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मुझे टैटू बनवाने का काफी समय से मन था तो मैंने अपनी बाजू में एक टैटू बनवा लिया। अब सर्दी के दौरान शॉल या जर्सी में वो दिखाई नहीं देता पर गर्मी में आसानी से नज़र आ जाता है। उसे देखकर लोग तरह-तरह की बातें बनाते हैं, मज़ाक उड़ाते हैं। मेरे सहकर्मी भी मुझे बॉडी बिल्डर के नाम से पुकारते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि मेरे टैटू बनावाने से किसी को क्या समस्या हो सकती है।

सुधा (बदला हुआ नाम) की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि इससे पहले विजय ने कहा, “अभी हम सब में यही चर्चा हो रही थी कि जेंडर और यौनिकता पर समझ बनाते ही समाज में एकदम से क्रांति नहीं लानी है। ये बदलाव धीरे, सतत और क्रमानुसार होना चाहिए। आपने आज टैटू बनाया है, कल कोई और कलाकारी करेंगी तो लोग आप को गंभीरता से नहीं लेंगे। ऐसा ही होता है कुछ सीखते ही आप कुछ अलग करने की होड़ में लग जाते हैं।

वहीं विपन ने झट से तर्क दिया, “ये तो सही है कि आपकी इच्छा हुई टैटू बनाने की तो आपने बना लिया। पर हमें सोचना चाहिए कि अगर हमारे किए काम से कोई असहज हो रहा है तो क्या वो सही है? अपनी यौनिकता को अभिव्यक्त करने का कतई मकसद ये नहीं है कि आप दूसरा को असमंजस में डाल दें।”

बचपन से स्थापित किए गए जेंडर और यौनिकता के नियमों का पालन करते हैं, भेदभाव को चुपचाप देखते रहते हैं तो सब सहज रहता है|

बातचीत का ये अंश वाराणसी के नागेपुर गांव में युवा समाजिक कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित ‘जेंडर, यौनिकता और सरोकार’ प्रशिक्षण से लिया गया है। ये चर्चा कई मायनों में दिलचस्प है और इसके अलग-अलग अर्थ निकाले जा सकते हैं। पर मेरे लिए ये एक उमदा उदाहरण है पितृसत्ता और महिला की यौनिकता के टकराव का – एक महिला जो गांव में रहती है और सामाजिक मुद्दों पर काम करती है वो टैटू बनवाती है, ये उसकी मर्जी है और टैटू उसके लिए उसकी पहचान का अभिन्न हिस्सा है। ऐसा सोचा जा सकता है कि जेंडर आधारित मुद्दों पर समझ बनने और घर के बाहर काम करने की वजह से उसने टैटू बनवाने का विचार किया, पर ऐसा भी हो सकता है कि वो टैटू बनवाने की इच्छा पहले से रखती हो पर क्योंकि अब वो बाहर जाती है, अलग-अलग लोगों से मिलती है, स्वाबलंबी बन चुकी है तो उसमें अपने आप को अभिव्यक्त करने का साहस आ गया है। ऐसे में महज उसकी अभिव्यक्ति पर सवाल खड़े करना, ताने मारना, अलग-अलग नामों से पुकारना और उसके सामाजिक कार्य को नज़रअंदाज करना कितना सही होगा? ये सोचने वाली बात है।

पितृसत्ता एक अदृश्य हथियार की तरह है जो बिना दिखे जीवन के हर कदम पर आपको चोट पहुंचता है, आपका नुकसान करता है और आपकी मानसिकता को भ्रष्ट करता है| पर आप इसे जीवन का हिस्सा समझते हुए बड़ी आसानी से नजरदांज कर देते हैं। पर जैसे ही कोई शख्स (यहां पर सुधा) पितृसत्ता को जवाब देती है महज अपनी इच्छा की पूर्ति करते हुए तो पितृसत्ता के पहरेदार जवाबी कार्रवाई करने के लिए तैयार हो जाते हैं। अब ये समझ में नहीं आता कि सुधा के शरीर पर बना टैटू उसके आसपास के लोगों को कैसे असहज कर देता है? क्या टैटू की बनावट से दिक्कत है? क्या टैटू आपकी आंखों में चुभ रहा है? क्या उससे ऐसी किरणें आ रही हैं जिससे आसपास का वातावरण दूषित हो रहा है? एक ही जवाब है ‘नहीं’| फिर परेशानी क्या है? परेशानी ये है जनाब कि एक औरत अपनी यौनिकता अभिव्यक्त कर रही है, अपनी इच्छा से कदम बढ़ा रही है, समाज में ऐसा सिर्फ मर्द करते है, ये औरतों की चीज नहीं है।

