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चिकित्सा के बड़े बाज़ार में सही इलाज़ की खोज अपने आप में बड़ी चुनौती है| क्योंकि कुकुरमुत्ते जैसे पनपते बड़े-बड़े अस्पतालों के वीभत्स किस्से आये दिन देखने-सुनने को मिलते है, जो सहज मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं को एक चुनौती बना देता है|

बीते दिनों मुझे भी इस चिकित्सा के बड़े बाज़ार में बनारस शहर में एक अच्छी गायनोकॉलोजिस्ट की तलाश में निकलना पड़ा| कई लोगों से सलाह लेने के बाद एक डॉक्टर मित्र ने मुझे ऋतू खन्ना नाम की डॉक्टर का नाम सुझाया| उन्होंने बताया कि इनदिनों बनारस में वो अच्छी गायनोकॉलोजिस्ट है| सुनकर लगा कि चलो इलाज़ का पहला अहम पड़ाव कुछ हद तक पार कर लिया| मैं डॉक्टर साहिबा को गूगल की मदद से तलाश कर उनकी क्लिनिक तक पहुंची|

क्लिनिक एक रिहायशी कॉलोनी के घर में चलाया जा रहा था| डॉक्टर साहिबा से इलाज़ के लिए अपॉइंटमेंट अगले दिन सुबह की मिली| बताया गया कि सुबह नौ बजे से डॉक्टर बैठती है और नम्बर लगता है| अगले दिन जब मैं ठीक नौ बजे नम्बर लगाने पहुंची तो रिशेप्शन संभाल रही महिला ने कहा कि डॉक्टर ग्यारह बजे से बैठती है| ये बात बुरी तो लगी| फिर अपनी भारतीय परंपरा को याद कर संतोष किया कि ‘ये तो होता ही है|’ आगे जब पर्चा बनवाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी तो महिला ने कहा कि ‘आठ सौ रूपये दीजिये|’ मैंने पूछा ‘आठ सौ?’ उसने कहा ‘जी! मैडम की फीस|’ मैडम की फीस सुनकर दिमाग में मानो एक बड़े पावर का लेंस अपने आप चढ़ गया, जो मैडम के इलाज़ की गुणवत्ता को बरीकी से तलाशना चाहता था|

पैसा लेने के बाद पर्चा बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और महिला ने पहला सवाल किया – ‘पति का नाम?’ ये सुनकर दिमाग पूरी तरह घूम गया कि ‘न तो नाम पूछा, न उम्र| सीधे पति का नाम क्यों?’ मैंने उन्हें जवाब दिया ‘मेरी शादी नहीं हुई है|’ महिला ने जवाब दिया ‘अरे तो पिता का नाम बताइए|’ अब दिल-दिमाग में गुस्सा बुरी तरह था| मैंने सख्त शब्दों में जवाब दिया – ‘इलाज के लिए पिता-पति के नाम की क्या ज़रूरत है?’ महिला ने जवाब दिया ‘ये नियम है| बताना पड़ेगा|’ इसबात पर महिला से बहस हुई| लेकिन खराब तबीयत के नाते उस वक़्त मैं उससे ज्यादा बहस करने में सक्षम नहीं थी| नतीजतन मैंने उसे पिता का नाम बताया और उसने पर्चा बनाया| लेकिन मैंने मन में यह तय कर लिया था कि मैं इसके बारे में डॉक्टर से ज़रूर पुछुंगी|

