वो वक्त था अक्टूबर 2012 का, जब भारत सहित कई देशों में लोगों ने 31 साल की सविता हलाप्पनावर की मृत्यु के विरोध में प्रदर्शन करना शुरू किया| सविता आयरलैंड में दांत की डॉक्टर थी और गर्भावस्था के दौरान उनकी हालत खराब होने पर उन्हें गर्भपात करवाने की अनुमति नहीं मिली, जिसके चलते उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी|

सविता हलाप्पनावर की मृत्यु से उठने वाले मुद्दों में एक सवाल यह भी था कि क्या गर्भसमापन करने से मना कर देना अनैतिक है, खासकर जब एक महिला की जान जोखिम में हो? कैथोलिक जननी स्वास्थ्य सेवाओं में, यह फैसला स्वास्थ्य प्रदाताओं की कैथोलिक स्वास्थ्य नीति के अंदर, गर्भपात के उपचार और गर्भसमापन के कानून की समझ के साथ टकराता है और प्रभावित होता है| आइये अपने इस लेख के ज़रिये हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि किस तरह ये मुद्दे एक साथ सविता हलाप्पनावर की मृत्यु के ईर्द-गिर्द आते हैं और इनके दुनियाभर में गर्भवती महिलाओं और जननी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए क्या परिणाम होंगें| यह केवल आयरलैंड में ही नहीं, बल्कि अमेरिकन महाद्वीपों में भी ऐसे मामलों का विश्लेषण करता है|

गर्भावस्था के दौरान मरने वाली वो बेनाम औरतें

साल 1987 में जब पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम शुरू किया गया| तब हर साल पांच लाख के करीब महिलाओं की गर्भावस्था के दौरान मृत्यु होती थी| जो महिलाएं इस दौरान मर रही थी, वे अक्सर बेनाम थी और उनकी मृत्यु न तो दर्ज की गयी और न ही इन पर कोई अध्ययन हुए|

कोई भी सरकार जो गर्भवती महिलाओं की मृत्यु को गंभीरता से लेती है, एक गर्भवती महिला की जान पर बन आने की हालात में आपात प्रसूति सेवा को ना दिए जाने का समर्थन नहीं कर सकती|

इन सब की तुलना में 28 अक्टूबर 2012 को एक समृद्ध परिवार से आने वाली, सविता हलाप्पनावर की मृत्यु से करें| पेशे से दांतों की डॉक्टर हलाप्पनावर की 17 हफ्ते के गर्भ के साथ दुर्घटना होने के बाद आयरलैंड (एक ऐसा देश जहाँ इस स्थिति में होने वाली मृत्यु की दर बहुत कम है|) के एक अस्पताल में मृत्यु हो गयी| सविता की मृत्यु गुमनाम और अँधेरे में नहीं रही| मृत्यु के चंद दिनों के अंदर ही उसकी फोटोग्राफ और नाम दुनियाभर में फ़ैल गया और केवल आयरलैंड ही नहीं, बल्कि भारत के साथ दुनियाभर में धरने प्रदर्शन हुए| इस घटना को अब काफी साल हो चुका है| सविता की मृत्यु दिन प्रकाशित होते रहते हैं, उसके पति द्वारा न्याय की मांग आयरलैंड में खबरों में सुर्ख़ियों में रहती है और आयरिश सरकार गर्भावस्था की समाप्ति से जुड़े कानून पर सविता की मृत्यु से पड़ने वाले प्रभाव पर गौर करने के लिए मजबूर हो गयी है| इसके परिणामस्वरूप एक ड्राफ्ट बिल तैयार हुआ जो 1 मई 2013 को ज़ारी किया गया,जिसके बाद साल 2013 गर्भसमापन पर लगे बैन को हटा दिया|

सविता हलाप्पनावर केस ने उजागर किये मातृत्व स्वास्थ्य के कई मुद्दे

सविता की मृत्यु कई वजहों से ख़ास बन गयी| पहला, गर्भ के समय होने वाली मृत्यु को रोकना विश्वभर में एक प्राथमिकता बन गया है| साल 2000 से ही, मिलेनियम डेवलपमेंट गोल 5 का मुख्य उद्देश्य गर्भावस्था के दौरान होने वाली मृत्युओं को साल 2014 तक 75 फीसद तक कम करना है| साल 2010 में इस तरह की मृत्यु को कम करना, संयुक्त-राष्ट्र महासचिव की महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर विश्व रणनीति के पांच मुख्य लक्ष्यों में से एक है| गर्भ के दौरान होने वाली मृत्यु, विश्व मीडिया में खबर की एक सामग्री बन गयी| मीडिया के संदर्भ में मृत्यु रोकने में सफलता या असफलता और महिलाओं के अनुभवों को नियमित रूप से दिखाता है|

