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जब भी बलात्कार होता है तो हर ओर एक ही आवाज उठती है कि बलात्कारियों को फांसी मिलनी चाहिए| लेकिन क्या कभी उस महिला के बारे में सुना है, जिसने इसबात को सार्थक करके दिखाया हो| हमारे समाज में अगर लड़की बोलती-चालती हो या अपने सम्मान के लिए लड़ना जानती  हो तो उसे दो ही खिताब मिलते है या तो उसे झांसी की रानी बोल दिया जाता है या उसे चरित्रहीन कह दिया जाता है| इन दो खिताबों की कहानी भी बदली जब लड़कियों को फूलन कहां जाने लगा| मेरी उम्र तब दस साल की रही होगी जब अपने भाई को बचाने के चक्कर में एक लड़के को थप्पड़ मार दिया और घर आकर जब यह बात उसने इस माजरे में कहा तो मेरी चाची मुझे फूलन देवी कहा| उस वक्त मेरी पहचान फूलन देवी से बस खूंखार डाकू की थी| बचपन बीता तो फूलन देवी के बारे में पढना शुरू किया तो उनके साहस से रु-ब-रु हुई|

फूलन देवी की कहानी को हर स्त्री को पढ़ना चाहिए क्योंकि हम फूलन तो नहीं बन सकते लेकिन उनसे प्रेरणा तो ले ही सकते है| फूलन का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के घूरा का पुरवा में हुआ था, मल्लाह समुदाय में जन्मी फूलन को अक्सर ठाकुर समुदाय से आने वाले पुरूषों से लड़ाई करना पड़ जाता था| वह परिवार में चौथी संतान थी और बचपन से ही वह अपने तेज स्‍वभाव की वजह से पूरे गांव में चर्चित थीं| समाज की उन तथाकथित लड़कियों की तरह नहीं थी जो चुप रह जाए या अन्याय के खिलाफ आवाज ना उठाए| वह पितृसत्तात्मक समाज से जन्मी लड़की नहीं थी| गरीब परिवार में जन्‍मी फूलन को जब पता चला कि उसके पिता की जमीन उसके चाचा ने हड़प ली है तो बगावत करने और जमीन वापिस हासिल करने के लिए फूलन ने धरना प्रदर्शन किया। इस बात से घबरा कर फूलन के पिता ने 10 वर्ष की छोटी सी उम्र में ही उसका विवाह कर दिया। फूलन का वि‍वाह 30 वर्ष एक आदमी से किया गया, शादी की पहली रात ही फूलन के पति ने उनके साथ बलात्कार किया| इसके बाद रोज ही फूलन का बलात्कार होने लगा जिससे तंग आकर वह घर वापस आ गई| गांव वापस लौटने पर फूलन को सभी लोगों के तिरस्‍कार को सहना पड़ा। वहीं गांव के किशोर लड़के फूलन को आते-जाते छेडते| जब वह पंचयात में जाती तो उनके खिलाफ ही फैसला सुना दिया जाता| उन्हें निम्न जाति में पैदा होने कारण बहुत अपमान सहना पड़ा|

ससुराल वापस आने के बाद फूलन देवी डाकुओं के संपर्क में आई | (लेकिन इस बारे में अभी तक कोई पुख्‍ता जानकारी नहीं है|) कुछ लोगों का कहना है कि डाकुओं ने उन्‍हें अगवा कर लिया था| हालांकि फूलन देवी ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में कहा था कि ‘किस्‍मत को यही मंजूर था| डाकुओं के सरदार बाबू गुज्‍जर ने भी फूलन का बलात्कार किया| विक्रम मल्‍लाह से यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने डाकू बाबू गुज्‍जर की हत्‍या कर दी | इस तरह अगले दिन वह डाकुओं का सरदार बन गया| श्रीराम ठाकुर और लाला ठाकुर का गैंग था ये, जो बाबू गुज्जर की हत्या से नाराज था और इसका जिम्मेदार फूलन को ही मानता था| दोनों गुटों में भीषण लड़ाई हुई और इसमे विक्रम मल्लाह को अपनी जान गंवानी पड़ी| कहा जाता है कि ठाकुरों के गैंग ने फूलन का अपरहण कर बेरहमी से तीन हफ्ते तक बलात्कार किया| ऐसा उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में भी दिखाया गया है| लेकिन माला सेन की फूलन के ऊपर लिखी किताब में फूलन ने इस बात को कभी खुल के नहीं कहा है|

निम्न जाति में पैदा होने कारण बहुत अपमान सहना पड़ा|

फूलन ने हमेशा यही कहा कि ठाकुरों ने मेरे साथ बहुत मजाक किया| उन्होनें हमेशा इसी बलात्कार के लिए इसी शब्द का इस्तेमाल किया है| आज की औरतें भी बलात्कार शब्द को खुले रूप से स्वीकार नहीं कर पाती| इस सब से वह भाग खड़ी हुई औऱ 1981 में यहां से छूटने के बाद फूलन डाकुओं के गैंग में शामिल हो गई| 1981 में फूलन बेहमई गांव लौटी औऱ वह दो लोगों को पहचान गई जिन्होंने उनके साथ बलात्कार किया था| उसके बाद बाकि लोगो के बारे में पूछा तो किसी ने कुछ नहीं बताया| फूलन ने गांव से 22 ठाकुरों को भरे बाजार में खड़े रहकर लाइन से गोली मार दी|

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इस हत्याकांड ने उन्हें अब दहशत की रानी बना दिया और वह फूलन से बैंडिट क्वीन बन गई| बेहमई कांड ने उन्हें पूरे राज्य में मशहूर कर दिया लेकिन इसके बाद ही उन्हे पकड़ने के मनसूबे बनाए जाने लगे और वह हर बार बच निकलती| भिंड के एसपी राजेंद्र चतुर्वेदी इस बीच फूलन के गैंग से बात करते रहे थे| आखिरकार एसपी की व्यवहार-कुशलता का ही ये कमाल था कि दो साल बाद फूलन आत्मसमर्पण करने के लिए राजी हो गईं| मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने उन्होनें आत्मसमर्पण कर दिया|

फूलन ने बचपन से ही कई तरह की यातना सही लेकिन तब समाज उनके लिए लड़ना तो दूर उनका मखौल उड़ाता रहा|

उन पर 22 हत्या, 30 डकैती और 18 अपहरण के आरोप लगे और 11 साल जेल में भी रहना पढ़ा| इसके बाद 1996 में फूलन देवी ने समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ा और जीत गईं| मिर्जापुर से सांसद बनीं| 25 जुलाई 2001 को फूलन देवी संसद से लौट रही थीं तब शेर सिंह राणा ने अपने अशोक नगर निवास के गेट पर उन्हें गोली मार दी| उन्हें अस्पताल भी ले जाया गया लेकिन वह बच नहीं पाई|

फूलन ने बचपन से ही कई तरह की यातना सही लेकिन तब समाज उनके लिए लड़ना तो दूर उनका मखौल उड़ाता रहा| किसी भी महिला को बंदूक तब उठानी पड़ती है जब समाज और धर्म के ठेकेदार चुप्पी साधे रहते है| बीहड़ से राजनीति के गलियारों तक पहुंचने का सफर कई चुनौतियों से भरा था लेकिन फूलन ने उन्हें पार ही नहीं किया बल्कि करोड़ो महिलाओं के लिए मिसाल बन गई|

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तस्वीर साभार :FirstPost

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