करीब तीन घंटे इंतज़ार करने के बाद डॉक्टर आई और मरीज देखना शुरू किया| मेरा नम्बर आने पर डॉक्टर ने परेशानी पूछी| मैंने जब उन्हें अपनी समस्या बतानी शुरू की तो उनकी कलम तेज़ी से पर्चे पर दवाइयों का नाम लिखने में जुट गयी और कहा कि यूरिन इन्फेक्शन है| यह कहकर उन्होंने अपनी कुर्सी की पीछे रखी अलमारी से नर्स को दवा निकालने को कहा| इसके बाद मैं अपनी बात कहती ‘दूसरे मरीज का बुलावा आ गया|’ चेम्बर से निकलने पर नर्स ने दवाओं को कमरे के कोने में बने मेडिकल स्टोर पर बिल बनाया गया और कुल तीन हजार की दवा और टेस्ट का बिल थमा दिया गया| उस वक़्त मैं अपने आपको दुनिया की सबसे ठगी लड़की महसूस कर रही थी जिसने अपने पैसे और मौलिक अधिकार दोनों को एकसाथ गंवा दिया हो| लेकिन उस वक़्त शारीरिक रूप से मैं सक्षम नहीं कि इन सबका जवाब दे सकूं| डॉक्टर ने अगली बार पन्द्रह दिन बाद बुलाया और रिपोर्ट देने की बात कही| उस दिन जब क्लिनिक पर फोन करके पूछा कि ‘आज डॉक्टर मरीज देखेंगीं क्या?’ उधर से जवाब आया ‘पहले पति का नाम बताइए?’ मैंने जवाब दिया ‘अरे डॉक्टर के मरीज देखने और मेरे पति के नाम से क्या मतलब है?” बस इसपर लंबी बहस हुई| पहले वो रिपोर्ट देने तक को तैयार नहीं थे| फिर काफी धमकाने पर उनलोगों ने रिपोर्ट दी और डॉक्टर के लिए कहा कि वो नहीं है|

चिकित्सा के बड़े बाज़ार में सही इलाज़ की खोज अपने आप में बड़ी चुनौती है|

बड़े नाम की छोटी हरकत

ये मेरे जीवन का एक वीभत्स अनुभव रहा| आज जब हम बड़े गर्व से महिला सशक्तिकरण के नामपर महिला डॉक्टर के नाम गर्व से गिनाते है, ऐसे में इस तरह की तथाकथित डॉक्टरों का उनके मरीजों के प्रति रवैया उनकी सड़ी पितृसत्तात्मक सोच को साफ़तौर पर दिखाता है| इस घटना ने मन में ढ़ेरों सवाल एक साथ खड़े कर दिए| इसपर लिखने से पहले कई बार सोचा कि डॉक्टर का नाम लिखना चाहिए या नहीं| फिर तय किया कि ‘नहीं! मैडम चाहे कितनी भी बड़ी हो| लेकिन उनके सिस्टम की हरकत बहुत छोटी है|’

चिकित्सा के नामपर मौलिक अधिकार का हनन

हमारा संविधान 18 साल की लड़की को बालिग़ मानता है और उसे वो सभी मौलिक अधिकार भी देता है, जो किसी भी लोकतांत्रिक देश के नागरिक के पास होने चाहिए| ऐसे में इस तरह की घटनाएँ सीधेतौर पर महिला के अस्तित्व को नकारते हुए, मनुवादी सामाजिक संरचना को उजागर करता है जिसके तहत महिला को पुरुष की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है|

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गौरतलब है कि ये बात उस दौर की जब हम हर दूसरे दिन आश्रयगृह में रहने वाली अनाथ बच्चियों के साथ होने वाले यौन-उत्पीड़न की वीभत्स घटनाएँ सामने आ रही है| वहीं दूसरी तरफ सफल मानी जाने वाले चिकित्सक पढ़े-लिखे और बालिग़ मरीज से उनके इलाज का पर्चा बनाने के लिए उनके पति-पिता का नाम पूछने पर दबाव बनाया जाता है| ऐसे हालात हम अनाथ बच्चियों का दशा का अंदाजा लगा सकते है,जिस समाज में पढ़े-लिखे रसूखदारों का ये हाल है वहां किसी भी बड़े अपराध की जड़ों का इनके बीच से पनपना कोई ताज्जुब की बात नहीं है|  

जब आप चिकित्सा क्षेत्र के ऐसे व्यवहार पर कोई सवाल उठाते है तो लोग सिर्फ यही समझने लगते है कि ‘लड़की ज़रूर किसी का गर्भ समापन करवाने आई है| इसकी ज़रूर कोई गलती है|’

सवालों के कठघरे में ‘सफल शिक्षा और चिकित्सा’