तस्वीर साभार- 24ghanteonline

दूसरा, सरकारों को जवाबदेह बनाने के लिए मातृ मृत्यु दर को रोकने की ज़रूरी सेवा उपलब्ध करवाने में उनकी नाकामी, भारत के साथ और देशों में कोर्ट केसों में दिखाई देने लगी है| महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने जन विरोध और सीडॉ जैसी मानव अधिकार संस्थाएं, जो मामलों की जांच करता है और सरकारों को नीति सुझाव देते हैं, अब काफी दिखाई पड़ता है| सविता की मृत्यु  की ख़ास बात केवल यह तथ्य नहीं था कि क्या और किस हालत में एक महिला की जान और स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाने वाले गर्भ का समापन किया जा सकता है| बल्कि किस तरह ऐसी हालत में किसी स्वास्थ्यकर्मी का फैसला, उसकी कैथोलिक स्वास्थ्य नीति और गर्भसमापन पर आयरिश कानून की उनकी समझ से प्रभावित हो सकता है|

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आपात प्रसूति सेवा के रूप में गर्भसमापन

मेडिकल समुदाय में यह ज्यादातर माना जाता है कि गर्भावस्था से जुड़ी मृत्युओं की जांच गुप्त रहनी चाहिए| मृत्यु के कारणों की खुली जांच और भविष्य में ऐसी मृत्युओं को रोकने के लिए ज़रूरी कदम सुझाना, जिनसे ऐसी मृत्यु रोकी जा सकती हैं, इस तरह की जांच में शामिल होता है| यही आधार है जिसपर दशकों से यूके में गर्भावस्था से जुड़ी मृत्युओं की गोपनीय जांचें की और बांटी गयी हैं| नतीजतन ये प्रक्रिया दूसरे देशों के लिए एक मॉडल बन चुकी है| इन मामलों में यह मानकर चला जाता है कि संबंधित स्वास्थ्यकर्मी ने जो किया वह अच्छी नीयत से किया और इसलिए मुदा यह है कि जो भी गलती की गयी वे भविष्य में दोहराई न जाए और न कि जिन लोगों से गलती हुई है उन्हें सजा दी जाए| यह स्वास्थ्य सेवाओं में गलत तौर-तरीकों या नज़रंदाजी से निपटने से बहुत अलग है|

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ऐसे में अगर हम और खोजबीन में सविता जैसे और कुछ मामले सामने आते हैं तो कोई भी कैथोलिक स्वास्थ्य कर्मचारी या अस्पताल जो आपात प्रसूति सेवा के रूप में गर्भसमापन से मना करता है, उसके जननी स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में एक बड़ा योगदान देती हैं| अकेले आयरलैंड में करीब 40 फीसद अस्पताल कैथोलिक संस्थाओं के हैं, वहीं अमेरिका में ऐसे अस्पतालों का अनुपात करीब 30 फीसद हैं| कई देशों में, जैसे कि लैटिन अमेरिका और सब-सहारा अफ्रीका के ज्यादातर देशों में, कैथोलिक संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले अस्पताल जननी स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले या तो अकेले या मुख्य स्रोत हैं| तब भी सरकारों को ऐसे अस्पतालों को आर्थिक सहायता देनी बंद कर देनी चाहिए या धार्मिक संस्थाओं स्वर प्रदान की जाने वाली सेवाओं की जगह, गैर-धार्मिक सेवाएं लानी चाहिए या गैर-धार्मिक स्टाफ की तरफ से पूरे समय सुनिश्चित किया जाए ताकि गर्भवती महिलाओं की लापरवाही से हो रही मृत्युओं गर्भवती महिलाओं की मृत्यु को गंभीरता से लेती है, एक गर्भवती महिला की जान पर बन आने की हालात में आपात प्रसूति सेवा को ना दिए जाने का समर्थन नहीं कर सकती| गर्भावस्था को खत्म करना भ्रूण को निश्चित रूप से खत्म कर देगा – चाहे वह गर्भ चाहा हो या अनचाहा| अब हमें यहाँ समझना होगा कि यहाँ मुद्दा यह है कि क्या इन सब में महिला की ज़िन्दगी पहले आती है या नहीं? साथ हमें यह भी सवाल करने की ज़रूरत है कि गर्भसमापन महिला अधिकार का विषय है|


यह लेख क्रिया संस्था की वार्षिक पत्रिका यौनिकता, जेंडर और युवा अधिकार (अंक 8, 2014) से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

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तस्वीर साभार : pradeshjagran

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