मैंने अपने काम के दौरान जो कुछ सीखा-सिखाया उसने मुझे हमेशा से इस बात का  हमेशा से ये संतोष दिया कि एकदिन दुनिया बदलेगी| लेकिन कुछ दिन पहले जब मैंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक बड़ा सा विज्ञापन देखा जिसमें मोटे अक्षरों में लिखा था कि “मदर आस्कड  तो किल हर ओन चाइल्ड” मतलब ‘माँ ने चाहा अपने ही बच्चे की हत्या|’ ये एड सोनी टीवी पर गर्भपात को लेकर होने वाले किसी धारावाहिक कार्यक्रम का था| इस एड में मुझे स्तब्ध कर दिया| मैं सोच में पड़ गयी कि एक औरत के हक़ को हम कैसे हत्या का नाम दे सकते हैं|

ये देखकर सबसे पहला सवाल जो मेरे मन में आया था कि आखिरकार कैसे बनती है औरतें? और कौन बनता है इन्हें? क्या ये ममता से बनती है या किसी दबाव में? या समर्पण से? या फिर समाज से?  यहाँ मुझे पहली बात मुझे अपने घर के सामने रहने वाली भईया-भाभी की आयी| भईया हमेशा ये गाना गाया करते थे कि “औरत जहर की है पुड़िया, बच्ची हो या बुढ़िया| इसपर भाभी का हंसना और हम सब बच्चों का एक खुशनुमा अंत पर खुश होना जैसे रोज़ का किस्सा था|

माँ होना अपने आप में पूर्ण होना है और ये समाज की सोची समझी और जानबूझकर बिछाया गया एक जाल है|

मुझे अपने काम के दौरान काफी सांत्वना रही कि समाज बदल रहा है और एक गैर बराबरी से रहित मुमकिन समाज की और बढ़ रहा है| वहीं दूसरी घटना काफी समय पहले की है जब एक जेंडर कार्यशाला में ये सवाल पूछा गया ‘औरत क्या है?’ इससे पहले की हम अपने विचारों को शब्द देते एक प्रतिभागी ने तुरंत कहा ‘औरत माँ है|’ बस फिर क्या था इसबात पर वाद-विवाद शुरू हो गया|

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लेकिन सवाल वहीं बना रहा कि औरत क्या है? इस घटना से ये तो समझ आया कि माँ होना अपने आप में पूर्ण होना है और ये समाज की सोची समझी और जानबूझकर बिछाया गया एक जाल है|  ये सोच अच्छे से गढ़ी गयी है और उन सब महिलाओं के लिए जो माँ नहीं बनना चाहती| बच्चे पैदा नहीं कर सकती या नहीं पैदा करना चाहती दोयम दर्जे पर रखने का बड़ा साधन है|

क़ानूनी किताबो में मिले है सामाजिक रूप से मिलने का संघर्ष तो अब भी जारी है क्या इस तरह के बड़े बड़े नामी गिरामी मंच उन थोड़ी पैदा हुई सामाजिक संभावनाओं को ख़त्म नहीं कर देंगे?

खैर वापस आते है सोनी के नए विज्ञापन पर, इस पर भी एक दृश्य उभरा हमे नया  इस पता चला था हम संवेदशील है, समाज को बदलना है, जानकारी बांटने, सुनने-सुनाने से समझ आगे बढ़ती है, गलत सोच-समझ अपनी हो या दूसरे की सही रास्ते पर बढ़ती है तो हमें भी कुछ छूता तो झट से साथिओ से बाँट लेते कुछ बतियाने के बाद कुछ काट लेते कुछ अपने लिए छाँट लेते| ऐसे में हमें एक सन्देश मिला जो गर्भपात से हे जुड़ा था तब तक हम बच्चियों की गर्भ में की जाने वाली हत्याओं से बड़े दुखी भी थे हमने साथिओ से बाँट लिया| सच कहें तो विज्ञापन था ही आपत्तिजनक जिसमें एक होने वाली माँ गर्भपात के लिए जाती है क्यूंकि वो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं उस उस बच्चे को पालने में और डॉक्टर उन्हें कहता है कि मैं बच्चे को मार देता हूँ और उस महिला को अहसास कराता है कि जिस बच्चे का वो गर्भपात करवा रही है उसमें भी जान है|

