एकदिन मैं और मेरी सबसे अच्छी सहेली शिवानी एक पार्टी में जाने के लिए तैयार हो रहे थे| मैंने शिवानी से कहा – “हल्का मेकअप कर लो|||ये तुम्हारी ड्रेस के साथ ये सूट करेगा|” इसपर उसने तपाक से ज़वाब दिया – “ओह प्लीज! मैं और लड़कियों की तरह नहीं हूं|”

शिवानी का मानना था कि वो पढ़ने-लिखने वाली अच्छी लड़की है, जो वह वाकई थी भी पढ़ने-लिखने वाली पर उसके ‘अच्छी लड़की’ के क्या मानक थे ये मुझे नहीं पता| उसके अनुसार मेकअप करना या दूसरी चीज़ों पर ध्यान देना उसे ‘उस टाइप’ की लड़की बनता है| लड़कियों के लिए उसके कुछ बने-बनाये मानक थे, जिनके आधार पर वो लड़कियों को ‘उस टाइप’ या ‘इस टाइप’ का कहकर पुकारती थी| पर ‘उस टाइप’ या ‘इस टाइप’ कहने के उसके मानक क्या थे ये समझ पाना थोड़ा मुश्किल था|

मेरी तरह आपने भी शिवानी जैसी कई लड़कियों को देखा होगा जिनका नजरिया दूसरी लड़कियों के लिए वैसा नहीं होता जैसा उनका खुद के लिए होता है| वे अक्सर बेहद आसानी से दूसरी लड़कियों के लिए कह देती है कि

  • ‘मैं उस टाइप की लड़की नहीं हूं|’
  • ‘मेरी लड़कियों से ज्यादा बन नहीं पाती, वे ज्यादा बकवास करती हैं|’
  • ‘मैं टॉमबॉय हूं| मेरे सभी दोस्त लड़के हैं|’
  • ‘लड़कियों के पास सजने-संवरने के अलावा कोई बात नहीं होती|’
  • ‘लड़कियां भरोसे के लायक नहीं होती|’…वगैरह…वगैरह|

अगर ऐसी बातें कोई पुरुष लड़कियों के लिए करता तो शायद यह गलत मगर लाज़मी – सा व्यवहार लगता क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के लिए बनाये गये सांचे (जिनके अनुसार उन्हें ढाला जाता है) के आधार पर उनके अच्छे-बुरे होने का निर्णय किया जाता है, ऐसे में पुरुषों का महिलाओं के संदर्भ में ऐसी बातें करना आम लगता है| पर जब एक महिला दूसरी महिला के लिए ऐसी बातें करें, ऐसे विचार रखें तो यह एक गंभीर समस्या नज़र आने लगती है| सैद्धांतिक शब्दों में यह समस्या ‘समावेशी स्त्री-द्वेष’ कहलाती है|

समाजीकरण से मन में बोए जाते हैं समावेशी स्त्री-द्वेषके बीज

समावेशी स्त्री-द्वेष बचपन से समाजीकरण के ज़रिए जेंडर के तहत सिखाये गए व्यवहार और विचारों का नतीज़ा है – जहां अच्छी लड़कियां शादी से पहले न तो सेक्स पर बात कर सकती हैं और न सेक्स कर सकती है, अच्छी लड़कियाँ हमेशा ढके-तुपे कपड़े पहना करती हैं और अच्छी लड़कियां ज्यादा बोलती नहीं है, खासकर अपने अधिकारों या अपने से जुड़ी बातों के संदर्भ में|||वगैरह-वगैरह| इन सभी ‘अच्छी लड़कियों’ वाली दकियानूसी बातें अच्छे-बुरे के मानक बनकर लड़कियों के मन में बैठ जाती है जिसका सीधा प्रभाव उनके व्यवहार पर पड़ता है और अच्छे-बुरे के सांचे में खुद को ढलता देखकर वे आपस में ही प्रतिस्पर्धा का शिकार होने लगती है| उनका यह व्यवहार ‘समावेशी स्त्री द्वेष’ कहलाता है|

और चल पड़ता है औरत ही औरत की दुश्मनका जुमला

महिलाओं के बीच आपसी-द्वेष की वजह से ही औरत की ज़िंदगी, उसकी सोच और उसकी जीवन-प्रणाली से जुड़े बहुत-से मिथ प्रचलित होने लगते हैं| एक मिथ तो इतना अधिक बोलचाल में आ गया है कि वह करीब एक कहावत का रूप ले चुका है, जो कि निहायत ही गलत और भ्रामक वक्तव्य है – ‘औरत ही औरत की दुश्मन है|’ इसे पढ़ी-लिखी औरतें भी धड़ल्ले से माइक पर दोहराने से नहीं हिचकतीं| अगर कभी इस वक्तव्य के मूल का अनुसंधान या समाजशास्त्रीय शोध किया जाए तो इस अन्वेषण पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ब्रिटिश शासननुमा कूटनीति के तहत इस तरह के वक्तव्यों से औरतों को ‘डिवाइड एंड रुल’ की साजिश का शिकार बनाना ही किसी खुराफाती पुरुष के दिमाग की उपज रही होगी|

सवाल यह है कि क्या कभी आपने ‘पुरुष ही पुरुष का दुश्मन है’ जैसा कोई तयशुदा वक्तव्य सुना है? क्या सहकर्मी पुरुष ईर्ष्या-द्वेष और गला-काट प्रतिस्पर्धा के शिकार नहीं होते? क्या बाप-बेटे या भाई-भाई के बीच भीषण तकरार कभी-कभी मारपीट या खून-खराबे में तब्दील नहीं हो जाती? फिर एक-दूसरे की जड़ें काटने की यह तोहमत सिर्फ औरत पर क्यों?