उल्लेखनीय है कि बड़े संस्थानों से पढ़ी-लिखी इन नामी-गिरामी महिला चिकित्सकों का ऐसा रवैया न केवल हमारी शिक्षा-प्रणाली को कटघरे में खड़ा करता है, बल्कि ऐसे चिकित्सकों के नामी होने के हर मानक पर भी सवाल उठाती है| आगे बढ़ते और पढ़ते अपने इस आधुनिकता दौर में अब हमें ठहरकर ये सोचने की ज़रूरत है कि आखिर हमारी दिशा क्या है? बाज़ार के आदर्शों ने आज चिकित्सा-क्षेत्र में एक ऐसी बड़ी लूट का विस्तार कर दिया है जिसके चलते मरीज को अपनी जिम्मेदारी की बजाय पैसे कमाने के असीम अवसर के तौर पर देखा जाता है और इस तर्ज पर उनके हर मौलिक अधिकारों को धड़ल्ले से ताक पर रख दिया जाता है| चिकित्सा क्षेत्र में मरीजों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का मूल आधार होता है मरीज का बीमार होना, जिसके चलते अच्छा-खासा इंसान सरेंडर करने को मजबूर हो जाता है| अब सवाल ये है कि इलाज़ के नामपर क्या अब हमें अपने मौलिक अधिकारों को ताकपर रखना होगा?

पति-पिता के नाम से क्या तय होता है महिला के इलाज़ का व्यवहार?’  

हो सकता हमें एकबार ये बात आम लगे| क्योंकि हम इसे सामान्य बिमारी के साथ अपने संदर्भ में देख रहे है| लेकिन कल्पना कीजिये कि जब किसी अनाथ लड़की से ऐसा सवाल पूछा जायेगा तो कितनी देर और दूर तक ऐसी लड़ाई को झेल पाएगी? आम से दिखने वाले इस सवाल के पीछे किस तरह पितृसत्तात्मक सोच अपना काम करती है इसे समझना बेहद ज़रूरी है| ऐसे केस ज्यादातर महिला प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञों के पास देखने को ज्यादा मिलते है, जहाँ ये सवाल उनके फॉर्म भरने के लिए नहीं बल्कि उनके साथ होने वाले व्यवहार को तय करता है| अगर कोई लड़की सीधे से अपने पति या पिता का नाम बता देती है तो उसे अच्छे घर की चरित्र वाली महिला समझकर सहजता से इलाज की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है| लेकिन वहीं अगर किसी लड़की ने पति-पिता के नामपर इनकार किया तो उन्हें अपराधिक नज़र से देखा जाने लगता है और वहीं से शुरू होता है उनके साथ दुर्व्यवहार का क्रम|

इन सबमें एक और बेहद अज़ीब चीज़ देखने को ये मिली कि जब आप चिकित्सा क्षेत्र के ऐसे व्यवहार पर कोई सवाल उठाते है तो लोग सिर्फ यही समझने लगते है कि ‘लड़की ज़रूर किसी का गर्भ समापन करवाने आई है| इसकी ज़रूर कोई गलती है|’ तो ऐसी सोच रखने वालों से यही कहूंगी ‘महोदय/महोदया, अगर कुछ बातें आपको ढंग से समझ में नहीं आती तो ज़रा बेढंग से ही सही, समझ जाइए कि ‘गायनोकॉलोजिस्ट के पास जाने का मतलब सिर्फ गर्भ समापन या प्रसव करवाना नहीं होता| वहां महिलाएं और भी कई शारीरिक समस्याओं के इलाज़ के लिए जाती है| और दूसरी, सबसे अहम बात ये है कि भारतीय कानून गर्भ समापन का वैध मानता है (खासकर तब जब महिला बिना किसी दबाव या भ्रूण के लिंग परीक्षण के बिना अपनी मर्जी से गर्भ समापन को चुनती है|)| इसलिए आप अपनी इस सोच में सुधार कीजिये| वरना सशक्तिकरण के नामपर आगे बढ़ने वाली सफल महिलाओं के किस्से यूं ही हमारे समाने आयेंगें, जो सिरे से संस्कृति और सिस्टम के नामपर हमारे अधिकारों, मान-सम्मान को सिरे से खारिज करते रहेंगें|

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तस्वीर साभार : Shekhar Soni/WFS

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