समाज का एक हिस्सा जो हमेशा से हाशिये के भी बाहर जीता आया है वह है देह-व्यापार से जुड़ा हुआ| किसी भी सभ्य समाज में इसे मुख्यधारा के भीतर रखे जाने का सवाल ही नहीं उठ सकता है| हम वर्तमान में सभ्यता के उस मुकाम पर पहुँच चुके हैं जहाँ अब इस सन्दर्भ में बातचीत करने की भी गुंजाइश नहीं बची हुई है| इस सभ्यता का एक दूसरा पहलू यह भी है कि आज देह सर्वाधिक बिकाऊ उत्पाद और देह व्यापार दुनिया का सबसे बड़ा बाजार चलाने का सबसे स्थायी धंधा है|

क्या हर समय में यह सभ्यता इतनी ही अंतर्विरोधी रही होगी! या यह व्यापार इसी तरह फल-फूल रहा होगा! क्या इसमें भी अन्य उद्योगों की तरह सबसे ज्यादा सेवा मुहैया करवाने वाले लेबर क्लास की स्थिति भी आम मजदूरों या उनसे भी गई-गुजरी नहीं है! जिस तरह पूंजीवादी आर्थिक संरचना किसानों को मजदूर में तब्दील करने में कामयाब रही है उसी तरह उसमें निर्मित होने वाली सभ्यता देह-व्यापार से अलग स्वतंत्र स्त्री समूहों को भी इस अंधे कुँए में धकेला है| भारत में बहुत पीछे से इस तरह के समूह मुख्य समाज का हिस्सा रहे हैं|

क्यों होती रही है ‘देह व्यापार की नकारात्मक ऐतिहासिक व्याख्या’

सवाल यह है कि ऐसे कौन से कारक रहे हैं जिस सन्दर्भ में इन समूहों की लगातार नकारात्मक ऐतिहासिक व्याख्या की गई| इसके साथ ही सीधे तौर पर खास वर्ग के मनोरंजन और दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिन स्त्री समूहों का निर्माण किया गया और जिसे एक अलग तरह की सामाजिक स्वीकृति भी दी गई; चाहे वो नगरवधुएं रही हों या गणिकाएँ या फिर बाद में देवदासियां, तवायफ़ और वेश्याएं इन सबको भी समाज में हेय क्यों माना गया! सबसे आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि ये वर्ग निरंतर उन समूहों को ही सेवा मुहैया कराने के लिए निर्मित किये गये या हुए जिसके हाथ में इतिहास-लेखन और समाज-निर्माण का भी काम था| इसका सबसे सीधा और सहज उत्तर है पितृसत्तात्मक सामाजिक और मुख्यधारा की धार्मिक संरचना और परिवार में पुरुष का वर्चस्व|

यह उत्तर निश्चित तौर पर सही है लेकिन इसके पीछे अधिक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक-राजनीतिक कारण भी थे| इस ऐतिहासिक कारण का सूत्र सत्ता के सांस्कृतिक वर्चस्व से भी जुड़ा हुआ था| पितृसत्ता और धार्मिक परिस्थितियाँ और कर्मकांड इस वर्चस्व को कायम करने के क्रमशः सबसे महत्त्वपूर्ण आधार और साधन थे| इसके साथ ही उच्च वर्ग के विशिष्टता-बोध की भी इस ऐतिहासिक-बोध की निर्मिति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है| इस विशिष्टता-बोध का व्यावहारिक कार्यान्वयन उस खास सुविधा और उपभोग के संसाधनों को आम जनता के लिए वर्जित बनाने के रूप में हुआ| इसके बाद उसे तरह-तरह के धार्मिक कर्मकांडों में बांधा गया| फिर उसे पूरी तरह खास वर्ग की संपत्ति बनाये रखने के लिए उसकी नकारात्मक व्याख्या की गई|

