माहवारी वैसे तो एक शारीरिक प्रक्रिया होती है पर इसके शुरू होने पर किसी भी युवा महिला के जीवन में बहुत से बदलाव आते हैं| अब इस तथ्य को पहचाना जाने लगा है कि माहवारी से जुड़ी सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां इस शारीरिक व मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ मिलकर सांस्कृतिक आधार पर निर्धारित मानकों और प्रथाओं को जन्म देती हैं|

पूरे विश्व की कई संस्कृतियों और भारत के कुछ भागों में माहवारी शुरू होने के समय ‘वय:संधि’ से जुड़े कई तरह के अनुष्ठान किये जाते हैं| मुम्बई की पिछड़ी बस्तियों और तमिलनाडु के एक गाँव में किये गये अध्ययनों से पता चला है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पली-बड़ी महिलाएं माहवारी शुरू होने की प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से मनाती  हैं| इस आयोजन का स्तर और विस्तार उस परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है|

माहवारी का मुद्दा भारतीय महिलाओं के जीवन में कई तरह की गंदगी, प्रतिबंधों और मान्यताओं से जुड़ा है और इस बारे में आमतौर पर चुप्पी रखी जाती है|

वैसे तो माहवारी एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है| फिर भी इसे एक तरह से रोग की स्थिति के रूप में देखा जाता है| महाराष्ट्र की ग्रामीण महिलाओं में स्त्री व प्रसूति रोग से जुड़ी जटिलताओं का स्तर बहुत अधिक (92 फीसद) पाया गया, जिसमें माहवारी से जुड़ी बहुत कम रक्तस्राव (22.4 फीसद), अधिक दिनों तक चलने वाला रक्तस्राव (0.8 फीसद), मासिक के समय भारी रक्तस्राव (15.1 फीसद), पीड़ादायी रक्तस्राव (57.4 फीसद) और अनियमित माहवारी (12.82 फीसद) समस्याएं शामिल थीं|

एक अध्ययन में गुजरात के वड़ोदरा नगर की पिछड़ी बस्तियों में रहने वाली महिलाओं ने माहवारी से जुड़ी समस्याओं को स्वास्थ्य संबंधी तीन समस्याओं के रूप में यानी कि अधिक रक्तस्राव, माहवारी से जुड़ी समस्याएं और कमजोरी होना बताया| उन्होंने शरीर में ज्यादा गर्मी, बार-बार गर्भधारण करने और नसबंदी को माहवारी के समय होने वाली समस्याओं का कारण माना| वड़ोदरा की पिछड़ी बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में किये गये एक अन्य अध्ययन में भी माहवारी के समय भारी रक्तस्राव, पीड़ादायी रक्तस्राव और बहुत कम रक्तस्राव को महिलाओं में आमतौर से होने वाली बीमारियों के रूप में बताया गया| शारीरिक कमजोरी, अधिक श्रम, मसालेदार भोजन का सेवन और गर्भाश्य और फेलोपियन नलिकाओं के संक्रमण को अधिक रक्तस्राव होने का कारण माना गया है|

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विस्तृत माहवारी पर सीमित अध्ययन

भारत में माहवारी के बारे में और इसके शुरू होने के बारे में बहुत कम अध्ययन किये गये हैं जिनमें मुख्य रूप से उम्र, जानकारी और समस्याओं के अनुभवों के आंकड़ें भी मिलते हैं| सांख्यिकीय रूप से दुनियाभर में माहवारी शुरू होने की औसत उम्र 13.54 साल पाई गयी हैं| भारत में मणिपुर की मैतयी जाति की लड़कियों पर किये गये अध्ययन में पाया गया माहवारी शुरू होने की औसत उम्र 13.34 साल थी| इस उम्र से पहले माहवारी शुरू होने वाली लड़कियों आमतौर पर अधिक लंबी, भारी व चौड़ी थीं और माहवारी शुरू न होने वाली लड़कियों की तुलना में उनकी त्वचा अधिक तैलीय थी|

माहवारी को अस्वच्छ माने जाने और इसके कारण महिलाओं के मन में अपने शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया के बारे में शर्म महसूस किये जाने का एक लंबा इतिहास है|

