Posted by Faraz Siddiqui

टीवी, अखबार या सोशल मीडिया के ज़रिए आपने कई बार एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) यानी कि लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीयर के बारे में सुना होगा| अगर आपको इनके बारे में कोई जानकारी नहीं है तो डरे नहीं| मैं सबसे पहले आपको इनके बारे में एक ज़रूरी बात बताना चाहूँगा कि ये किसी ख़ास जानवरों की प्रजाति नहीं है, बल्कि ये भी इंसान है हमारी-आपकी तरह| इनका भी जन्म उसी तरह होता जैसे एक आम इंसान का, उनकी परवरिश भी उसी तरह सामान्य तरीके से होती है जैसे हमारी-आपकी हुई है| पर किन्हीं शारीरिक बदलावों के चलते इन लोगों को ऐसे वर्ग के तौर पर जाना जाने लगता है जो आम इंसान से थोड़े अलग होते हैं| आज मैं आपसे इन्हीं में से एक वर्ग ‘क्वीयर’ के बारे में कुछ बातें साझा करने जा रहा हूँ|

समाज मानता है कि क्वीयर के मन में अपनी पहचान और शारीरिक चाहत पर को लेकर कई सारे सवाल  होते हैं|

समाज में ‘क्वीयर’ को परिभाषित करने के लिए कहा जाता है कि क्वीयर एक ऐसा इंसान है जो अपनी पहचान तय न कर पाए| यानी कि जो अपनी शारीरिक चाहत को भी पहचानने में असक्षम हो कि वो खुद आदमी है या औरत या ट्रांसजेंडर| या फिर ना लेस्बियन, गे या बाईसेक्सुअल| कई बार ‘क्वीयर’ के ‘Q’ को ‘क्वेश्चनिंग’ भी समझा जाता है यानी वो जिनके मन में अपनी पहचान और शारीरिक चाहत को लेकर कई सारे सवाल हैं| पर यह क्वीयर को परिभाषित करने के लिए कोई प्रमाणित परिभाषा नहीं है, इस परिभाषा को समाज ने रचा है जिसके तहत वो क्वीयर को ऐसे देखती और उनके साथ व्यवहार करती है कि वो कोई अजीब प्रजाति के इंसान हो और गलती से वो समाज में आ गये हो|

अपने आप में एक खूबसूरती है, क्योंकि आप समाज में स्थापित सिसजेंडर हैट्रोपैट्रिआरकी को ठेंगा दिखाकर अपने मूल जैविकी व लैंगिकता के साथ जीना शुरू कर देते है। पर अगर अस्तित्व के आधार पर यह सवाल किया जाए कि क्या एक क्वीयर के तौर पर समाज में खुलकर आना आसान है तो हमें इसका जवाब ‘ना’ में ही मिलता है।

‘नमाज अदा करने के लिए आपकी लैंगिकता से क्या संबंध है भला’

दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप को एक बड़ा सांस्कृतिक क्षेत्र माना जाता है| इसमें कई बातें मिलती-जुलती है जिनमें से एक है – धर्म की महत्ता। धर्म को समाज के संचालन की रीढ़ माना गया है| इसके संचालन का काम धर्म से जुड़े तमाम नियमों के आधार पर किया जाता है| ऐसे नियम जो हम सभी की  दिनचर्या से लेकर हमारे साथी चुनने तक की प्रक्रिया को भी संचालित करते हैं।

इस्लाम धर्म भी इनमें अपवाद नहीं है। ईसाई और इस्लाम दोनों ही धर्मों में समलैंगिकता प्रतिबंधित है| चूँकि मैं खुद एक ऐसे धर्म का हिस्सा हूँ जहाँ समलैंगिकता प्रतिबंधित है, ऐसे में मेरा मत अलग है| यों तो मैं खुद को नास्तिक कहता हूँ| पर वास्तविकता यह भी है कि कोई पूरी तरह नास्तिक या आस्तिक नहीं हो सकता है|

मेरे लिए बेहद मुश्किल हैं कि मैं अपनी अम्मा-बाउजी और अपने परिवार को बताऊँ कि मैं कौन हूँ..!

