आसिफ़ा की अम्मी ने कहा कि ‘हमने ये नहीं सोचा था कि हम अपनी बच्ची को डॉक्टर बनाएंगे या कि टीचर बनाएंगे| हमने इतनी बड़ी सोच रखी ही नहीं थी| हमने तो ये सोचा था कि पढ़-लिख जाएगी, तो अपने को देख लेगी| अपना वक्त गुजार लेगी| रहने का तरीका आ जाएगा| खूबसूरत थी, अच्छे घर में चली जाएगी| हमने कभी नहीं सोचा था कि हम उसे शैतानों के हाथों खो देंगे|

जी हाँ, ये वही आठ साल की आसिफ़ा है, जिसे कठुआ (जम्मू) के एक मन्दिर में गैंगरेप का शिकार बनाया गया| इस वीभत्स घटना पर आसिफ़ा के पिता ने कहा कि ‘अगर उन्हें बदला ही लेना था, तो वो किसी और से ले सकते थे| वो तो एक मासूम बच्ची थी| उसे अपने हाथ और पांव का अंतर नहीं पता था| कि मेरा दायां हाथ कौन-सा है और बायां हाथ कौन-सा है| कभी उसने ये नहीं समझा कि हिंदू क्या होता है और मुसलमान क्या होता है|

हाल ही में उन्नाव (उत्तर-प्रदेश) में एक लड़की के साथ हुए बलात्कार की घटना और रोहतास (बिहार) में छह साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार की घटना में समाज को एकबार फिर झकझोर दिया है| सभी न्यूज़ चैनल, पोर्टल और अखबारों में इन वीभत्स घटनाओं से खबरें और इसपर जगह-जगह लोगों के विरोध-प्रदर्शन की खबरें छाई हुई है| सोशल मीडिया के लेकर शहरों की सड़कों तक सभी इस घटना का विरोध कर रहे हैं| ये सब साल 2012 में दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना की याद दिलाता है| लेकिन अब सवाल ये है कि उस घटना के बाद भी लोग बड़ी तादाद में सड़कों पर थे, जिसके चलते कानून में बदलाव किये गये और सत्ता का तख्ता पलट भी हुआ| पर इन सबके बावजूद इन घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी| आखिर क्यों?

क्योंकि वास्तव में हम एक असफल समाज के दौर में हैं| ऐसा समाज जो पूरी तरह से चरमरा चुका है और यहाँ कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है| आज हमारे समाज में, आसिफ़ा और निर्भया जैसी न जाने कितनी लड़कियों की ज़िन्दगी को कुचलकर घिनौने खौफ़ में जीती एक जिंदा लाश में तब्दील कर दिया जाता है| दूसरों की बुरी नियत के चलते हम महिलाओं को घूंघट करने का फरमान, उनकी सुरक्षा की दुहाई देकर जारी कर देते है| लेकिन जब ये भेड़िये, नन्हें बच्चे को अपना शिकार बनाने लगे, जिन्हें लड़का और लड़की में फ़र्क तक मालूम नहीं तो ये संकेत है इस समस्या को देखने के नजरिये और इससे निबटने के तरीके को बदलने का| अब समय है कि इस ‘क्यों’ का जवाब तलाश कर उसपर अमल किया जाए|

घरेलू घुट्टी – ‘तुमसे क्या?’

कहते हैं कि बच्चे की सबसे पहली पाठशाला उसका परिवार होता है और एक समाज की ईकाई भी ये ‘परिवार’ होता है| हम कैसे इंसान बनेंगें, ये हमारा परिवार और इसका माहौल तय करता है| हमारे भारतीय समाज में बच्चों को बचपन से ही स्वार्थ वाली ‘हमसे क्या?’ की घुट्टी दी जाती है| हमें ये तो सिखाया जाता है कि ‘गलत के खिलाफ खड़े हो’ लेकिन इस शर्त के साथ कि ‘अगर वो गलत तुम्हारे साथ हो|’ अगर किसी और के साथ होतो ‘तुमसे क्या?’| हमारे समाजीकरण का ये पहला बीज ही हमें ‘सामाजिक प्राणी’ की बजाय समाज वाला एक स्वार्थी प्राणी बना देता है| नतीजतन समाज में होने वाली किसी भी हिंसा, कुरीति या दुर्घटना के खिलाफ हम एकजुट नहीं हो पाते और हमारा विरोध कभी-भी प्रभावी ढंग से दर्ज नहीं हो पाता है, जो की किसी भी सामाजिक बदलाव का एक मजबूत आधार होता है|

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हमारा शुद्धिकरण मतलब ‘दोषारोपण’

किसी भी घटना का दोष एक-दूसरे को मढ़ने की अपनी संस्कृति भी गजब की है| दिन-दौर-समय-घटना चाहे जो भी हो उसका ठीकरा किसी और के ऊपर फोड़ना हम कभी नहीं भूलते या यों कहें कि इसे ही हम अपना असल कर्तव्य समझते हैं| बस निंदा के नामपर किसी और को दोषी बता देना ही क्या हमारी नैतिक जिम्मेदारी है? अब समय है इस पहलू पर सोचने का| क्या हमारी संस्कृति ऐसी तब तक ऐसी ही रहेगी, जब तक हमारी अपनी बारी नहीं आ जाती है?