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हैरानी की बात ये है कि जब इसी गांव में एक महिला अपने पति द्वारा हिंसा की शिकार बन रही होगी, एक बच्ची को स्कूल जाने से रोक दिया गया होगा, लड़की की कम उम्र में शादी कर दी होगी या फिर ससुरालवाले अपनी बहू से दिनरात कमर तोड़ काम करवा रहे होंगे, तब ये लोग जो भले ही समाज के हित में काम करते हो पर बीच-बचाव करने से पहले दस बार सोंचेगे। ये कटाक्ष महज पुरुषों पर नहीं है, बल्कि हर उस शख्स पर है जो नैतिकता का हवाला देते हुए यौनिकता की अभिव्यक्ति पर उंगली उठाता है। किसी के बारे में पूर्वानुमान लगाने, धारणा बनाने और ताने मारने से पहले क्या हम एक क्षण रुककर अपनी मानसिकता पर सवाल कर सकते है?

इस कार्यशाला में भाग लेने वाली कुछ महिलाएं स्वंय सहायता समूह और कुछ सिलाई सेंटर चलाते हुए गांव की महिलाओं में माहवारी, हिंसा के प्रति जागरुक करने और उन्हें स्वाबलंबी बनाने का काम करती हैं। ये प्रतिभागी भी इसी गांव की निवासी है, ऐसे में जब उन्होंने घर से निकलने की शुरुआत की थी तो उन्हें ऐसी ही अनेक धारणाओं, उलाहनों और पाबंदियों का सामना करना पड़ा।

पितृसत्ता एक अदृश्य हथियार की तरह है जो बिना दिखे जीवन के हर कदम पर आपको चोट पहुंचता है, आपका नुकसान करता है और आपकी मानसिकता को भ्रष्ट करता है|

बचपन में साइकिल चलाना सीखा था, लेकिन किशोरावस्था में पहुंचते ही परिवारवालों ने साइकिल चलाने से रोक दिया। लेकिन फिर काम करने का मौका मिला तो घर से बाहर साइकिल से ही जाते थे| लोग अजीब नज़रों से देखते है, तरह-तरह की बातें बनाते हैं – बोलते हैं कि तुम्हारे घर में कोई मर्द नहीं है क्या जो औरत की कमाई पर घर चल रहा है? पर जब मैं साइकिल चलाती हूं तो आज़ाद पक्षी जैसा महसूस होता है| घर से बाहर निकलने को मिलता है| नए लोगों से मुलाकात होती है और एक निश्चित ढर्रे से चल रही जिंदगी में आनंद की अनुभूति होती है।”– महिला प्रतिभागी

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पितृसत्ता ने महिला के शरीर को एक जंग का मैदान बना दिया है – सिर पर पल्लू रखो, आंखे झुकाकर रखो, घर से बाहर निकलो तो अनुमति लेकर निकलो, घर से बाहर जाने की समय सीमा तय है, तन को ढककर रखो, ये हाथ घर का काम करने के लिए है जिसके लिए आपको अठन्नी भी नहीं मिलेगी पर ये आपकी ही जवाबदारी है, आनंद चाहे वो प्यार, सेक्स या गर्भवती होना है तो वो शादी के बाद भी आप महसूस कर सकते हैं इत्यादि। इन सभी बातों को परिवार और समाज की इज्जत से जोड़ दिया जाता है ताकि अगर महिला इस लक्ष्मण रेखा को पार करने का हौसला जुटाए तो भय, शर्म और ग्लानि जैसी भावनाएं उन्हें तुरंत अपनी गिरफ्त में ले ले।

जब हम एक पटे हुए ढर्रे पर चलते हैं, बचपन से स्थापित किए गए जेंडर और यौनिकता के नियमों का पालन करते हैं, भेदभाव को चुपचाप देखते रहते हैं तो सब सहज रहता है| लेकिन पितृसत्तारुपी दानव हमारी क्षमताएं सीमित कर देता है, हमें आगे बढ़ने से रोक देता है और समाज के समावेशी विकास पर पूर्ण विराम लगा देता है। जेंडर आधारित भेदभाव को चुनौती देना, अपनी यौनिकता को अभिव्यक्त करना और हिंसा के खिलाफ़ कमर कसना भले ही मुश्किल हो, इससे आसपास के लोग असहज होने का हवाला दे, पर खुद के लिए एक बेहतर समाज बनाने और सामाजिक बदलाव लाने के लिए हमें ढर्रे से हटकर आगे बढ़ना, सहजता के घेरे को तोड़ना और रुढिवादी ढांचों को ध्वस्त करना होगा।


तस्वीर साभार : huffingtonpost

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