“तुम इतना लेट क्यों आई हो?”

“पता है दीदी मैं तो बिलकुल टाइम से आना चाहती थी। पर घर में इतना सारा काम था, सभी काम निपटाकर आई हूं।” मैं थोड़ा मुस्कुराई और सोचने लगी कि रविवार के दिन एक बारह साल की बच्ची को भला क्या काम होगा?

इतनी देर में बारह साल का रवि (बदला हुआ नाम) बोला, “सनडे को थोड़ा लेट हो जाता है, इतने सारे काम करने होते हैं। पर मैं तो हमेशा टाइम पर आता हूं।” आश्चर्यचकित होकर मैंने पूछ ही लिया कि आखिर ऐसा क्या काम करना होता है?

तुरंत रवि ने कहा, “रविवार है, तो आज थोड़ी देरी से उठा, फिर नहाया, होमवर्क भी किया, खाना खाया फिर तैयार होकर यहां आ गया।”

राधा (बदला हुआ नाम) बोली, “दीदी, सुबह उठकर पहले झाड़ू लगाया, फिर नाश्ता बनाया, घर की साफ-सफाई की, सबको खाना परोसा, बर्तन साफ किए, कपड़े धोए, समय हो गया था तो जल्दी नहाया और फिर जल्दी भाग-भागकर आ गई।”

दो हमउम्र बच्चों से पूछे गए एक सवाल के दो एकदम विपरित जवाब एक पल के लिए किसी को हैरानी में डाल सकते हैं| पर ये हमारे समाज की वो हकीकत है जिसे हम हर रोज देखते हैं, जीते हैं और बहुत आसानी से नज़रदांज कर देते हैं| शायद इसलिए क्योंकि हमने ये मान लिया है कि यही हमारी हकीकत है। जेंडर आधारित फर्क जीवन में इतनी तेज़ी से और जल्दी अपनी पकड़ बना लेता है कि हमें खबर ही नहीं होती कि हम कब इस जाल में फंस गए – तब जब लड़का होने की बधाई देकर कहता है कि ‘बधाई हो घर में चिराग आया है’ या फिर तब जब बच्चों को अलग-अलग तरह के खिलौने देकर ये संदेश दिया जाता है कि लड़का तो नौकरी करेगा, हेलीकॉप्टर या गाड़ी चलाएगा और लड़की को किचन का समान देकर बिना कहे समझाना कि उसकी जगह किचन में है या फिर जब लड़के को प्राइवेट स्कूल में भेजा जाता है और लड़कियों को सरकारी स्कूल में| लड़कों को पढ़ने के लिए कहा जाता है और लड़कियों को पढ़ाई के साथ घर का काम सीखने के लिए या फिर तब जब बार-बार लड़कों को अपनी भावनाओं को काबू में रखने और लड़कियों को नाजुक और कोमल होने का पाठ पढ़ाया जाता है।

जेंडर आधारित भेदभाव जब इतनी सहजता से जीवन का अंग बना हुआ है, तो उसे चुनौती कैसे दी जाए? कैसे जेंडर रुपी ढांचे को जो ये तय करता है कि हमारी ताकत और कमजोरी क्या है? कौन सा काम हम कर सकते हैं और कौन सा नहीं या फिर हमारी क्या क्षमताएं हैं, हम क्या बनना चाहते हैं, एक वाक्य में कहे तो जिसने समाज में गैरबराबरी की खाई बनाई है उस कैसे बदले?

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दिल्ली की संस्था साहस ने इन्हीं बातों और मुद्दों को केंद्रित करते हुए किशोर-किशोरियों के साथ जेंडर पर संवाद करने की शुरुआत की। किशोरावस्था जीवन का एक बेहद अहम पड़ाव हैं, जहां शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलाव आते हैं| इसके साथ ही किशोर-किशोरियां अपने आसपास के समाज को लेकर सजग और संवेदनशील हो जाते हैं| ऐसे में अगर ये अपने जीवन में जेंडर आधारित फर्क को देख पाए तो वो न केवल इस भेदभाव को बल्कि जेंडर आधारित हिंसा को चुनौती देने के लिए भी तैयार हो जाएंगे।

साहस के काम की एक विशेषता ये है कि वो जेंडर पर बातचीत लड़के और लड़कियों को एकसाथ बिठाकर करते हैं, क्योंकि समाज में अलग-अलग जेंडर पहचान के लोग इकट्ठा रहते हैं और एक-दूसरे के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। दूसरी बात ये कि इस तरह वो समझ पाएंगे कि कैसे जेंडर आधारित फर्क एक दूसरे को प्रभावित करता है, उनके जेंडर के बदौलत उनके पास कौन से विशेषाधिकार है और कैसे वो एक-दूसरे का सहयोग कर इस भेदभाव को मिटा सकते हैं।

जेंडर का ढांचा लड़कियों के आज़ाद पंखों को कतरने और उनकी क्षमताओं को कैद करने का काम करता हैं, वहीं ये लड़कों को मर्दानगी के विषैले जाल में फंसता है।

“अपने घर में रोजमर्रा के जीवन में आपको लड़के और लड़कियों के बीच में क्या फर्क दिखाई देता है?”

