रोकी कुमार

बचपन से ही मेरी बहन को सिखाया गया कि वो पराया धन है और जो भी कुछ है तेरे भाइयों का है। धीरे-धीरे मेरी बहन को भी ये लगने लगा कि सच में वो पराई है और शादी के बाद पति का घर ही उसका अपना घर होगा। बहुत धूमधाम के साथ मेरी बहन की शादी हुई और मन में अपने घर का सपना लिए वो अपने ससुराल चली गईं। पर दुर्भाग्यवश सपनों में उसने जिस घर की कल्पना की थी उसका ससुराल वाला घर वैसा नहीं था| उस घर का कोना भी बहन के हिस्से नहीं था| उनके हिस्से में जो था वो थी – हिंसा| शादी के बीस साल बाद भी उसके पास कहने मात्र को भी अपना घर नही है ना पति का घर और ना पिता का। बीस साल से हिंसा को झेलते-झेलते उसके चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी है, लेकिन उसके साथ हो रही हिंसा कभी कम नही हुई। चाहकर भी वो इस हिंसा से अलग नहीं हो पाई, क्योंकि उसके पास अपना कोई घर नहीं है। ये कहानी सिर्फ मेरी बहन कि नहीं है, बल्कि ऐसी लाखों महिलाओं की है जो चाहकर भी कभी हिंसा चक्र से निकल नहीं पाई। क्योंकि उनके पास सामाजिक रूप से सम्पति का कोई अधिकार नहीं है।

उस घर का कोना भी बहन के हिस्से नहीं था| उनके हिस्से में जो था वो थी – हिंसा|

बचपन से ही लड़की को ये पाठ पढ़ाया जाता है कि वो पराया धन है, जिस घर में उसने जन्म लिया, अपना बचपन बिताया है वो उसका नहीं है| वहीं दूसरी ओर, लड़कों को सिखाया जाता है कि वो ही इस घर के मालिक है। ये पाठ तब तक पढ़ाया जाता है जब तक की ये लड़की को अच्छे से याद न हो जाये।  धीरे-धीरे लड़की अपने आप को पराया धन समझने लगती है और लड़का अपने आपको मालिक समझने लगता है। ये सीख इतने गहरे से लड़का और लड़की के मन में बैठ जाती है कि इसकी झलक उनके व्यवहार में भी साफ़ दिखाई पड़ने लगती है। लड़कियों को ये सिखाया जाता है कि पति का घर ही उनका असली घर है। जब-जब महिलाओं के साथ हिंसा होती है तो पति उन्हें घर से निकल जाने की धमकी देता है तो ऐसी सूरत में महिलाओं के लिए एक बड़ा संकट है उनका अपना घर? कि ऐसी हालत में वो आखिर किस छत की पनाह लें। इसलिए हिंसा के चक्कर से निकल पाना उनके लिए नामुमकिन हो जाता है।

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सामाजिक रीति-रिवाज और मान्यताओं का असर कुछ इस तरह था कि ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956’ में तो पैतृक संपत्ति में बेटियों को किसी तरह का अधिकार दिया ही नहीं गया था। वे अपने परिवार (मायके) से सिर्फ गुजर-बसर का खर्च ही मांग सकती थीं। इससे यह भी पता चलता है यह लैंगिक असमानता बहुत दशकों तक ऐसी ही चलती रही। काफी संघर्ष के बाद हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून, 2005 बेटियों को भी अपने पिता की संपत्ति के अधिकार की बात की गई है ।

लैंगिक समानता घर तोड़ने का काम नहीं करती बल्कि एक विकसित देश बनाने का काम करती है।

क़ानूनी रूप से बराबर होने के बाद भी समाज के एक हिस्से को आज भी अपने भाई, पिता, पति और बेटे पर निर्भर होना पड़ रहा है। लैंगिक समानता का डर लिए आज भी पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं के लिए संपत्ति के अधिकार के बीच में रीति-रिवाज़ और मान्यताओ के नाम की अड़चनों से अटका रहा है।

लैंगिक समानता घर तोड़ने का काम नहीं करती बल्कि एक विकसित देश बनाने का काम करती है। बहुत जरूरी है कि हम महिलाओं को संपत्ति ना समझते हुए उनके लिए संपत्ति के अधिकार की बात करें। इसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी| हमें समझना होगा कि लड़कियों को हम बचपन से इस बात की घुट्टी पिलाते है कि वो पराया धन है और लड़की खुद को इंसान की बजाय उस धन की तरह देखने-जीने लग जाती है जिसका एक मालिक होगा – यानी कि उसका पति| यह कहीं न कहीं महिला को खुद के लिए खड़े होने पर हमेशा रोड़ा बनता है| इसके साथ ही, संपत्ति के नामपर लड़की के साथ होने वाले भेदभाव का सिर्फ एक आधार होता है कि वो लड़की है| फिर चाहे उसे बेटी समझा जाए या बहु| उसे कभी भी संपत्ति का अधिकारी माना ही जाता है क्योंकि उसका खुद का अस्तित्व किसी संपत्ति के रूप तक सीमित कर दिया गया है| ज़रूरत है इस बात पर गौर करने कि कानून चाहे कितने भी बदल जाए लेकिन समाज में बदलाव तब तक संभव नहीं है जब हम खुद इसकी शुरुआत न करें|


यह लेख रोकी कुमार ने लिखा है|

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