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रत्नाबोली रे प्रसिद्ध मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ्य अधिकार पर काम करने वाली संस्था ‘अंजली’ की संस्थापिका हैं| यह संस्था मानसिक बीमारी और मनोवैज्ञानिक अक्षमता वाले व्यक्तियों पर ध्यान केंद्रित कर उनके  पुनर्वास और पुनर्संरचना की प्रक्रियाओं पर सरकार के साथ काम करती हैं। सालों से ये संस्था पं. बंगाल के क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर काम कर रही है और संस्था की इस सक्रियता का पूरा श्रेय जाता है रत्नाबोली जी को और उनकी इसी असाधारण सक्रियता के लिए उन्हें मानवाधिकार वॉच के एलिसन डेस फोर्ज पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है| आज आपके सामने प्रस्तुत है मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित रत्नाबोली रे जी के साथ स्वाती सिंह की ख़ास बातचीत के कुछ अंश :

स्वाती : आपके अनुसार मानसिक स्वास्थ्य क्या है?

रत्नाबोली : मानसिक स्वास्थ्य को बीमारी की बजाय इंसान के विकास के संदर्भ में देखने और समझने की ज़रूरत है| मेरे अनुसार मानसिक स्वास्थ्य का तात्पर्य किसी समुदाय में रहने वाले लोगों की इच्छा, चाहत, अनुभूति, शारीरिक विकास और जीवन में उनके लक्ष्य के संदर्भ में है| ये हमारे जीवन से जुड़ा एक अहम हिस्सा है, जो एक प्रक्रिया के तहत हमें हर पल प्रभावित करता है|

इंटरव्यू के दौरान स्वाती और रत्नाबोली रे

स्वाती : मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में आप काफी समय से काम कर रही हैं| ऐसे में शुरुआत से लेकर अब तक आप मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में किन बदलावों को देखती है?

रत्नाबोली : मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में समय के साथ कई बदलाव आये हैं, लेकिन कहीं न कहीं आज भी मानसिक स्वास्थ्य बाजारवाद का शिकार होता दिखाई पड़ रहा है| या यों कहें कि यह रिग्रेसिव बायोमेडिकल के एक क्रिटिकल जंक्शन में है| बेशक अब हम मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हुए है, पर वहीं दूसरी तरफ से ये जागरूकता हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में बढ़ते मेडिकल के प्रभाव ने ले ली है| साथ ही, मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपनी संरचनात्मक समस्या भी है, जिसके तहत मनोविज्ञान में मानसिक स्वास्थ्य को एक समस्या या बीमारी के रूप में और दवाइयों को इसके एकमात्र उपाय के देखा जाता है| ये स्थिति पहले भी और आज भी बनी हुई है| बेशक इसके रूप में बदलाव हुआ है लेकिन मूल वही है|


पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला का आगे बढ़ना और उसके हर कदम पर चुनौतियों का मिलना लाजमी है|


स्वाती : भारत में मानसिक स्वास्थ्य के विषय पर चर्चा आज भी केवल चिकित्सा के संदर्भ में सीमित है| आपके अनुसार इसके क्या कारण हैं?

रत्नाबोली : ये सिर्फ भारत की ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है| इसका प्रमुख कारण है मानसिक स्वास्थ्य को सीधेतौर पर चिकित्सा के संदर्भ में देखा जाना| इसके चलते हम यह उम्मीद करते हैं कि इस विषय पर बात किसी एक्सपर्ट के माध्यम से हो और वो एक्सपर्ट चिकित्सा जगत से जुड़ा हो और ये चलन बढ़ावा देते है मानसिक स्वास्थ्य को चिकित्सा के सीमित दायरों में समेटने के लिए| यहाँ यह भी समझना ज़रूरी है कि ज्ञान में बेहद ताकत होती है और जब ज्ञान किसी विशेष हाथों में हो तो उस क्षेत्र के दायरे चंद मानकों के तहत परिभाषित कर समेटे जाते है| जैसा मानसिक स्वास्थ्य और मनोचिकित्सक के संदर्भ में भी देखा जा सकता है|  वहीं दूसरी तरफ मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में बोली जाने वाली चिकित्सीय भाषा की राजनीति भी इसे चिकित्सा के संदर्भ में समेटने के लिए जिम्मेदार है| इस बात ऐसे समझा जा सकता है कि जब भी हम मानसिक स्वास्थ्य शब्द सुनते हैं तो तुरंत हमारे दिमाग में इससे जुड़ी बिमारियों के नाम, मनोचिकित्सालय की तस्वीर और मीडिया के ज़रिये दिखाई जाने वाली इलेक्ट्रिक शॉक ट्रीटमेंट की तस्वीरें सामने आने लगती है| इसका सीधा ताल्लुक हमारी भाषा से है, क्योंकि हम आमतौर पर अपने विचार या मनोभाव के संदर्भ में मानसिक स्वास्थ्य शब्द का इस्तेमाल नहीं करते हैं|