और सध गये एक तीर से दो निशाने

इस नकारात्मक व्याख्या से एक तीर से दो निशाने सधे| एक ओर तो उनके उपभोग के संसाधन खास से आम नहीं बने दूसरी ओर परम्परागत रूप से स्त्री के माथे पर हर सामाजिक बुराई का ठीकरा फोड़ने वाली पितृसत्ता को एक नया हथियार और उसे इस्तेमाल करने का प्रमाणिक अधिकार भी मिल गया|

पितृसत्ता के वर्चस्व ने मुख्यधारा से अलग रखा देह-व्यापार का मसला

अब सवाल यह है कि अगर सभ्यता के विकास और तथाकथित संस्कृति के निर्माण के साथ ही मनुष्य की सर्वाधिक आदिम आंकाक्षा और स्वाभाविक आवश्यकता को इस तरह वर्चस्व का हथियार नहीं बनाया गया होता, उसे खास वर्ग के उपभोग के लिए ही आरक्षित करने की राजनीति का शिकार नहीं बनाया गया होता और उसकी इस क्रम में नकारात्मक व्याख्या नहीं की गई होती तब हमारा समाज ‘यौनिकता’ को किस रूप में लेता! भारतीय समाज में सबसे वर्जित क्षेत्र है यौनिकता से जुड़ा हुआ| यह ऐसा विषय है जिस पर बातचीत करना सर्वाधिक आपत्तिजनक और लज्जास्पद है| इसे दोनों स्तरों पर देखा जा सकता है- चाहे वह सामाजिक व पारिवारिक दृष्टि से वैध सम्बन्ध हो या फिर अवैध या फिर सीधे देह-व्यापार का मामला हो|

वर्चस्व की पूरी संस्कृति ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैयक्तिक और सामाजिक मुद्दे को इस तरह परिभाषित किया कि उस पर बातचीत करना भी एक तरह से वर्जित मान लिया गया| यह एक बड़ा कारण है जो देह-व्यापार से जुड़े मसले का समाज की मुख्यधारा में किसी भी सहज-सार्थक विकल्प के हमेशा आड़े आता रहा है| अगर हमारी मानसिक संरचना में इस मुद्दे की ऐसी परंपरागत व्याख्या फिट नहीं की गई होती क्या तब भी हम देह-व्यापार के महत्वपूर्ण मुद्दे को इतना ही घृणित समझते! उससे जुड़े एक बड़े वर्ग को इसी रूप में लेते! या फिर जो तथाकथित सभ्यता द्वारा सामाजिक हित में इस वर्ग से दूरी बनाये रखने का एकमात्र विकल्प दिया गया उसे इसी रूप में चरितार्थ करते रहते!

स्त्री समूहों से मिलता रहा है कलात्मक अभिरुचियों को पोषण

समाज-सुधार के नाम पर जो वैकल्पिक व्यवस्था शासन-सत्ता द्वारा दी जाती है उसे भी इस परंपरागत मानसिकता के ढांचे से अलग नहीं किया जा सकता| इस एकमात्र विकल्प को भी हमारा तथाकथित सभ्य और सुसंस्कृत समाज स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है| इसके बावजूद यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सबसे बड़ा यथार्थ है कि जिसे सबसे निकृष्ट रूप में व्याख्यायित किया गया उसने इस ‘इनक्रेडिबल इण्डिया’ को बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है| भारत के सांस्कृतिक विकास का सबसे बड़ा सच यह भी है कि अधिकांश कलात्मक अभिरुचियों को स्त्री समूहों द्वारा ही सबसे ज्यादा पोषण मिला है|

चाहे राजा के निवास या हरम में अपने मनोरंजन या दैनिक आवश्यकताओं के लिए चित्र से लेकर प्रसाधन सामग्रियों का निर्माण रहा हो या फिर नगरवधुओं, देवदासियों और तवायफों द्वारा नृत्य और संगीत की परम्परा को संजोये रखना रहा हो| समय के साथ बदलने वाली सामाजिक संरचना के अनुसार इनका भी रूप बदलता गया| जाने-अनजाने आज जिस संस्कृति पर भारत इठलाता रहता है और जिसे तमाम तरह से विज्ञापित किया जाता रहा है

