के साथ ही महिला को भी जला दिया जाता था और जब महिलाएँ सती
होने से बच गईं तो तरह – तरह की बंदिशों के ज़रिए उनका जीना दूभर कर दिया गया। आज भी कई जगहों पर
विधवा महिलाओं की मौजूदगी को अशुभ माना जाता है, वे अपनी ज़िंदगी में रंगों को शामिल नहीं कर सकतीं, उन्हें
कई पाबंदियों के साथ अपनी ज़िंदगी काटनी पड़ती है। यह कविता इसी बारे में बात करती है –

‘जिनके लिए वर्जित है लाल रंग,
कि जिनके जीवन का हरण किया जा चुका है कब का
नोंच कर उतार रही हैं सरेआम मेरी चुनरी के गोटे
दर्द से इनका गहरा नाता है बावजूद इसके बता रही है
लाल रंग वर्जित है उनके लिए जिनके पांवो की बिछिया छिटक कर दूर जा गिरी हो
वर्जित है उनके लिए ऐसा कुछ भी जिससे पपड़ी जैसे सूखे होंठो पर मुस्कान की एक बूंद बारिश हो सके
सुना है
ब्रह्मांड में ब्लैकहोल जैसा है कहीं,
जहाँ से कुछ भी लौटकर आना संभव नही है
सोच रही हूँ दुनिया की तमाम औरतों के माथे पर लिखे गए
इस वर्जित शब्द को खरोंच कर
किसी ब्लैकहोल के मुहाने से धक्का दे दूँ।’

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