आप जहां रहते हैं वहां की लगभग तारीफ ही करते हैं| ये बात उस कहावत जैसी है कि अपनी दही को कोई खट्टा नहीं कहता| लेकिन हर मौके पर ऐसा करना कई बार हमें एक झूठ में जीने को मजबूर कर देता है| इसीलिए आज मैं ये नहीं कर सकता खासकर अपनी यूनिवर्सिटी के संदर्भ में, जिसका नाम है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) |

हमारी ये यूनिवर्सिटी महिलाओं के संदर्भ में सऊदी अरब जैसी है और इसबात का मुझे दुःख भी है| लेकिन इस दुःख के चलते चुप रहना मैं कहीं से भी मुनासिब नहीं समझता हूँ|  कहीं न कहीं सच तो ये है कि  मैं गलत को लिखने से ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकता| क्योंकि  इस लड़ाई को आधी-आबादी को खुद ही जारी करना और रखना होगा|

यूनिवर्सिटी का तहजीब वाला भेदभाव

मैं अपनी लेख की शुरूआत एएमयू के बुलबुलों के पसंदीदा अल्फाज ‘तहजीब’ से करना  चाहूंगा|  जब मैंने यहां एडमिशन लिया था तब मैंने लड़के-लड़कियों के बीच हो रहे भेदभाव का विरोध किया था और उस वक़्त मुझे यही याद दिलाया गया कि आपका दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) या  जवाहरलाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में नहीं एएमयू  है|

इतना ही नहीं, मुझे यह भी बकायदा बताया गया कि ‘यहां के अपने कायदे-कानून हैं|  यहां की अपनी तहजीब है| इसे आपको मानना ही पड़ेगा| नहीं तो चले जाओ कहीं और|’  ये वैसी ही धमकी है जैसे संघ के नेता मुस्लिमों को पाकिस्तान जाने के लिए देते हैं|  कौन कैसे रहेगा… क्या पहनेगा…| ये किसी की निजी जिंदगी है,  कोई अपनी विचारधारा को  दूसरे पर थोप नहीं सकता| लेकिन अफसोस एएमयू  में यही हो रहा है| अगर कोई आज़ाद विचारों वाली लड़की एएमयू में दाखिला लेती है तो उसे दूसरे तरीकों से इतना परेशान किया जाएगा  कि वो खुद ही बुर्का  या हिजाब पहनना शुरू कर देगी| अगर फिर भी नहीं पहनेंगी  तो उसके चरित्र पर सवाल उठाए जाएंगे| ‘बदचलन’ कहा जाएगा और मजहब का भी खौफ दिखाया जाएगा|

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छात्राओं के लिए ख़ास ‘सुरक्षा वाली बेड़ी’

इन सबके साथ एएमयू के कुछ सीधे नियम भी हैं,  जैसे कि आप बिना दुपट्टे के हास्टल से बाहर निकल नहीं सकती| फंक्शन में डांस नहीं कर सकती|  शाम के बाद हास्टल से बाहर नहीं जा सकती है और सबसे खौफ़नाक नियम ये है कि – एएमयू  में  हास्टल के अंदर हाल  या ब्लाक  होते हैं उनमें  भी रात बारह बजे के बाद ताले लगा दिए जाते हैं|

अगर कोई आज़ाद विचारों वाली लड़की एएमयू में दाखिला लेती है तो उसे दूसरे तरीकों से इतना परेशान किया जाएगा  कि वो खुद ही बुर्का  या हिजाब पहनना शुरू कर देगी|

गौरतलब है कि ये लड़कियों को किसी जेल का ही एहसास करवाता होगा| वहीं दूसरी तरफ अगर हम लड़कों के हास्टल की बात करें तो उनके लिए कोई नियम कायदे नहीं है और तो और यहां से आतंकवादी भी निकलते  रहते हैं – मन्नान वानी  इसका जीवंत उदाहरण  है, जब  एएमयू वालों  से ऐसे तालिबानी नियम-कायदों पर सवाल किए जाते हैं तो कहा जाता है कि ये सब लड़कियों की सुरक्षा के लिए है|

इसमें मुझे ये समझ नहीं आता कि लड़कियों को चारहदीवारी में बंद करके कौन-सी सुरक्षा  की वाहवाही लूट रहे हैं? वैसे एएमयू का महिला-विरोधी रवैया  शुरू से रहा है| चाहें सीटों को लेकर बात हो या नियमों-कायदों को लेकर|  मुझे अभी तक याद है जब एएमयू ने लड़कियों के लिए नियम बनाए थे कि वे सूट सलवार ही पहनेंगी| लेकिन मीडिया की आलोचना के बाद उन्हें ये नियम वापस लेने पड़े थे|

एएमयू में महिलाओं की नरकीय हालात

वहीं शिक्षा के इस केंद्र का अहम महिला-विरोधी नियम ये रहा कि एएमयू  की मौलाना आजाद लाइब्रेरी  में लड़कियां नहीं जा सकती थीं, जब इसकी वजह से साल 2014  में  तत्कालीन वीसी  जमीरूददीन शाह से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ‘अगर हम ऐसा कर देंगे तो लड़कों की लाइन लगातार बढ़ती जायेगी|’

जब नवा नसीम जनवरी में वीमेंस कालेज की प्रेसिडेंट बनी थीं तब उनको बाइक रैली के लिए परमिशन भी नहीं दी गई थी|

किसी भी विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा दिया गया इससे ज्यादा शर्मनाक बयान और क्या हो सकता है भला| इतना ही नहीं जब यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया तो इन्होंने दलील दी कि ‘हमारे पास लड़कियों को बैठाने के लिए जगह नहीं है|’ मुझे नहीं लगता है कि इससे बड़ा और कोई कुतर्क नहीं हो सकता है| खैर अच्छी बात ये रही कि हाईकोर्ट  ने लड़कियों के पक्ष  में अपना फैसला दिया|

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और अभी जब नवा नसीम जनवरी में वीमेंस कालेज की प्रेसिडेंट बनी थीं तब उनको बाइक रैली के लिए परमिशन भी नहीं दी गई थी| जबकि दूसरी तरफ लड़के जब चाहें कोई भी रैली  निकाल सकते हैं|  ये इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जहां बेटियां एक ओर फाइटर जेट उड़ा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ एएमयू में उनको बाइक चलाने के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है| साथ ही,  एएमयू में  यौन-हिंसा व छेड़छाड़ के मुद्दे आम हैं| आज भी एक विदेशी छात्रा से  छेड़छाड़  में कामर्स  फैकल्टी के एक प्रोफेसर आरोपी है, जो मामला अभी भी अदालत में लंबित है| इसके अलावा एक कश्मीरी छात्रा से यौन उत्पीड़न का आरोप विधि संकाय के प्रोफेसर शब्बीर  पर लगे थे और ये सभी एएमयू में महिलाओं की नरकीय हालात को समझने के काफी है|

आखिर में अपने लेख को खत्म करते हुए यही कहना चाहूंगा कि अगर आपकी आजादी खतरे में है तो चीखो, उसे हासिल करो| ऐसा नहीं करके आप अपने साथ ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ी के भी चुनौतियाँ खड़ी कर रही हैं इसलिए फैज साहब के शब्दों के मिलकर कहें

बोल के लब आजाद हैं तेरे

बोल जुबां अब तेरी है ‘’


तस्वीर साभार : sanjeevnitoday

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