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अक्सर कहा जाता है कि बच्चे किसी भी समाज का भविष्य होते हैं| इन बच्चों की बढ़ती उम्र और उम्र के साथ उनमें होने वाले बदलाव न केवल बच्चे के विकास बल्कि पूरे समाज के विकास की दिशा तय करते हैं| इन बदलावों के दौर में बेहद अहम पड़ाव होता है – किशोरावस्था, क्योंकि इस दौर के हर बदलाव, सीख और अनुभव हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा होते हैं

1950 के दशक में उत्तरी अमेरिका और दक्षिण प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों के किशोरों की यौनिकता में होने वाले बदलावों को उजागर करने वाली जीव वैज्ञानिक, मारग्रेट मीड संभवत: किशोरावस्था के अनुभवों की समानता पर सवाल उठाने वाली पहली महिला थीं| उसके बाद से ही आमतौर पर ऐसा मान लिया गया था कि किशोरावस्था की व्यापक परिभाषा को ‘परिवर्तन काल’ तक ही सीमित रखा जाना चाहिए जिसके दौरान इंसान को बच्चा नहीं माना जाता लेकिन वह पूरी तरह से वयस्क भी नहीं समझा जाता है| (मैकाल व अन्य 1995)

संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन, फोकस संगठन और कॉमनवेल्थ यूथ प्रोग्राम जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की विचारधारा से प्रभावित किशोरों के स्वास्थ्य विषय पर मौजूद पठन सामग्री में किशोरावस्था को 15-19, 15-24, 10-19 या 10-24 साल की उम्र के बीच का समय माना गया है| दुनियाभर में इस उम्र समूहों से संबंध रखने वाले व्यक्तियों के अनुभवों को परिभाषित करते समय ‘युवा लोग’, ‘युवा’ और कम उम्र के वयस्क’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बेहतर समझा जाता रहा है|

किशोरावस्था की उत्पति में शहरीकरण की अहम भूमिका रही है|

कई शारीरिक, वैधानिक, सांस्कृतिक-ऐतिहासिक, जनसांख्यिकी और व्यवहार संबंधी मानकों की वजह से किशोरावस्था एक सशक्त विचारधारा बनकर उभरती है| बहुत से देशों और हालातों में तो इस विचारधारा को पहचान मिलना अभी केवल शुरू ही हुआ है जबकि अन्य देशों में यह अच्छी तरह स्थापित हो चुकी है| आमतौर पर किशोरावस्था को शारीरिक बदलावों के आने के साथ-साथ यौनिक खासियतों और यौन व प्रजनन परिपक्वता के साथ जोड़कर देखा जाता है| पर यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि इन शारीरिक बदलावों में भी समय-समय पर बदलाव होते है| जैसे – स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति में सुधार के कारण हाल के दशकों में माहवारी शुरू होने की उम्र में कमी आई है|

कई शारीरिक, वैधानिक, सांस्कृतिक-ऐतिहासिक, जनसांख्यिकी और व्यवहार संबंधी मानकों की वजह से किशोरावस्था एक सशक्त विचारधारा बनकर उभरती है|

हाल ही के सालों तक बहुत से विकासशील देशों में किशोरावस्था की स्थिति या तो मौजूद ही नहीं थी या अपेक्षाकृत बहुत नई थी| बच्चे आमतौर पर अभिभावकों के बनाये नियम ‘शादी’ और ‘खतना’ जैसे सामाजिक आयोजनों के बाद वयस्क हो जाते थे| दुनिया के बड़े भाग में किशोरों की यौनिकता के बारे में कोई साफ़ दृष्टिकोण नहीं है| पश्चिमी देशों में समाजशास्त्र और मनोविज्ञान से किशोरों की यौनिकता को विकृत व्यवहार माना जाता है| इसीलिए किशोरों की यौनिकता और संतानोत्पत्ति के अंतर्गत इसे समस्या माना जाने लगता है| दुर्भाग्य से युवाओं के यौनिक विकास की स्वस्थ और सामान्य प्रक्रिया पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया गया है| वहीं इसके विपरीत युवा लोगों के यौन रूप से सक्रिय होने के बारे में कई तरह के मिथ्य अनुमान लगाये जाते रहे हैं और युवाओं के यौन रूप से सक्रिय होने के बारे में दिए गये ‘नैतिक’ फैसलों से ये स्थिति और अधिक पेचीदा हो जाती है|