इसी कड़ी में अब इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि समाज की चर्चित व लोकप्रिय हस्तियाँ भी जब भी मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में अपने अनुभव साझा करती है तो उसके केंद्र में होती है चिकित्सीय भाषा में परिभाषित की गयी किसी बीमारी का नाम| इनका इस्तेमाल जैसे उनकी बात की प्रमाणिकता के लिए किया जाता है| ये अप्रत्यक्ष रूप से मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में हमारी समझ को चिकित्सा की भाषा में समेटने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है|  

और पढ़ें : मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता के मुद्दे पर ‘अंजली’ की बेहतरीन पहल

स्वाती : आपके अनुसार किन प्रभावी माध्यमों से हम मानसिक स्वास्थ्य के विषय पर समाज में एक स्वस्थ और सकारात्मक माहौल बना सकते हैं?

रत्नाबोली : मेरा मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य के विषय पर समाज में स्वस्थ और सकारात्मक माहौल बनाने के लिए सबसे पहले ज़रूरी है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को चिकित्सा की किसी शाखा की बजाय अपने विकास के संदर्भ में देखें, समझें और लागू करें| ये पहला प्रयास हम अपनी तरफ से और अपने के लिए कर सकते हैं| इसके साथ ही, इस विषय पर सतत चर्चा का होना बेहद ज़रूरी है, जिससे इससे जुड़े और भी पहलुओं पर हमारी समझ बनें और ज्ञान का आदान-प्रदान बने|

वहीं दूसरी तरफ, यह भी ज़रूरी है कि मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित इंसान के साथ हमारा सक्रिय संपर्क बने| उनके जीवन को मनोचिकित्सालय में समेटने की बजाय समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रयास हो और उनके साथ सीधा, स्वस्थ और सतत संवाद कायम रहे| मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में मीडिया की भी अहम भूमिका है| तमाम लेखों, प्रचारों, फिल्म, वीडियो, कार्यक्रमों और संचार के अन्य प्रभावी माध्यमों के ज़रिये हम इस विषय पर निरंतर बातचीत कायम कर एक सकारात्मक माहौल का निर्माण कर सकते हैं|

स्वाती : मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता के बारे में आपके क्या विचार हैं?

रत्नाबोली : मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता एक सिक्के के दो पहलू जैसे हैं| मानसिक स्वास्थ्य हमारे ज़िन्दगी जीने का एक ढंग है, जिसके अंतर्गत हमारी पसंद-नापसंद, चाहत, विचार, मनोभाव और व्यवहार शामिल है, जो यौनिकता के प्रमुख आधार भी है| लेकिन समाज में मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ अभी हम यौनिकता के साथ इसके गहरे ताल्लुक को समझ नहीं पा रहे है, जिसे समझना, विश्लेषण करना और इसे अपने व्यवहार में लाना बेहद ज़रूरी है|

स्वाती : अब तक आपने अपने कार्यक्षेत्र में ढ़ेरों उतार-चढ़ाव देखें हैं, इन सबके बावजूद आपने पूरी सक्रियता से एक गति में काम किया और आज भी कर रही है, ऐसे में आपका प्रेरणास्रोत क्या है?

रत्नाबोली : जी बिल्कुल| मैंने सालों से अपने कार्यक्षेत्र में ढ़ेरों चुनौतियाँ देखी है| पर मैं कभी रुकी नहीं, क्योंकि ये मुझे निरंतर आगे बढ़ने और डटे रहने की प्रेरणा देते है और इसका मुख्य आधार है मेरा अनुभव और मेरा पैशन| पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला का आगे बढ़ना और उसके हर कदम पर चुनौतियों का मिलना लाजमी है| इस चलन ने ही मुझमें हमेशा संघर्ष करने की फितरत को बढ़ावा दिया है|

स्वाती : कोई एक संदर्श जो आप हमारे पाठकों को देना चाहेंगीं?

रत्नाबोली : मैं पाठकों को यही संदेश देना चाहूँगीं कि आप मानसिक स्वास्थ्य को चिकित्सा की भाषा से परे अपने जीवनशैली के रूप में समझें और आत्मसात करें| इसके साथ ही, मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित किसी इंसान के प्रति मित्रतापूर्ण, सहयोगात्मक और सकारात्मक व्यवहार रखें और उनसे सतत व स्वस्थ संवाद बनाये रखें|  


तस्वीर साभार : scroll.in

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