हम सभी अपने जीवन में पहली बार स्कूल के ज़रिए ‘ड्रेस कोड’ सिस्टम से रु-ब-रु होते है| ‘ड्रेस कोड’ सिस्टम यानी कि जहाँ हम सभी एक अनुशासन के तहत एक-जैसे ड्रेस पहनते है| यह न केवल हमारे स्कूली जीवन के दौरान हममे समानता को कायम रखने और उसे सीखने की सीख देता है| बल्कि यह हमें दूसरों के सामने खुद को पेश करने का सलीका भी सिखाता है| ये तो बात हुई हमारे बचपन की जब हम सभी सीखने के दौर में होते है और अनुशासन के इन्हीं छोटे-छोटे पहलुओं के माध्यम से धीरे-धीरे हम सीखते है|

पर यह ज़रूरी नहीं है कि ‘ड्रेस कोड’ सिस्टम हर जगह, हर वक़्त या हर किसी के लिए सही हो वो भी तब जब इसपर कोई भी लिखित या अलिखित नीति-नियम घोषित न हो| कई बार इनका हवाला देकर कई तरीके से लोगों को दमन का शिकार भी बनाया जाता है| भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ आधी आबादी भी आधुनिकता के दौर में मर्दों के साथ कदम से कदम मिलाकर और कई मायनों में उनसे आगे बढ़कर चल रही है, ऐसे में कई बार सभ्यता, संस्कृति और समाज के नाम का इस्तेमाल करके आगे बढ़ती महिलाओं को रोकने की कोशिश की जाती है|

हाल ही में, अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने देश के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के साथ बर्लिन में अपनी मुलाक़ात की तस्वीरें ट्विटर में साझा की| इस मुलाकात में उन्होंने एक ऐसी ड्रेस पहन रखी थी जिसमें उनकी टाँगे दिखाई पड़ रही थी| पर प्रियंका को इस बात का तनिक भी अंदाज़ा नहीं था कि उनकी ये फ्रॉक उन्हें परेशानी में डाल सकती है। क्योंकि जब हिंदुस्तान के ट्विटर में ट्राल्स की नज़र प्रियंका की उस तस्वीर पर पड़ी तो उनलोगों ने प्रियंका को ‘संस्कार’ के नाम पर गंदी-भद्दी गालियाँ देनी शुरू कर दी|

प्रियंका की ट्विट को करीब अस्सी लाख लोगों ने ट्राल किया। ट्राल्स ने उन्हें गंदी और भद्दी गालियाँ तक दे डाली। लाखों की तादाद में एक साथ बर्लिन से जारी प्रियंका की तस्वीर पर ट्राल्स ने उनपर इस कदर निशाना साधना शुरू किया जिससे उनकी परंपरा और आधुनिकता के बीच दबी संकीर्ण सोच की तस्वीर साफ़ तौर पर उभर कर सामने आ गयी है|

कहाँ लिखा है पहनावे का नियम

सवाल यह है कि ‘संस्कार’ के लिहाज से प्रियंका के गलत पहनावे (जैसा कि समाज की मान्यता है) पर अगर इतनी आपत्ति प्रधानमन्त्री को खुद होती तो वे भला प्रियंका से क्यूँ मिलते| भारत के प्रधानमन्त्री से मिलने के लिए महिलाओं को किस तरह की ड्रेस पहननी चाहिए इसके लिए कोई नीति, नियम या प्रधानमन्त्री की तरफ से कोई कानून लागू नहीं किया गया है|

कई बार सभ्यता, संस्कृति और समाज के नाम का इस्तेमाल करके आगे बढ़ती महिलाओं को रोकने की कोशिश की जाती है|

उल्लेखनीय है कि हमारे संविधान में महिला या पुरुष के लिए किसी भी तरह के पहनावे का वर्णन नहीं किया गया है| इसके विपरीत, हमारा संविधान अपने नागरिकों को अपनी अभिव्यक्ति और अपने अनुसार ज़िन्दगी जीने का अधिकार देता है|

हक़ परंपरा और आधुनिकता के समर्थकों का…

ऐसी घटनाओं को देखने के बाद ऐसा लगता है कि आखिर इनलोगों को किसने ये अधिकार दिया कि वे किसी भी महिला को उसके पहनावे के आधार पर किसी भी तरह की टिप्पणी करें| ऐसे लोग तब कहाँ गुम हो जाते है जब बिकनी पहनकर रैंप पर देश को ‘विश्व सुंदरी’ जैसे सम्मान दिलाने वाली भारतीय महिलाएं विदेशों की जमीन पर अपने देश का प्रतिनिधित्व करती है| क्या उस वक़्त उन्हें अपने संस्कार याद नहीं आते|