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पूरी दुनिया में युवाओं की विशिष्ट जीवनशैली की उत्पति से  पारंपरिक पारिवारिक जीवन में आई कमी, अभिभावकों और परिवारों की भूमिका में हुई कमी और हमउम्र दोस्तों की बढ़ी हुई भूमिका के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है| किशोरों की भूमिका और व्यवहारों के बारे में किशोरों और अभिभावकों के बीच परस्पर विरोध दिखाई पड़ना अब तक एक सामान्य घटना बनती जा रही है|

शहरीकरण के दौर में किशोरावस्था

किशोरावस्था की उत्पति में शहरीकरण की अहम भूमिका रही है| ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरों के रहन-सहन में उन्हें पर्याप्त शिक्षा, औपचारिक रोजगार, नकद आय और खाली समय जैसी सुविधाएं नहीं मिल पाती| इसके विपरीत बड़ी संख्या में युवाओं के गृहयुद्ध या निर्धनता के कारण नगरों की ओर पलायन से अनौपचारिक रोज़गार या बेघर होकर रहने जैसी स्थितियां भी उत्पन्न कर दी है| कामकाजी बच्चों और किशोरों को आमतौर पर कम वेतन या बिना वेतन के काम करने या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक स्थितियों में काम करने को मजबूर होना पड़ता है| यूनीसेफ और अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने आर्थिक शोषण को परिभाषित करते हुए घरों में निजी काम करवाने, जबरन या बंधुआ मजदूरी करवाने और व्यावसायिक यौन शोषण जैसे कामों को शामिल किया गया है|

दुनियाभर में 100-200 मिलियन बच्चे और किशोर सड़कों पर या अस्थायी आश्रय स्थलों में रहते हैं और इनमें से बहुत से अपने अभिभावकों और परिवारों से अलग हो चुके होते हैं| केवल अपने संसाधनों पर आश्रित इन किशोरों को हिंसा के डर की वजह से जीवनयापन करने, जीवन मूल्यों, नेटवर्कों और संरचनाओं की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है|

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यौनिकता और किशोरावस्था

किशोरों और युवा लोगों की यौनिकता व प्रजनन स्थितियों के संदर्भ में संभव है कि इनके रहन-सहन की परिस्थितियों से इनके समक्ष असुरक्षित यौन व्यवहारों, अनचाहे गर्भ की स्थिति और यौन संचारित संक्रमण जैसी स्थितियां उत्पन्न हो जाए| युवावस्था का मतलब केवल यौनिकता के प्रति बढ़ती हुई जानकारी और इसे इस्तेमाल करने मात्र तक सीमित नहीं है बल्कि बहुत से देशों में तो समाज के वयस्कों से इन गैर-मान्यता प्राप्त यौन संबंधों को स्वीकार न किया जाना और इनके प्रति विद्वेषपूर्ण रैवैया रखना भी है| यौन परिपक्वता समय से पहले आने से और यौन संबंधों की वैधानिक उम्र होने की उम्र के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है|

यौन विषयों के बारे में किशोरों की अपेक्षा अनुभवहीनता और उनके यौन रूप से सक्रिय होने को सामाजिक कलंक के रूप में देखे जाने के कारण ऐसी संवेदनशीलता की स्थिति पैदा होती है जिसकी पहचान किया जाना और इसके हल खोजने की प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई है| किशोरों के जीवन की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए उनके लिए यौन व प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था करने और जीवन कौशल के विकास और स्कूलों में और बाहर यौन शिक्षा लेने के काम अभी अपने शुरूआती चरण में है|

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किशोरों की ये ज़रूरतें क्या हैं? किशोरावस्था ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित और बाल्यकाल से वयस्कता के बीच परिवर्तन और मानसिक, यौनिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन की जीवन की एक ख़ास स्थिति है| भले ही दुनियाभर के किशोर इस अवस्था में एक समान शारीरिक बदलावों और भावनाओं का अनुभव करते हों, फिर भी इनकी व्याख्या करने और इन व्याख्याओं के लिए सुझाए गये सामाजिक और वैधानिक उपायों में बहुत अधिक अंतर होता है|


यह लेख क्रिया संस्था की वार्षिक पत्रिका युवाओं के यौनिक एवं प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकार (अंक 2, 2007) से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

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तस्वीर साभार : wikipedia

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