‘तुम तो पहली की मृत्यु के पश्चात दसवें ही दिन दूसरी को ब्याह कर लाते हो| बताओ भी कि कौन से ईश्वर ने तुम्हें ऐसी सलाह दी है? जैसी स्त्री वैसा ही पुरुष! तुम में ऐसे कौन से गुण विद्यमान है, तुम कौन ऐसे शूर और जाबांज हो कि जिसकी वजह से परम पिता ने तुम्हें ऐसी स्वतंत्रता दी है?’

उन्नीसवीं सदी में किये गए इन सवालों के ज़रिए ताराबाई ने बेआवाज़ सी दिखने वाली भारतीय स्त्रियों के बोल को पहले स्वर दिए| सामाजिक माहौल में स्त्री की स्थिति और प्रचलित मान्याताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाती हुई, साल 1882 में मराठी में ताराबाई शिंदे ने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ लिखी थी| दुनिया भर की स्त्री जाति की वास्तविक स्थिति पर विचार विमर्श करने का आह्वाहन उन्होंने अपनी इस रचना में किया है|

नि:सन्तान विधवा ताराबाई शिंदे

ताराबाई शिंदे का जन्म मराठी कुनबी परिवार में हुआ था| उनके पिता हरि शिंदे, ज्योतिबा फुले के ब्राह्मण विरोधी आन्दोलन से जुड़े थे| परिवार में ही सामाजिक जागरण का माहौल था| उनका जीवन काल 19 वीं सदी का उतरार्द्ध था और वे 1905 के कुछ बाद तक जिंदा रहीं| उनके पिता बापूजी हरि शिंदे डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर में हेडक्लर्क थे| ताराबाई के पिताजी सत्य शोधक समाज के सदस्य थे| शिक्षित व एक सुधारक संस्था से जुड़े रहने की वजह से उन्होंने बेटी ताराबाई को शिक्षित किया| ताराबाई ने मराठी के साथ ही अंग्रेजी और संस्कृत का भी अध्ययन किया| ताराबाई नि:सन्तान विधवा थीं| उनका दूसरा विवाह नहीं हुआ क्योंकि ब्राह्मणों के प्रभाव से मराठों में भी विधवा विवाह का चलन उठ सा गया था|

पितृसत्ता के दोहरे मापदंड पर ताराबाई के तीखे सवाल

स्त्री-पुरुष समानता पर बल देते हुए ताराबाई ने अपने लेखन के ज़रिए यह चेतावनी दी कि स्त्री को आप दरकिनार नहीं रख सकते| उन्होंने लिंग भेद के आधार पर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में फ़र्क करने और दोहरे मापदंड बरतने के खिलाफ़ आवाज़ उठाई| वह बार-बार पूछती हैं कि ‘पुरुष अपने आप को स्त्रियों से इतना भिन्न क्यों समझता है? स्त्री की तुलना में वह खुद को इतना महान और बुद्धिमान क्यों मानता हैं? अगर वे इतने ही महान और हीरो थे तो अंग्रेजों के गुलाम कैसे बन गए? उनके बीच ऐसी क्या भिन्नता है कि पत्नी के मरने से पति पर कोई आफत नहीं आती वह जब चाहें दूसरा विवाह कर ले, पर पति के मरने से विधवा स्त्री को ऐसे-ऐसे दुःख दिए जाते हैं मानो उसी ने अपने पति को मारा हो? ये दोहरे मापदंड क्यों जबकि स्त्री-पुरुष की यौन इच्छाओं में कोई भेद नहीं| ऐसी विधवा होने से अच्छा तो सती होना है|’

बेआवाज़ स्त्री के पहले स्वर और ताराबाई

‘धर्माचार्यों ने शास्त्रों में सब नियम पुरुषों की सुख-सुविधा का ख्याल रखकर बनाये हैं| स्त्रियों की नहीं|’ पुरुष प्रधान संस्कृति में घर के चारदीवारी के भीतर बाहरी दुनिया से दूर पड़ी रहने वाली भारतीय नारी की दुर्दशा की ओर ताराबाई शिंदे इशारा करती है| पुरुष सत्ता की पैनी आलोचना तीखे शब्दों में वे करती हैं| स्त्री की स्वतंत्रता छीनने का अधिकार पुरुष के पास कैसे आया? वे समाज के सामने अपना सवाल उठाती हैं| पुरुष के अन्याय का यथार्थ रूप वे सामने लाती हैं| उनका सवाल है – ‘तुम ने अपने हाथों के सब धन दौलत रखकर नारी को कोठी में दासी बनाकर, धौंस जमाकर दुनिया से दूर रखा| उसपर अधिकार जमाया| नारी के सद्गुणों को दुर्लक्षित कर अपने ही सद्गुणों के दिये तुमने जलाये| नारी को विद्याप्राप्ति के अधिकार से वंचित कर दिया| उसके आने-जाने पर रोक लगा दी| जहां भी वह जाती थी, वहीं उसे उसके समान अज्ञानी स्त्रियाँ ही मिलती थीं| फिर दुनियादारी की समझ कहाँ से सीखती वह?’

तत्कालीन समाज में स्त्री के तनावग्रस्त जीवन यथार्थ को यहां वाणी मिली है| पुरुष सत्तात्मक समाज की स्त्री जो बेआवाज़ थी, ताराबाई के स्वर में वह बोल उठी| पुरुष वर्चस्ववाले समाज में स्त्री चेतना ने प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया| पुरुष द्वारा विधवा पर किये जानेवाले अत्याचारों के खिलाफ़ उन्होंने आवाज़ उठायी| तत्कालीन समाज में विधवा की दयनीय स्थिति की ओर ध्यान से सोचने के लिए उन्होंने लोगों को मजबूर किया| आक्रोश भरे स्वर में पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था को चुनौती देती हुई ताराबाई शिंदे ने पूछा कि ‘पत्नी के मरते ही दूसरा विवाह करने की आज़ादी यदि पुरुषों को है तो फिर कौन सी ताकत है जो विधवाओं को पुनर्विवाह करने से रोकती है?’