मैं अपने धर्म के तहत बस दिनचर्या से जुड़ी प्रक्रियाओं का पालन नहीं करता हूँ। मैं अगर यहाँ अपने अलावा किसी और समलैंगिक व्यक्तियों की बात करूं तो हो सकता उनके विचार कुछ अलग हो| जैसे शायद वे खुद को धर्म या ईश्वरीय डर की वजह से समलैंगिक मानने से ही इनकार कर दें और अपने स्वाभाविक गुण की बजाय अन्य लोगों की सामान्य जीवनशैली को अपने भी व्यवहार में लाने की कोशिश करते हैं| अगर यहाँ मैं तंजील (जो खुद को आस्तिक मानता है) का जिक्र करूँ तो वह यह कहता हैं कि ‘अल्लाह को भी प्यार की जरूरत हैं और नमाज़ अदा करने का आपकी लैंगिकता से क्या संबंध है भला।‘ वह इस बात पर भी विश्वास करता है कि अगर हमें बहुसंख्यक आबादी तक अपनी बात पहुंचानी है तो उसके लिए धर्म ज़रूरी हो जाता है और इस बात को नकारा नहीं जा सकता है|

मेरा मानना है कि किसी भी धर्म की आधुनिक रूप रेखा के लिए उसके समाज काल-परिवेश और सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य भी बराबर के जिम्मेदार होते हैं। जैसे कि जिन देशों में नब्बे के दशक में समलैंगिकता को मान्यता मिल गयी वहाँ जनता अब इन संबंधो के लिए सहज हैं| पर होमोफोबिया उन देश के समाजों में कम नही हैं। भारत कम से कम दक्षिण एशियाई देशो में इस्लामिक क्वीयर के मामले में बेहतर हैं।

जाहिर हैं यह मेरे लिए बेहद मुश्किल हैं कि मैं अपनी अम्मा-बाउजी और अपने परिवार को बताऊँ कि मैं कौन हूँ..! क्योंकि वे भी उसी समाज और कुफ़्र के डर में जीते हैं जहाँ इंसान कहलाने वाले शख्स को उनके गढ़े सांचे में ढलना होता है| एक दलित और आर्थिक तौर पर कमजोर मुसलमान के लिए अपनी इस सच्चाई से उन्हें रु-ब-रु करवाना एक डरावने ख्वाब जैसा है| यह समस्या तब और वीभत्स रूप ले लेती है जब इसका ताल्लुक महिलाओं से होता है| अपने समाज में एक सामान्य महिला का जीवन तमाम अपवादों और धार्मिक कुरीतियों का लगातार शिकार होता है, ऐसे में समलैंगिकता उनके जीवन की इन सभी परेशानियों को और भी भयावह रूप दे देता है|

धर्म से ज्यादा मानसिकता होती है जिम्मेदार

सिसजेंडर हैट्रोपैट्रिआरकी की ही देन हैं जिससे कि फेमिनिटी को हमारे समाज में बुरा माना जाता हैं। जैसे – गे लड़कों को या फेमीनाइन लड़को को ‘मेहरा’ बोला जाता है जो कि ‘मेहरारू’ यानी ‘जिनको मेहर दी जाये’ का पुरुष रूपांतरण हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि धर्म से अधिक आपकी मानसिकता जिम्मेदार होती हैं।

गर हम गुनहगार अल्लाह के हैं तो अल्लाह के बंदे हमारा इंसाफ क्यों करे?

मेरे कई दोस्त है, जो प्राउड गे है और मुस्लमान भी हैं| और उनके मुसलमान दोस्तों और उनके परिवार ने उन्हें अपनाया हुआ हैं। वे अपने कार्यक्षेत्र में सफल भी हैं और अभी तक अल्लाह ने उनपर कोई कुफ़्र नहीं अदा किया हैं। क्योंकि अगर अल्लाह ने,  ईश्वर ने,  भगवान ने ये दुनिया बनाई है तो स्वाभाविक है कि हमें किसी और ने नहीं भेजा होगा। अब सवाल यह है कि फिर क्यों लोग हममें  शैंतान को खोजते है| ऐसा करने वाले हर इंसान से मैं मंटो के शब्दों में कहना चाहूँगा “गर हम गुनहगार अल्लाह के हैं तो अल्लाह के बंदे हमारा इंसाफ क्यों करे? अल्लाह कि बनाई जेलों में हमारा इंसाफ हो| पर ये क्या अल्लाह ने नही जेल तो उसके बंदो ने बनाई हैं|” समाज का यह चेहरा हमारे सामने इंसानियत की एक ऐसी तस्वीर दिखाता है, जिसे देखने के बाद ऐसा लगता जैसे हम इंसान प्रेम को समझ पाने में शापित है| समाज में इंसान के लिए गढ़े सांचे की चंद खूबियों के आधार पर हर उस वर्ग का विरोध किया जाता है जो उनसे तनिक भी इतर है| उम्मीद है धर्म के साए में चलने वाले इस समाज में उनका ईश्वर एकदिन ज़रूर इंसाफ करेगा|

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Featured Image Credit: Darvesh Singh Yadvendra, organiser, Awadh Queer Pride Parade

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