नम्रता मिश्रा 

अक्सर हमने लोगों को कहता सुना है कि ‘घर में पहली बेटी मतलब लक्ष्मी आई है|’ शुरुआत में मैं भी सोचती थी की वाह क्या सोच है| अब बेटियां जी सकती हैं इस समाज में। पर जब हकीकत को सामने देखा तो पता चला कि किस तरह से ये सिर्फ एक नया जरिया है महिला उत्पीड़न का और पहली बेटी ही लक्ष्मी क्यों? और जीने के लिए बेटियों का लक्ष्मी या देवी बनना ही ज़रूरी क्यों? हम बेटा पैदा होने पर तो नहीं बोलते की ‘देवता आया है’ तो बेटी को दिव्य क्यों बनाते हैं?  क्या इसलिए ताकि हम उसे हमेशा देवी के ढोंग के तले उसे उसके मानव अधिकारों से वंचित रखें? वास्तव में हम उन्हें मानव अधिकार तो दे नहीं सकते और ‘देवी अधिकार” जैसा समाज में कुछ होता ही नहीं|

फिर सामने देखा कि असलियत में अगर बेटी बड़ी होती है तो वो माँ के साथ काम जल्दी बटाने लगती है और फिर अपने छोटे भाई बहन की दूसरी माँ भी बन जाती है। परिवार नियोजन के तहत भी अगर देखें तो क्या हम बच्चे इसलिए पैदा करते हैं क्योंकि हम सच में बच्चे चाहते हैं या बस इसलिए पैदा करते हैं क्योंकि बाकी सभी करते हैं| ये बात केवल उन घरों की नहीं है जहाँ परिवार-नियोजन जैसे शब्द से लोग वाकिफ ही नहीं है बल्कि ये उन घरों की भी बात है जहाँ पर लोग बहुत ही पढ़े लिखे हैं। कहने का मतलब ये है कि उत्पीड़न समाज में प्रणालीगत है और यह हमें समझना होगा| तभी हम जड़ से महिला उत्पीड़न जैसी समस्या से झुटकारा पा सकते हैं।

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यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए की अगर महिलाओं का यह हाल है तो बाकि अन्य हाशिये वाले लिंगों का क्या हाल होता होगा|

जीने के लिए बेटियों का लक्ष्मी या देवी बनना ही ज़रूरी क्यों?

लड़की की पढ़ाई और इज्जत की दुहाई

फिर बात आती है शिक्षा की| आज भी महिलाओं की शिक्षा और आज़ादी से ज्यादा ज़ोर उसे घर-गृहस्थी सँभालने पर डाला जाता है। अगर घर में दोनों लड़का-लड़की हों तो लड़के का हॉस्टल जाना पढ़ाई के लिए केवल तभी दो बार सोचा जाता है जब या तो घर में आर्थिक समस्या हो या कोई और पुरुष न हो| लेकिन घर में लड़की कितनी भी सक्षम हो, उसका हॉस्टल जाना मतलब परिवार के लिए इज्जत जोखिम में होना। लड़की की पढ़ाई पर कम पैसे खर्च किये जाते हैं| ताकि दहेज़ के लिए पैसे कम न पड़ जाएँ| पर लड़के की पढ़ाई में कटौती नहीं होगी क्योंकि जितना भी लगाया है पढ़ाई में, वह दहेज़ से कमाया जाएगा। बेटियों की पढ़ाई  पर उनके खुद के अलावा बाक़ी सभी का हक़ होता है|  चाहे वो मायके वाले माँ, बाप, भाई, चाचा हों या ससुराल वाले सास, ससुर वगैरह-वगैरह। उनकी ज़िन्दगी पहले से ही निर्धारित होती है और अगर वह लड़की इस योजना के तहत न चले तो उसे ‘डायन’ बना दिया जाता है।

इस तरीके के समाज को बनाने वाले ही इस समाज से डरते हैं।

लड़की की इज्जत में बसता है समाज

भला लड़कियों की आज़ादी से इतना डर क्यों है हमारे समाज को ? क्योंकि लड़कियों के शरीर में तो पूरे गाँव-मोहल्ले की ‘इज़्ज़त’ बसती है| पर लड़के के शरीर में केवल ‘मर्दानगी।‘ ‘इज्जत’ को घर में कैद किया जाता है ताकि समाज में ‘इज्जत’ [लड़की] के बाप, भाई, चाचा, दादा, सभी ‘सर उठा के चल सकें’ और ‘मर्दानगी’ तो होती ही है दिखाने के लिए, तो भला उसपर कोई बंदिश क्यों होगी|  वाह रे सभ्य समाज|  अब संयोग देखिये कि इस तरीके के समाज को बनाने वाले ही इस समाज से डरते हैं। पर भुगतना औरत को पड़ता है, जिनकी आज़ादी छीन ली जाती है। और ‘अच्छी महिला’ को ही इज्जत मिलती है| इसलिए ख़ुशी-ख़ुशी, आँखों पर झूठी शान और इज्जत का पर्दा पहनकर आज़ादी का बलिदान किया जाता है ताकि हमारी आज़ादी छीनने वाले ख़ुशी से और इज्जत से जियें|

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सतत प्रयास से होगा बदलाव

इसी समाज में इसी तरीके की सोच के साथ सदियों से सभी जीते आये हैं। लेकिन अब ज़रूरत है इस सोच को उखाड़ फेकने की| ताकि हम सभी को उत्पीड़न रहित ज़िन्दगी जीने का मौका दे सकें। यह बिलकुल भी सरल नहीं है और ना ही यह एक दिन में हासिल होगा| पर पितृसत्ता भी तो एक ही दिन में नहीं आई है| सतत प्रयास से ही यह मुमकिन है। हमें खुद से शुरुआत करनी होगी| खुद में बदलाव लाना होगा| छोटे-छोटे प्रयास से ही हम एक दिन दुनिया पितृसत्ता रहित कर पाएंगे। इसका मतलब ये नहीं है कि फिर हम किसी और सत्ता को जनम दें| यह जंग किसी भी तरह की सत्ता के खिलाफ है और इस जंग को लड़ते वक्त हमें यह नहीं भूलना है की समाज समरूप नहीं है| यहाँ लोग हाशियों पर जीते हैं और हाशियों में भी हाशिये हैं।

“सफर भले ही लम्बा है,

हम मुसाफिर एक साथ होंगे तो मंज़िल दूर नहीं| ” – नम्रता मिश्रा 


यह लेख नम्रता मिश्रा ने लिखा है|

तस्वीर साभार : नारी उत्कर्ष 

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