हमारे संविधान में महिला या पुरुष के लिए किसी भी तरह के पहनावे का वर्णन नहीं किया गया है|

अगर देश में पुरुषों को महिलाओं को लेकर किसी भी तरह की आपत्ति है तो उसे हर दर्जे पर दर्ज करवाया जाना चाहिए|हमारे पितृसत्तात्मक समाज में परंपरा स्त्रियों की गुलामी की कहानी रही है, आधुनिकता ने पहली बार उससे मुक्ति की संभावनाएं या अवसर पैदा किये हैं| आज भारतीय समाज परंपरा और आधुनिकता के समर्थकों का युद्दस्थल बना हुआ है| समाज के इस संघर्ष में आज कई राजनीतिक आयाम भी हासिल कर लिए हैं| वरना आज महिलाओं को पुरुषों के हाथों मेंहदी लगवाने से लेकर हेयरकटिंग करवाने तक कोई एतराज़ नहीं होता है| ठीक उसी तरह मर्दों का कहा जाने वाला काम ड्राइविंग से लेकर चौकीदारी तक में महिलाओं की भागीदारी तक पुरुषों को कोई एतराज नहीं होता, बल्कि कई मायनों में इन क्षेत्रों में महिलाओं के आगे बढने पर सराहना की जाती है| ऐसे में सवाल यह है कि अगर आपत्ति है तो फिर उसे दोहरे मानकों के साथ दर्ज नहीं करवाना चाहिए जहाँ एक तरफ तो ‘वाह! वाह!’ किया जाता है वहीं दूसरी तरफ, ‘ना! ना!’ किया जाता है|

विचलित समर्थकों की क्या होगी भविष्य-दिशा?

पितृसत्ता में महिलाओं के दमन के लिए समाज की ऐसी पैतरेबाजीं देखकर सिमोन द बोउवार का कहना कि ‘लड़कियां होती नहीं बनाई जाती है’ (जिसके आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि लड़की की तरह ‘पुरुष भी होते नहीं बनाये जाते है|’) यानी कि जेंडर की अवधारणा बेहद सटीक लगती है जिसके तहत समाज में महिला और पुरुष के लिए बनाये गये दायरे को परिभाषित किया जाता है| आज महिलाएं सेना से लेकर चिकित्सा के क्षेत्र या यों कहें कि हर क्षेत्र में आगे है पर इसके बावजूद मर्दवादी संकुचित सोच उन्हें अपने अधीन करने की कोशिश करती है| देश में आज एक तरफ परंपरा के समर्थक हैं, जो समाज की प्रगति और उत्थान से विचलित होकर इस पर एकजुट हमला कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ न्याय, समता और लोकतंत्र के पक्षधर आधुनिकतावादी लोग हैं| देश को अपने भविष्य से बेहद उम्मीदें है पर सवाल यह है कि डिग्री से इतर व्यवहार और सोच में इतनी संकुचित और संकीर्ण सोच वाले नागरिक अपने देश को किस दिशा में लेकर जायेंगे|

ट्राल्स को करारा जवाब 

समाज की मर्यादा और नीति के बंधन पुरुष की अपेक्षा स्त्री पर अधिक चौकन्नी नज़र रखते हैं| पर अब स्त्रियाँ भी इन नज़रों को जवाब देने लगी है| प्रियंका ने ट्विटर पर ट्राल्स को अपने बेबाक अंदाज़ में ऐसा रचनात्मक जवाब दिया जो यह साफ़ तौर पर दर्शाता है कि महिलाएं अब हर मामले में पुरुषों से कहीं भी पीछे नहीं रहने वाली है फिर बात चाहे भले ही समाज की उस सड़ी-लिजलिजी और बदबूदार सोच को जवाब देने की क्यों न हो| प्रियंका ने अपनी माँ के साथ ऐसी तस्वीरें साझा की जिनमें उनकी टांगें दिखाई पड़ रही थी| साथ ही, उन्होंने लिखा कि ‘लेग्स फॉर डेज’| आज के दौर में लड़कियां सिर्फ ससुराल और समाज की बताई चारह्दीवारी तक सीमिति नहीं रहने वाली है बल्कि संग्राम में बिना घायल हुए अपने अस्तित्व को जमाए रखने की ओर मजबूती से साथ आगे बढ़ रही है|

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