अपने बच्चों को किताबी शिक्षा के साथ अच्छा इंसान बनने की शिक्षा देकर| न की संस्कारी लड़की या बहादुर मर्द बनने की शिक्षा|

बदलाव आये लेकिन पड़ोसी के घर में

बलात्कार या हिंसा के स्वरूप का हम विश्लेषण करें तो यही पाते है कि ऐसी घिनौनी वीभत्स घटनाएँ कोई एकदिन की बात नहीं होती है, बल्कि बचपन से ही अपनी छोटी-छोटी सी आदतों (समाजीकरण में पोसी गयी) से ही हम इनकी पृष्ठभूमि तैयार करते हैं| घर में लैंगिक असमानता के रूप में और पितृसत्ता के मूल्यों को आत्मसात करके, जिसका परिणाम हमें इन घटनाओं के रूप में दिखाई पड़ता है| हम सभी अच्छे-स्वस्थ समाज की लालसा रखते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हो और कौन करें? इस बात पर हमेशा अटक जाते हैं| हमारे समाजीकरण में होने वाले किसी भी बदलाव की  शुरुआत हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे पड़ोसी से हो और पहले आप-पहले आप….में इस कदर देर हो जाती है कि एकदिन हमारी अपनी बात बिगड़ जाती है|

जिम्मेदारी का जिम्मा हो किसका?

यहाँ जिम्मेदारी का मतलब घर के काम या रोटी कमाने से नहीं है, बल्कि एक स्वस्थ समाज की नींव रखने से है| समाज में होने वाली हिंसात्मक घटनाओं के बाद सिर्फ कैंडल मार्च, विरोध प्रदर्शन या रैली मात्र से तस्वीर बदलने वाली नहीं है, क्योंकि ये सभी सिर्फ चिन्ह बनकर रह जाते है, जब हम हर समस्या का हल सिर्फ इन्हीं में खोजने लगते हैं| अब समय है कि हम अपने आप से सवाल करें कि मौजूदा समय में अगर हिंसा का ये वीभत्स रूप हमें देखने को मिल रहा है तो इसकी तैयारी में व्यक्तिगत स्तर पर हमारी अपनी पहल क्या है और ये कितनी सफल है? क्या हम अपने घर और आसपास के माहौल में सुधार का कोई प्रयास कर रहे हैं? ये सभी बेहद ज़रूरी है क्योंकि आने वाले समय में यही हमारे समाज का आधार होगा – जो हमारी सत्ता, सरकार, संस्कार, व्यवहार और प्रस्थिति में दिखाई देगा|

सालों पहले से हमने अपनी समाजीकरण में जैसे सामाजिक प्राणियों का निर्माण किया है वो आज हमारे सामने हैं, अच्छे-बुरे हर रूप में| ऐसे में बदलाव की जिम्मेदारी किसकी हो और हमारी भूमिका क्या हो, इसपर सोचना ज़रूरी है|

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पितृसत्तात्मक सोच का हो नाश

साफ़ कर दूँ कि यहाँ कि पितृसत्ता का मतलब सिर्फ ‘पुरुष’ से नहीं है| बल्कि यहाँ बात उस सोच की हो रही है जो पुरुषों को सर्वश्रेष्ठ मानती है और ये सोच किसी महिला की भी हो सकती है| ज़रूरी है कि इस सोच का नाश हो| उल्लेखनीय है कि इस सोच का नाश कोई और नहीं सिर्फ हम कर सकते हैं| क्योंकि ऐसी वीभत्स बलात्कार की घटनाओं को अंजाम किसी दूसरे ग्रह से आये प्राणी नहीं, बल्कि हममें से ही किसी के पिता, भाई, पति या दोस्त करते हैं| लेकिन जब बात उनके गुनाहों को स्वीकार कर खिलाफ खड़े होने की आती है तो हम सीधे उनके बचाव में खड़े में होते है| हम कहते हैं कि ‘हमारा पति-भाई-पिता-बेटा-दोस्त ऐसा कर ही नहीं कर सकता (जो लाजमी भी है| भला अपनी दही को कौन खट्टा कहता है)| साथ ही, बेहद बेबाकी के साथ हम पीड़िता के चरित्र को कठघरे में खड़ा कर देते है|’ हम सवाल तो करते है लेकिन गलत दिशा में, जिसे बदलने की ज़रूरत है|

दिन-दौर-समय-घटना चाहे जो भी हो उसका ठीकरा किसी और के ऊपर फोड़ना हम कभी नहीं भूलते या यों कहें कि इसे ही हम अपना असल कर्तव्य समझते हैं|

बलात्कार की ऐसी वीभत्स घटनाओं के बाद अक्सर हम अपनी आवाज़ तालिबानी न्याय पर बुलंद करते है| पर हम ये भूल जाते है कि इससे ये समस्या कभी हल नहीं होगी| क्यूंकि इसकी जड़ हमारे, आपके या यूँ कहें कि पूरे समाज की सोच से आती है| और इसकी पहल हमें अपने घर से करनी होगी| अपने बच्चों को किताबी शिक्षा के साथ अच्छा इंसान बनने की शिक्षा देकर| न की संस्कारी लड़की या बहादुर मर्द बनने की शिक्षा| वरना हमारे भविष्य के इन नन्हें दीपों की रोशनी खौफ़ की चादर में लिपटकर सिमट कर बुझ जायेगी| और इन बुझे दीपों का धुआं समाज को दमघोटू बना देगा|


फ़ोटो साभार : इंडिपेंडेंट

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