साजिश औरतों को आपस में लड़ाने की

ज़ाहिर है कि यह तोहमत बिला वजह नहीं लगाई गई है| इस तथाकथित वक्तव्य को बार-बार दोहराने वाले इस वक्तव्य की प्रमाणिकता पर मोहर लगाने के लिए औरत के जिन संबंधों को सूली पर चढ़ाते हैं वह है – सास-बहु या ननद-भाभी का रिश्ता| इसके बारे में यह तर्क दिया जाता है कि वह औरत, जो की प्रताड़नाओं को भूलकर, हुक्मरा हो जाती है और घर आई एक नई लड़की के साथ ऐसा जालिमाना सलूक करने लगती है कि उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि औरत ही औरत की दुश्मन है|

इस सुलूक का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो यह तथ्य बहुत साफ़ समझ में आता है कि इस व्यवहार की वजह सास का औरत होना या बहु का उसकी हमजाति होना कतई नहीं है| यह सीधे-सीधे शोषक और शोषित का रिश्ता है| बरसों से दमित-दलित-प्रताड़ित एक औरत के हाथ जैसे ही सत्ता आती है, वह सत्ताधारी शोषक का प्रतिरूप बन जाती है| यह कुछ उसी प्रकार का रवैया है जिसमें दलितों के हक में लड़ने वाला एक दलित नेता सत्ता की कुर्सी पाते ही अपना दलित तबका भूल जाता है और सत्ताधारियों की ज़ुबान बोलने लगता है और उनके बीच उठने-बैठने में अपनी शान समझता है|

प्रसिद्ध बंगला कथाकार आशापूर्णा देवी की एक बेहद खूबसूरत कहानी है – ‘अनावृत्ता’ (जिस पर एनएफडीसी से एक फीचर फिल्म भी बन चुकी है) जिसमें एक औरत सारी ज़िन्दगी चुप रहकर अपने पति की हर बात मानती है, पर जब वह देखती है कि उसका अपना बेटा अपने बाप के साथ मिलकर घर छोड़कर चली गई उसकी बहु के खिलाफ़ मुकदमा दायर कर रहा है और उस साजिश में उसके पांच साल के पोते को भी शामिल कर रहा है तो वह अपनी स्थिति को पहचानती है और अपनी बहु के पक्ष में जा खड़ी होती है| उसका पति और बेटा कहता हैं कि इस उम्र में इस औरत का दिमाग खराब हो गया है, जो वह घर छोड़कर चली गई पराई लड़की की हिमायत कर रही है| पर वह अपने दृण निश्चय पर अटल रहती है| वह कहती है – ‘मैंने बहुत सोच-समझकर ही निर्णय लिया है| तुम दोनों के साथ तो कोर्ट-कचहरी है| पूरी दुनिया तुम्हारे साथ है उसके साथ तो सिर्फ मैं हूं|’

यह एक समझदार औरत का दूसरी औरत के हक में खड़ा होना है| ऐसे उदाहरण कहानियों में ही नहीं, ज़िन्दगी में भी सैकड़ों मिल जायेंगे|

समझना होगा कि औरत ही औरत की सच्ची हमदर्द होती है

समावेशी स्त्री-द्वेष के लिए महिलाओं में अपने रंग-रूप-बात-व्यवहार-योग्यता को लेकर गर्व या निराशा का भाव दोनों ही जिम्मेदार होते है| इस समस्या से निज़ात पाने के लिए सबसे पहले यह ज़रूरी है कि महिलाओं को आपस में एक-दूसरे को लेकर द्वेष की भावना को दूर करना होगा| लड़कियों को यह समझना होगा कि दूसरी लड़कियां किसी टाइप की होने बजाय एक-दूसरे से अलग अपने आप सी होती है| साथ ही, औरत ही औरत की सच्ची हमदर्द है – साथिन है, सहेली है, इसलिए औरतों को एकजुट हो कर रहना चाहिए| ‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ जैसे हाथों में थमाए हुए गलत झुनझुने को बजा-बजाकर औरतों को आपस में बांटने की गलती जानबूझकर सदियों से लगातार दोहरायी गई है| इसलिए अब यह जिम्मेदारी हम सभी महिलाओं की है कि हम इस जुमले को अपने शब्दकोश से बाहर निकाल दें, क्योंकि इस बदलाव की शुरुआत हमें खुद से करनी होगी| वरना पितृसत्ता यह कभी नहीं चाहती कि महिलाएं एक-दूसरे को लेकर अपनी उलझनों को दूर कर एकजुट हों|

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