माहवारी का मुद्दा भारतीय महिलाओं के जीवन में कई तरह की गंदगी, प्रतिबंधों और मान्यताओं से जुड़ा है और इस बारे में आमतौर पर चुप्पी रखी जाती है| चूँकि इसे घरेलू जीवन से संबंधित एक निजी विषय समझा जाता है इसलिए इस विषय पर बहुत कम चर्चा की जाती है और माहवारी शुरू होने पर लड़कियों को प्राय: आश्चर्य होता है| इसके कारण माहवारी शुरू होना एक पीड़ादायक अनुभव बन जाता है| माहवारी की शारीरिक प्रक्रिया के बारे में जानकारी के अभाव और इसे यौनिक विकास और प्रजननशीलता के साथ जोड़कर बताये न जाने के कारण छोटी उम्र की लड़कियां इस बारे में बात करने या अपने अनुभवों को बांटने में शर्म महसूस करती हैं| माहवारी के दौरान उन्हें अपवित्र बताकर अलग रखने, पुरुषों के साथ इसको सीमित करने, धार्मिक स्थलों में जाने से रोकने और खुद को पूरी तरह ढककर रखने के लिए कहने से किशोर उम्र की लड़कियों को हीनता का अनुभव होता है| पहली बार माहवारी आने पर आमतौर पर उनके मन में अपने शरीर के प्रति नकारात्मक विचार आने लगते हैं और न केवल माहवारी को सहने बल्कि इसके कारण उनके जीवन में उत्पन्न बदलावों के चलते उनमें जीवन के प्रति कटुता भी आने लगती है|

महिला की यौनिकता और माहवारी

शारीरिक परिपक्वता आने और इससे जुड़े मायनों के बारे में किशोर उम्र की लड़कियों की यौनिकता, समाज में उनकी स्थिति और प्रजनन स्थिति और उनके समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं| चूँकि यह प्रक्रिया लड़कियों के शरीर से जुड़ी हुई है ऐसे में माहवारी को महिला यौनिकता से जोड़कर देखा जाता है| और इससे उनके व्यवहार संबंधित बदलाव पर ढ़ेरों प्रतिबन्ध भी लगाये जाते हैं, जिससे किशोर उम्र की लड़कियों के मन में शर्म का भाव आने लगता है और खुद के बारे में उनकी सोच पर नकारात्मक असर होने लगता है| माहवारी को अस्वच्छ माने जाने और इसके कारण महिलाओं के मन में अपने शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया के बारे में शर्म महसूस किये जाने का एक लंबा इतिहास है|

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दुनियाभर में माहवारी के साथ ढ़ेरों प्रतिबन्ध और मान्यताएं जुड़ी हुई है| करीब पूरे विश्व में माहवारी के दौरान आने वाले रक्त, योनिस्रावों और प्रसव के बाद निकलने वाले पदार्थों को गंदा माना जाता रहा है| किसी जगह पर माहवारी से गुजर रही महिलाओं की उपस्थिति मात्र को ही किसी काम को खराब करने के लिए पर्याप्त माना गया है| कई समाजों में अभी भी महिलाओं पर कई तरह की पाबदियाँ लगा दी जाती है और कुछ में तो उन्हें पूरी तरह से अलग कर दिया जाता है|

लैंगिक भेदभाव को कम कर सकती है माहवारी पर स्वस्थ चर्चा

माहवारी शुरू होने को आमतौर पर प्रजननशीलता और संतानोत्पत्ति से जोड़कर देखा जाता है, जिसके चलते इसे शर्म का विषय मानकर इसपर और इससे जुड़े विषयों के बारे में किशोर लड़कियों से चर्चा नहीं की जाती है| ऐसे में शारीरिक व मानसिक बदलावों के बारे में युवाओं को स्वीकार्य तरीकों के माध्यम से जानकारी दिए जाने की ज़रूरत है जिससे उनके अभिभावक, स्कूल और समुदाय स्वीकार कर सकें| इसके लिए सरकार, गैर-सरकारी संगठनों, अनुसंधानकर्ताओं, अध्यापकों और स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर किशोरावस्था के दौरान युवाओं कि उनकी शारीरिक और मानसिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सशक्त किया जाना चाहिए| इस तरह दी गयी जानकारी और ज्ञान के शुरू होने से ही महिलाओं और समाज की स्थिति में सुधार की कल्पना की जा सकती है और उनके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी जिससे कि जेंडर के आधार पर असमानता में कमी आएगी|


यह लेख क्रिया संस्था की वार्षिक पत्रिका युवाओं के यौनिक एवं प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकार (अंक 2, 2007) से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

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तस्वीर साभार : rediff.com

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