हाल ही में फेसबुक पर ‘आंचल से परचम तक’ नाम के एक नुक्कड़ नाटक का पोस्टर देखा, जिसका आयोजन बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के विश्वनाथ मंदिर में 23 सितंबर को शाम चार बजे होना था| ये बेहद ख़ास नाटक था| क्योंकि ये केंद्रित था ठीक एकसाल पहले बीएचयू में एक छात्रा के साथ हुई यौन-उत्पीड़न की घटना पर प्रशासन के लीपापोती वाले रवैये से उग्र हुए छात्राओं के आन्दोलन पर| ये आन्दोलन अपने आपमें ऐतिहासिक था क्योंकि इसने न केवल बीएचयू प्रशासन बल्कि पूरे शहर को हिला दिया था| करीब तीन दिन तक चले इस आन्दोलन ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूट को डाइवर्ट करने को मजबूर कर दिया था| यह पहली बार था जब बीएचयू की छात्राएं सुरक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर थी, वो भी बिना किसी संगठन, संस्था या नेतृत्व के सहयोग से| इसी आन्दोलन के एकसाल पूरे होने के उपलक्ष्य में बीएचयू की छात्र-छात्राओं ने प्रतिरोध के कार्यक्रम का आयोजन किया था|

उल्लेखनीय है कि यह आन्दोलन बीएचयू प्रशासन के खिलाफ़ नहीं बल्कि हमारे समाज की सड़ी हुई पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ था, जो लड़की के खिलाफ होने वाली किसी भी घटना के बाद पहली ऊँगली लड़की के चरित्र पर उठाता है और सुरक्षा के नामपर बेड़ियों का शिकंजा सिर्फ और सिर्फ लड़कियों के मौलिक अधिकारों पर कसता था| बीएचयू में हुई इस घटना के बाद भी प्रशासन की तरफ से जो भी तथाकथित सुधार किये गये वो इसी तर्ज पर थे जहाँ लड़कियों के हास्टल के बाहर बैरिकेट और सीसीटीवी कैमरे लगाये गये| इतना ही नहीं, इस आन्दोलन के बाद प्रशासन का ऐतिहासिक कदम था पहली बार महिला चीफ प्रॉक्टर (प्रो. रोयना सिंह) की नियुक्ति| बीते रविवार को जब बीएचयू के छात्र-छात्राओं ने सालभर पहले हुए आन्दोलन की याद में जब प्रतिरोध कार्यक्रम का आयोजन किया था तो एकबार फिर विश्वविद्यालय प्रशासन का चेहरा सामने आया|

इतिहास की किताब में आधी आबादी भी ‘समानता’ के मूल पर होने वाले बदलावों को स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करवाने को आतुर है|

छात्राओं की आवाज़ का विरोध ‘जय श्री राम’ के साथ

जब छात्र-छात्राओं ने विश्वनाथ मंदिर (बीएचयू) में शाम चार बजे नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन शुरू किया तो विरोधी छात्रों (वे छात्र जो मुख्यरूप से संघी विचारधारा से ताल्लुक रखते हैं और जिनके लिए अपनी अधिकारों की मांग करना देशद्रोह है|) ने ‘वंदेमातरम्’ और ‘जय श्री राम’ जैसे नारे लगाने शुरू कर दिए| इतना ही नहीं, लड़कियों पर भद्दे-भद्दे कमेन्ट करने लगे| पर इसबार वे छात्राओं को पीछे नहीं हटा पाए और नुक्कड़ नाटक ज़ारी रखा| क्योंकि ये वही छात्राएं थी जिन्होंने सालों से ‘पढ़ने आई हो यहाँ पढ़ो’, ‘तुम्हारे घर वालों को बता दिया जाएगा’ और ‘यूनिवर्सिटी ने निकाल दिया जाएगा’ जैसी तमाम धमकियों से आगे बढ़कर अपने मौलिक अधिकारों की आहुति दी थी और आखिरकार तंग आकर पिछले साल सख्ती से साथ संगठित रूप से अपनी मांगों को रखा था|

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फिर दोहराया सड़े पितृसत्तात्मक प्रशासन का इतिहास

नुक्कड़-नाटक के बाद महिला महाविद्यालय के सामने जब छात्राओं ने ओपन माइक का कार्यक्रम शुरू किया तो विरोधी छात्रों ने यहाँ हिंसक रूप धारण कर नारे लगाते हुए छात्राओं के साथ धक्कामुक्की शुरू की| गौरतलब है कि इस दौरान बीएचयू की पूरी सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ मूकदर्शक बनी रही (पर बीते साल इनकी फुर्ती अपने चरम पर थी जब लड़कियों के ऊपर लाठीचार्ज की गयी थी) | तमाम विरोधी आवाजों के बाद भी छात्राओं ने क्रांतिकारी गीतों और कविताओं के माध्यम से अपना कार्यक्रम ज़ारी रखा| आखिर में विरोधियों ने छात्राओं पर हमला बोलते हुए उनके माइक को तोड़ दिया और जब प्रशासन पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि छात्राओं का कार्यक्रम बंद हो गया है तब चीफ प्रॉक्टर प्रभावी ढंग से घटना स्थल पर पहुंची| इस दौरान छात्रों के ऊपर लाठीचार्ज भी गयी|

As the protest of girls at Banaras Hindu University (BHU) for security and sensitivity crosses one year today, the girls and other students trying to celebrate the incident, ofcourse with the “ultra-hindu nationalist” disruption of Akhil Bhartiya Vidyarthi Parishad (ABVP).[Abusive words recorded live. Viewers discretion is advised.]

Posted by TwoCircles.net on Sunday, September 23, 2018

जैसा कि हमारे समाज और प्रशासन का रवैया रहा है, पहली ऊंगली लड़कियों पर उठाई गयी और कहा गया कि उन्होंने प्रशासन से कार्यक्रम की अनुमति नहीं ली थी| (वहीं कुछ छात्राओं ने बताया कि जब प्रोक्टोरियल बोर्ड के इसके लिए लिखित तौर पर अनुमति लेने का प्रयास किया गया तो वहां इसे नज़रअंदाज कर दिया गया था|) | वहीं दूसरी तरफ, जांच के आश्वसान के साथ सख्त कार्यवाई की बात कही गयी, जैसा पिछले साल भी कहा गया था| सूत्रों ने बताया कि ‘प्रशासन को छात्राओं के इस कार्यक्रम की भनक पहले ही लग चुकी थी और इसे रोकने की रणनीति भी बनाई जाने लगी थी|’

कहते हैं कि कई बार विरोध भी अच्छे होते हैं| इसी तर्ज पर, बीएचयू में छात्राओं की आवाज़ से बढ़ते विरोध भी आने वाले समय में होने वाले सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जगाते है| क्योंकि पितृसत्ता के मूल के आधार पर आधी आबादी को दबाने का इतिहास लंबा रहा है| पर अब इस इतिहास की किताब में आधी आबादी भी ‘समानता’ के मूल पर होने वाले बदलावों को स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करवाने को आतुर है|

छात्राओं का ये तेवर देखकर मैरी कॉम फ़िल्म का वो डायलाग बेहद सटीक लगता है कि ‘कभी किसी को इतना मत डराओ कि डर ही खत्म हो जाए|’ जब बीएचयू की लड़कियों का यह पूरा आन्दोलन देखती हूँ तो ऐसा लगता है कि अब वे पूरे प्रशासन से जहन में खत्म हुए डर के बाद अपनी बुलंद आवाज़ में यही कह रही हो कि ‘साड्डा हक ऐथे रख|’

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तस्वीर साभार : अमर उजाला 

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