सुधीर (14 साल का प्रतिभागी, नाम बदला हुआ है) – मेरे घर में तो लड़के और लड़कियों के बीच में कोई फर्क नहीं होता।

“अच्छा तो ये बताओ तुम स्कूल कैसे आते हो?”

सुधीर- “मेरे पापा ने मुझे साइकिल दिला रखी है तो उसी पर आता हूं।”

“क्या तुम्हारी कोई बहन है? अगर हां तो वो कैसे स्कूल जाती है?”

सुधीर- “उसका स्कूल सुबह होता है तो मैं उसे साइकिल से ले जाता और वापस घर छोड़ देता हूं।”

“तो कभी सोचा है कि तुम्हारे पापा ने तुम्हारी बहन को साइकिल क्यों नहीं दिलाई। अगर उसे दिलाई होती और वो तुम्हें स्कूल छोड़ने जाती?”

सुधीर के पास इस सवाल का जवाब नहीं था| पर उसके चेहरे के उड़े हुए रंग और हैरानी भरी आंखें इसबात की गवाह थी कि वो इसे अपने जीवन में पहली बार जेंडर को और उसकी वजह से मिले विशेषाधिकार को देख पा रहा था।

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जहां जेंडर का ढांचा लड़कियों के आज़ाद पंखों को कतरने और उनकी क्षमताओं को कैद करने का काम करता हैं, वहीं ये लड़कों को मर्दानगी के विषैले जाल में फंसता है।

हमारी बस्ती का माहौल बहुत खराब है| यहां अगर कोई भी लड़का-लड़की एक साथ दिख जाए तो आसपास के लोग तरह-तरह की बातें बनाते हैं। उन्हें ब्वॉयफ्रेंड और ग्रर्लफ्रेंड समझते हैं। मेरा भाई मुझसे छोटा है फिर भी वो मुझे ट्यूशन छोड़ने और लेने आता है। घर में थोड़ी भी देर से पहुंचो तो पिता जी तुरंत फटकार लगा देते हैं| पर मेरे बड़े भाई तो देर रात तक बाहर घूमते-फिरते हैं उन्हें तो कोई कुछ नहीं बोलता”– किशोरी प्रतिभागी

मेरी मां घरों में बर्तन धोने और साफ-सफाई का काम करती है तो मैं कई बार खाना बनाता हूं ताकि मां की मदद हो जाए। एक दिन मैं झाडू लगा रहा था तो पड़ोस की आंटी मम्मी से मिलने आई, मां उनके साथ बैठ गई तो मैंने दोनों के लिए चाय बना दी। आंटी ने तुरंत कहा कि तुम्हारा लड़का-लड़कियों वाले काम क्यों कर रहा है?” – किशोर प्रतिभागी

साहस द्वारा आयोजित वर्कशॉप्स के जरिए जब ये किशोर-किशोरियां अपने जीवन में जेंडर आधारित भेदभाव को देख और समझ पाते हैं तो इस फर्क को चुनौती देने का सबसे कठिन और अहम पड़ाव पूरा हो जाता है। सबसे रोचक बात ये है कि वो जेंडर के ढांचे और रुढ़िवादी मानसिकता के चक्रव्यूह को भेदकर सवाल पूछने लगते हैं और मौजूदा हकीकत को बदलने की कोशिश करते हैं।

“आपने ये तो बता दिया कि जेंडर क्या है, पर हमने टीवी सीरियल में ट्रांसजेंडर को देखा है, न्यूज़ में सुना था कि लड़का, लड़की के अलावा थर्ड जेंडर भी होता है। क्या ट्रांसजेंडर भी जेंडर पहचान है? वो कौन होते हैं और क्या ये फर्क उनके लिए भी इतना ही खराब है?” और इसी सवाल के जरिए जागरुक हुए किशोर-किशोरी जेंडर बाइनरी के स्थापित ढांचे को ध्वस्त कर एक नए समाज की परिकल्पना को मजबूती देते नजर आते हैं। 

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तस्वीर साभार : resourcecentre

2 COMMENTS

  1. प्रिय लेखिका,
    आपके द्वारा लिखित लेख, पूर्णतः समलैंगिक और द्विलैंगिक तथ्यों को प्रदर्शित करता है, एवं सामाजिक बुराइयों को कही न कही निषेधात्मक करता है, thatspersonal विभाग इस प्रकार के तथ्यों का समर्थन करता है.

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