निरीह स्त्री की असहाय दशा को उजागर किया

पुरुष सत्ता के निर्मम दबाव में दम घुटनेवाली निरीह स्त्री की असहाय दशा की ओर ताराबाई ने ध्यान आकर्षित किया है| साथ ही पुरुष सत्ता की बदतमीज़ी पर नुकीले सवालों से चोट पहुंचाती है| ताराबाई शिंदे तत्कालीन धार्मिक कट्टरताओं और अनाचारों पर तीखा प्रहार करती हैं और धर्मान्धों के समाने सवाल खड़ा करती हैं| ‘जिस प्रकार तुम्हारे प्राण तुम्हें प्रिय है वैसे ही क्या स्त्री को उसके प्राण प्रिय नहीं रहेंगे? तुम्हारे प्राण सोने से बने और स्त्री के लोहे से बने हैं क्या? या फिर स्त्री को तुम पत्थर समझते हो, भावना हीन पत्थर! पति की मृत्यु के बाद उसकी स्थिति बदतर हो जाती है| उसका केशवपन किया जाता है| इस सृष्टि की सारी सुंदर चीज़ों से, सुख सुविधाओं से उसे वंचित किया जाता है| मंगलकार्यों में भाग लेने की उसे अनुमति नहीं होती| भले ही वह एक निरीह अबोध बालिका क्यों न हो, उस पर बंधन डाले जाते हैं| विधवा का किसी के समाने आना अपशगुन माना जाता है| क्या यह सब उचित है? पति की मृत्यु हुई, इसमें उसी की पत्नी का क्या दोष?’

‘वेश्यावृत्ति को पनपाती है पितृसत्ता’ – ताराबाई शिंदे

श्वेत साड़ी पहनने या केशमुंडन करने मात्र से विधवाओं के हृदय की भावनाएं खत्म नहीं होतीं| स्त्रियों के अंत:करण में पैठने की क्षमता पुरुषों में कहाँ है? समाज में वेश्या समस्या का मूल कारण पुरुषों द्वारा निर्मित वे नियम हैं जो स्त्री को गुलाम बनाकर रखती हैं| ‘तुम भी क्या कम हो? अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए तुम ने इन रूपवती प्रेमदाओ को ऐसी विप्प्नाव्स्था में ला छोड़ा है कि पूछो मत| पुनर्विवाह की मान्यता रहती तो इनकी ऐसी दुर्दशा कभी नहीं होती|’ समाज में वेश्यावृत्ति पुरुषों की वजह से ही पनपती है| पति का प्रेम मिलने पर स्त्री सुख और आनंद का अनुभव करती है| ऐसी स्थिति में वह अभावों की परवाह नहीं करती| किसी भी हालत में समाज में बेईज्जती का पात्र स्त्री ही बनती है| पराई स्त्री के पीछे घूमनेवाले लंपट पुरुष छाती तानकर खड़े होते हैं मानो ये सब उनके अपराधों सिद्ध करने की प्रवृत्ति की, उन्हीं के बनाये स्त्री धर्म की तीखी आलोचना करती हैं|

झूठे संयासी दरिंदों पर ताराबाई के व्यंग्यबाण

संयासी वेश धारण करके स्त्री की इज्जत लूटनेवाले कपट सन्यासियों को भी वे छोड़ती नहीं| झूठे संयासी ताराबाई के व्यंग्यबाणों कपटनीति दिखाई देती है| वह लिखती हैं – ‘बहुरूपिये बनकर तुम घूमते हो| कितने नाम दिये जायें तुम्हारे? गोसाई, साधु, वैरागी, दुग्धाहारी, मिताहारी, जटाधारी और न जाने कितने| संन्यासी का स्वांग रचते हो| बाबा कहलाकर लोगों को ठगते हो| तुम्हारा पंच पकवानों का उपभोग शुरू होता है| साथ ही साथ और करतूतें शुरू रहती है| दर्शन के आयी महिलाओं में से सुंदर नवयौवना नज़र में आती है| मन में ईश्वर की जगह उन सुन्दरियों का चिंतन बाबा करते हैं| काशी जाकर गंगा नहाने में अंतर्मन की पापवासना थोड़े ही जाती है| पूरे बगुला भगत हो तुम| मूंदी हुई आँखों में किसी स्त्री का ध्यान लगाकर तपस्या करनेवाले, भगवान् के समाने पड़े पैसे उठाकर रंडी के घर जानेवाले तुम कैसे संन्यासी?’

ताराबाई शिंदे की रचना ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ में स्त्रियों की गुलाम मानसिकता से मुक्ति दिलाने की प्रेरणा प्रदान करती है| ज़ोरदार सामाजिक क्रांति का संदेश इसमें है| नारीवादी सोच का यह पहला विस्फोट है|

सन्दर्भ

  1. ताराबाई शिंदे – स्त्री-पुरुष तुलना, संवाद प्रकाशन, 2002, पृ. 47
  2. वीर भारत तलवार (परिशिष्ट) – स्त्री-पुरुष तुलना, पृ.52
  3. डॉ के एम मालती – स्त्री विमर्श : भारतीय परिपेक्ष्य, पृ. 57

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