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कुसुम त्रिपाठी

राजनीति एक सार्वजनिक क्षेत्र है| पर परम्परागत रूप से भारतीय महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में आने की मनाही रही है। फिर भी 20वीं सदी में गांधीजी के प्रभाव से महिलाएँ भारी संख्या में राजनीतिक आन्दोलनों में भाग लेने लगी थी। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण ’बंदिश’ है।

धार्मिक संहिताएँ (मनुस्मृति) सदियों से स्त्री को नियंत्रण और पाबन्दियों में रहने का आदेश देती है। बंदिशों की साजिश है, पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को अपनी मिल्कियत समझाता है और लाख हजार कोशिशों के बावजूद वह महिला को अपनी जरूरत की सामग्री समझता रहेगा। जिस समाज में बेटियों को देर रात बाहर रहने के अंजाम से डराया जाता है, हमारे घरों में बेटियों को सहेली के घर जाने तक के लिए झूठ बोलना पड़ता है, फोन पर बात करने, घर पर आने-जाने को हर पल का हिसाब देना होता है। लड़कियों के खुलकर बोली गई बातों पर घर के ही तिलमिलाए लोगों को फ्रस्ट्रेशन से जूझना पड़ता है। इन सब कारणों से हमारी शक्तियाँ, हमारी स्वभावगत संवेदनशीलता की वजह से इन छोटी-छोटी व्यर्थ की लड़ाइयों में इतनी खर्च हो जाती है कि हमारे उड़ानों की ऊँचाई, उनकी परिधि निःसंदेह घटती जाती है।

लम्बी, ऊँची उड़ान भरने की हमारी महत्वकांक्षा को हमारे चरित्र को यूं गूंथ दिया जाता है कि अपनी महत्वकांक्षाओं को हम खुद किसी संगीन गुनाह की तरह देखने लगते हैं। समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है, इसलिए महिला अधिकारों को मानवाधिकारों से काटकर देखा जाता हैं, महिलाओं को लोकतांत्रिक स्थान और मानवाधिकारों की गारंटी देने में विफल रहता है। महिलाओं की समस्याओं के बारे में चिन्ताओं को अक्सर पीछे धकेल दिया जाता है क्योंकि प्रतिनिधि संस्थाओं में अल्पमत में होने के कारण महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया में कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाती इसलिए उनके हस्तक्षेप को प्रभावी बनाने के लिए उनका राजनीतिक सबलीकरण बेहद जरूरी है।

महिलाओं को खुद अपने लिए रास्ते बनाने होगें।

उल्लेखनीय है कि भारतीय सवंधिन में महिलाओं की स्वतंत्र, सक्रिय और समान राजनीतिक हिस्सेदारी को स्वीकार किया गया और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका के लिए उनके राजनीतिक सबलीकरण की जरूरत को रेखांकित किया।

स्वतंत्र भारत की पहली लोकसभा में चुनाव के लिए 43 महिला प्रत्याशी खड़ी हुई, जिसमें कुल 14 चुनाव जीती। जवाहरलाल नेहरू का ध्यान इस ओर गया और उन्होंने कहा- मुझे अफसोस है कि इतनी कम महिलाएँ चुनाव जीती है। इसकी जिम्मेदारी हम सब पर है………हमारे कानून, हमारे समाज में सब जगह पुरूषों का वर्चस्व है और हम सबका इसको लेकर एकतरफा रवैया है……….लेकिन अंत में महिलाएँ ही भारत में भविष्य की निर्मात्री होंगी। (राय, शीरिन 1997, जेण्डर एण्ड रिप्रजेटेंशन : विमेन एमपीज इन इंडिया इन ऐनी-मारी मोटे (एडि.) गेटिंग इन्स्टीटूशन राइट फॉर विमेन, लंदन जेड बुक 1997)।

वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के लिए कोई उपाय नहीं सोचे गए। राजनीतिक पार्टियाँ स्वाधीनता के सुख बोध और विभाजन से जुड़ी भयावह हिंसा की भावनाओं में ही डूबी रही और उनका पूरा ध्यान वही लगा रहा। महिला समूहों के लिए विभाजन के समय महिलाओं पर हिंसा, (बलात्कार, अपहरण, कत्ल) का मुद्दा सर्वोपरि हो गया। उस समय सामाजिक समस्याएँ ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई और राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा पीछे छूट गया। आश्चर्य है कि स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं की जबरजस्त भागीदारी देखी गई थी| पर स्वतंत्रता के बाद कई महिला नेत्रियाँ ने राजनीति से सन्यास ले लिया तो कई कल्याणकारी योजनाओं के अर्न्तगत समाज सेवा जैसा कार्यों में जुट गईं।

अस्सी के उत्तरार्थ में राजनीति का अपराधीकरण होने लगा। आज तक सफेदफोश नेताओं की जो डॉन लोग, भाई लोग, माफिया लोग, मटका किंग और कई अफराधी प्रवृत्तियों में फंसे लोग पैसा देकर नेताओं को जिताते थे, उन्हें लगा क्यों न हम खुद राजनीति में उतरें| परिणामस्वरूप भारी संख्या में अपराधी प्रवृत्ति के लोग विधानसभाओं और संसदों में चुनकर आने लगें। ताकत और पैसों के बल पर चुनाव लड़ा जाने लगा।

श्रीमती मृणाल गोरे जिन्हें महाराष्ट्र में पानी वाली बाई और बेलन वाली बाई के नाम से पुकारा जाता था जो आपातकाल के दौरान जेल में बन्द थी, आपातकाल के बाद जनता दल के टिकट पर लड़ी थी। भारी बहुमत से जीती थी| उन्होंने खुद चुनावी राजनीति में भाग लेना छोड़ दिया। मैंने जनसत्ता मुम्बई के लिए उनका इन्टरव्यू लिया था और ये सवाल पूछा था कि जिस मृणाल ताई को मुम्बई का बच्चा-बच्चा जानता है वे चुनावी राजनीति से क्यों सन्यास ले रही हैं। उनका जवाब था- राजनीति में अब केवल गुण्डे रह गए है। हमारे नेता दलाली करते है। भ्रष्ट हैं और मैं इस भ्रष्ट और अपराधिक प्रवृत्ति के नेताओं के साथ काम नहीं कर सकती। अरे, मैं क्या कोई भी महिला इनके साथ चुनावी राजनीति में नहीं उतर सकती। इससे अच्छा है समाज-सेवा करना।

इस तरह राजनीति अनीति की शरणस्थली बन गयी। जहाँ अपराध और कपट को संरक्षण और प्रश्रय मिलने लगा। राजनीति का अपराधीकरण लगभग विश्व के अन्य देशों में भी हुआ। आज सभी पार्टियों के नेता भ्रष्ट हैं। सभी साम्राज्यवादी देशों से जब डील करते है तो तगड़ा दलाली लेते हैं| इतना ही नहीं देश के भीतर भी व्यापारियों से किसी भी योजना को पास कराने के लिए दलाली लेते हैं। दलाल नेताओं के बीच देखा गया कि महिलाएँ भ्रष्ट नहीं होती (कुछ अपवाद हो सकते हैं)। दलाल सरकार, सांठ-गांठ, जोड़-तोड़, मंत्री पद के लिए खरीद-फरोख्त। उसके लिए गुण्डों का सहारा कभी-कभी माफिया तक का सहारा लिया जाता है। दारू-पीना -पिलाना। इन सबके बीच महिला नेता अपने-आप को असुरक्षित महसूस करती हैं। महिला विधायक पुरूष विधायकों से कम भ्रष्ट व अधिक कुशल होती हैं।

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हाल ही में जनरल ऑफ इकोनॉमिक विहेवियर एण्ड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकाशित एक शोध में यह सामने आया कि सरकार में ज्यादा महिलाओं का होना भ्रष्टाचार को सीमित करता है। 125 देशों में हुए इस शोध से पता चलता है कि जिन देशों की संसद में महिलाओं की संख्या ज्यादा है, वहाँ भ्रष्टाचार काफी कम पाया गया है। इस बात की पुष्टि भारत में होने वाले बड़े-बडे़ घोटालों में लिप्त महिलाओं की न्यूनतम संख्या देखकर भी होती है। भ्रष्टाचार में कम लिप्त होना भी महिलाओं को अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार साबित करता है। इस कारण उनका पूरा ध्यान अपने निजी आर्थिक हित साधने के बजाय अपने क्षेत्र के लोगों के विकास में अधिक लगता है।