इस आदान प्रदान पर हमारी इतनी खूंखार प्रतिक्रिया हुई कि एक दहशत में इस विषय पर हमने खुद से ही सिखने का रास्ता पकड़ लिया| खैर खुद सिखने की प्रक्रिया थोड़ी लम्बी और जटिल होती है| पर कामगार भी होती है और धीरे धीरे हमे उन प्रतिक्रियों का मतलब, महत्व, और संघर्ष और ममता/मातृत्व के नाम पर आधी आबादी को सालता शोषण और उसके आयाम अच्छे से समझ आ गए| तभी जब इस विज्ञापन को देखा तो लगा ये क्या है? क्या तरीका है बरसों बाद औरतो को मिले गर्भपात के हक़ को सामाजिक नैतिकता के तले कुचलने का, वैसे भी हम सब जानते है औरतो को जो भी क़ानूनी हक़ मिले है वो लम्बे संघर्षो के बाद केवल क़ानूनी किताबो में मिले है| सामाजिक रूप से मिलने का संघर्ष तो अब भी जारी है क्या इस तरह के बड़े बड़े नामी गिरामी मंच उन थोड़ी पैदा हुयी सामाजिक संभावनाओं को ख़त्म नहीं कर , देंगे? इन मंचो पर इन इस तरह की पंचायते गर्भपात के हक़ और चुनाव को हत्या से जोड़ेंगे तो डायन प्रथा को हवा देने जैसा खौफ पैदा नहीं करेगी? क्या किसी वांछनीय परस्थिति में जब महिला ऐसा निर्णय ले पायेगी जहा उसके सोचने समझने और चुनाव के हक़ को हत्या जैसा नाम दिया जायेगा? क्या इस तरह का प्रचार गर्भपात के क़ानूनी हक़ को अपराध जैसा नहीं बना देगा? बोलने और राय देने से पहले, क्या गर्भपात, चुनाव, विकलांगता जैसे मुद्दे और उनके जुड़ाव इन पंचो को समझ आयेंगे? लम्बे समय तक लड़े जाने वाले गर्भपात के अधिकार का संघर्ष और उसकी समझ रखने वाले लोग इस मंच पर होंगे या रोमांच और सनसनी फैला कर टी आर पी बढ़ाने वाले गैर जवाबदार लोग जिनका काम सिर्फ फैसले सुनाना है| अगर इन सवालों पर गौर करने और समय रहते पुरजोर आवाज उठाकर इस तरह के भेदभावपूर्ण अमानवीय प्रचार का विरोध करना होगा इससे पहले की ये भी चलता है या स्वीकार्यता का हिस्सा बन जाये “जागो दोस्तों जागो”

इन मंचो पर इस तरह की पंचायते गर्भपात के हक़ और चुनाव को हत्या से जोड़ेंगे तो डायन प्रथा को हवा देने जैसा खौफ पैदा नहीं करेगी? क्या किसी वांछनीय परस्थिति में जब महिला ऐसा निर्णय ले पायेगी जहा उसके सोचने समझने और चुनाव के हक़ को हत्या जैसा नाम दिया जायेगा? क्या इस तरह का प्रचार गर्भपात के क़ानूनी हक़ को अपराध जैसा नहीं बना देगा? बोलने और राय देने से पहले, क्या गर्भपात, चुनाव, विकलांगता जैसे मुद्दे और उनके जुड़ाव इन पंचो को समझ आयेंगे? लम्बे समय तक लड़े जाने वाले गर्भपात के अधिकार का संघर्ष और उसकी समझ रखने वाले लोग इस मंच पर होंगे या रोमांच और सनसनी फैलाकर टी आर पी बढ़ाने वाले गैर जवाबदार लोग जिनका काम सिर्फ फैसले सुनाना है|

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तस्वीर साभार : डेली पेंटरर्स 

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