वह इन्हीं सबसे घृणित समझे जाने वाले वर्ग की देन है|इस पूरी व्यवस्था को दो तरह से समझने की जरुरत है| एक तो औपनिवेशिक भारत की सामाजिक संरचना और उसमें निर्मित होने वाली आदर्श व नैतिकता के स्तर पर दूसरे भारत के सामंती श्रेणीविन्यास और उसमें निर्मित होने वाली विभिन्न संस्थाओं के विशिष्टताबोध के क्रम में|

चुप्पी से लगातार बढ़ता जा रहा है देह-व्यापार

भारत के स्वतंत्र स्त्री समूहों को मात्र देह-व्यापार तक समेटने का काम निश्चित तौर पर विक्टोरियन नैतिकता से जुड़ा हुआ है लेकिन क्या यह अर्धसामंती और अर्धपूंजीवादी मानसिक ढांचे की भी तुष्टि से नहीं जुड़ा हुआ है! भारत की वर्तमान संरचना में ये दो मुख्य कारक हैं जो यौनिकता या देह-व्यापार पर खुल कर बातचीत का अवकाश ही नहीं देते हैं| इससे एक ओर तथाकथित श्रेष्ठ वर्गों और जातियों का विशिष्टताबोध जीवित रहता है वहीं दूसरी ओर बाज़ार के लिए एक ऐसा सहज-सुलभ माल उपलब्ध होता है जिसे सबसे ज्यादा बेंचा जा सकता है क्योंकि जो सबसे अधिक वर्जित होगा उसकी खपत सबसे ज्याद होगी|

हमारी राजनीतिक संरचना इन्हीं दो आधारों पर टिकी हुई है इसलिए इस स्तर पर जो भी प्रयास किये जाते हैं वह इन दोनों पक्षों की सुविधानुसार होता है| जहाँ एक ओर उस वर्जना का पालन वहीं दूसरी ओर उसके प्रति उपभोगवादी रवैया बनाये रखना| जहाँ उस पर सार्वजानिक बातचीत की बंदिश वहीं उसे ही सर्वाधिक बेचा जाना| ऐसी स्थिति में देह-व्यापार से जुड़ी स्त्रियों के मुख्यधारा में शामिल किये जाने के प्रयास हों या फिर यौनिकता पर सार्वजनिक बहस की दोनों पर तब तक कोई सार्थक पहल संभव नहीं है जब तक इन दोनों तरह की मानसिक संरचना को नहीं तोड़ा जाता है| एक ओर तो सामाजिक विशिष्टताबोध को धर्मगत, जातिगत और लिंगगत आधारों से अलग करने की जरुरत है वहीं दूसरी ओर इसे बाजार की विज्ञापनवादी प्रवृत्ति और उपभोगवादी सोच से बचाने की| यौनिकता को उपभोग के चश्मे से नहीं बल्कि मनुष्य की जैविक संरचना और उससे उपजी आदिम आकांक्षा के क्रम में व्याख्यायित करने की जरुरत है|

लैंगिक असमानता का एक पहलू इन दोनों आधारों से गहरे जुड़ा हुआ है| जब तक इन दोनों आधारों को नहीं तोड़ा जायेगा तब तक लैंगिक समानता भी दूर की ही कौड़ी बनी रहेगी| पूंजीवादी संरचना लैंगिक समानता का निर्ममता से दमन कर रही है| ऐसी स्थिति में देह-व्यापार का मुद्दा और अधिक बहसतलब हो उठता है| भारत जैसी सामाजिक संरचना में इस पर बहस के कई स्तर हैं और हो सकते हैं लेकिन उनकी मूल बुनावट इन्हीं दो किनारों से निर्मित होती है| ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ की वास्तविकता इन दोनों किनारों में बंधी है और जरुरत इसे तोड़ के इसके सम्पूर्ण विस्तार की है|

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