महिलाओं की राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी इस भारतीय पितृसत्तात्मक सामंतवादी सोच के रहते मुश्किल ही है।

इसके बावजूद, आज भी राजनीतिक पार्टियाँ आधी आबादी को “चुनाव जिताऊ फैक्टर नहीं मानती।” आज भी हमारे देश की औरतों को यह कहते हुए सुना गया है कि पति जहाँ कहते है, हम वहीं वोट डाल देते है। स्त्रियों में राजनीतिक चेतना का अभाव देखा जा रहा है। राजनीति हमारे जीवन को प्रभावित करती है। यह मुख्य वजह है कि हम समाज में निर्णायक भूमिका में नहीं उतर पा रहे है। “अम्माजी”, “बहनजी” या “दीदीजी” ये सब सत्ता में आती है तब महिलाओं को उनके प्रश्नों को भूल जाती है। आज भी हमारे देश की मात्र 65.46 प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हैं। स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी सरकारी कागज-पत्रों में अँगूठे की निशानी लगाने का प्रावधान रहता है। यह देश के लिए शर्म का विषय है।

महिलाओं की राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी इस भारतीय पितृसत्तात्मक सामंतवादी सोच के रहते मुश्किल ही है। जब डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर के “हिन्दू कोड बिल” को इस देश के पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्यों ने पास होने नहीं दिया जिसमें उत्तराधिकार की बात कही गई थी, जो भारतीय सामंती पुरूष अपनी पुत्रियों को घर की संपत्ति में उत्तराधिकार नहीं दे सकता भला हम उस समाज के पुरूषों से ये आशा ही कैसे कर सकते है कि वे सत्ता में महिलाओं को आने देगें।

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इसलिए मुझे तो लगता है महिलाओं को खुद अपने लिए रास्ते बनाने होगें। जिस तरह सावित्रीबाई फूले ने जब लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो रास्ते में ऊँच्य जाति/वर्ग के पुरूष उन पर गोबर फेंकते, उनको गालियाँ देते, अभद्र व्यवहार करते, जब सावित्रीबाई ने ये बात ज्योतिबा फुले से कही तो उन्होंने कहा, एक और साड़ी रख लिया करें। ताकि गन्दी साड़ी को बदला जा सके। सावित्रीबाई ने वैसा ही किया पर एक दिन उन्होंने बड़े साहस के साथ उन पुरूषों का सामना किया, वे रूकी और एक आदमी को जोर का तमाचा जड़ दिया। वे नहीं जानती थी इसका परिणाम क्या होगा? पर परिणाम अच्छा निकला, दुसरे दिन से सारे पुरूषों ने उस रास्ते पर पर बैठना बन्द कर दिया और सावित्रीबाई की स्त्री-शिक्षा अभियान आगे बढ़ा। इसलिए आज हम सभी स्त्रियाँ पढ़ी-लिखी बन पाई, यहाँ तक पहुँच पाई वरन् मनु स्मृति ने साढ़े तीन हजार के इतिहास में स्त्रियों/दलितों की शिक्षा पर पाबन्दी लगा रखी थी। अगर सावित्रीबाई ने डरकर स्त्री-शिक्षा से पांव पीछे ले लिया होता तो आज भी हम साढ़े-तीन हजार पहले के भारत में जी रही होती। इसलिए राजनीति में सत्ता में आने के लिए भी हमें सावित्रीबाई के तरीकों को अपनाना पड़ेगा। एकजुटता दिखानी पड़ेगी।


यह लेख कुसुम त्रिपाठी ने लिखा है, जो इससे पहले स्त्रीकाल में प्रकाशित किया जा चुका है|

तस्वीर साभार: yourstory

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