चरित्र या कैरेक्टर का नाम तो आपने ज़रूर सुना होगा? और इसके लिए आपके दिमाग में कुछ मानक भी होंगें, जिनके आधार पर आप किसी को ‘चरित्रवान’ या ‘चरित्रहीन’ कहते-समझते होंगें| भारतीय समाज में ‘कैरेक्टर’ एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल हमेशा एक लड़की को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए किया जाता है, जिसका नतीजा कई बार लड़कियों के लिए जानलेवा भी साबित होता है| मैंने भी अपने जीवन में इस शब्द के वार को झेला है, जिसकी कहानी मैं आपसे साझा करने जा रही हूँ|

उस वक़्त मैं आठवीं में पढ़ती थी और मेरे एग्जाम होने वाले थे| उनदिनों घर में दस से बारह मेहमान आये थे, जिससे पढ़ाई कर पाना मुश्किल हो रहा था| जब मैंने अपनी माँ (जो उस वक़्त दिल्ली थी) से इस बात को कहा तो मेरी मौसी (जो कि मेरे परिवार से बेहद जलती थी) ने खूब खरी-खोटी उन्होंने पिताजी जी कमाई से लेकर मेरे चरित्र तक पर सवाल खड़े कर दिए| उनका कहना था कि ‘पढ़ने वाले बच्चे कैसे भी पढ़ लेते है लेकिन जिनका कैरेक्टर ही खराब हो उनकी पढ़ाई कभी नहीं हो सकती| वो पहली बार था जब कैरेक्टर शब्द को मैंने अपने खिलाफ महसूस किया था, जिसका एहसास मेरे लिए एक गंदी गाली जैसा था| मैंने उन्हें कोई भी जवाब नहीं दिया और न घर में मौजूद लोगों किसी ने कुछ कहा| समय बीतता चला गया और दुर्भाग्यवश मौसी हमलोगों की पड़ोसी भी बन चुकी थी| उनका सिर्फ एक बेटा है, जिसपर उन्हें बचपन से बेहद गर्व रहा है| समय के साथ अपने बेटे पर उनका गुरूर बढ़ता गया| और पढ़ाई में आगे बढ़ती मैं उनकी नज़रों चुभने के साथ-साथ कैरेक्टरलेस होती गयी| घर के बाहर अगर किसी की बाईक खड़ी हो तो वो मेरे पेरेंट्स को फोन करके तुरंत शिकायत करती कि आपके घर लड़का आया है| पर अफ़सोस, उस वक़्त मेरे पैरेंट्स खुद घर पर मौजूद थे जिससे उनकी शिकायत निराधार सिद्ध हो गयी थी| एकबार माँ ने बताया कि जब मैं कक्षा नौ में थी तभी मेरी मौसी चाहती थी कि मेरी शादी कर दी जाये और वो अलग-अलग तरीके से मेरे पैरेंट्स और रिश्तेदारों को इसके लिए जोर देती| लेकिन जब उनकी दाल पेरेंट्स और रिश्तेदारों से नहीं गली तो उन्होंने मोहल्ले में ये प्रचार करने का काम शुरू किया कि मैं कैरेक्टरलेस हूँ|

‘पढ़ने वाले बच्चे कैसे भी पढ़ लेते है लेकिन जिनका कैरेक्टर ही खराब हो उनकी पढ़ाई कभी नहीं हो सकती|’

शुरूआत से ही उन्हें और उनके पति को मेरा लिखना-पढ़ना पसंद नहीं था| इस बीच जब हिंदी मीडियम से मैंने दसवीं और बारहवीं अच्छे नम्बरों से पास की तो उनका कहना था कि नक़ल करके मेरे नम्बर आये है| पर इसके बाद जब बीएचयू एंट्रेंस में मैंने टॉप टेन में जगह बनाई तो पढ़ाई के मुद्दे को छोड़कर उन्होंने मेरे कैरेक्टर पर सवाल खड़े शुरू कर दिए|

उनके इस रवैये से अब हमारे परिवार से उनका रिश्ता नामभर का है| कॉलोनी वालों ने भी धीरे-धीरे उन्हें दरकिनार करना शुरू कर दिया है| पर आज भी जब कोई नया शख्स उनसे मिलता है तो वे मेरे कैरेक्टर-लेस होने की बात ज़रूर कहती है| मैं उनकी नज़र में कैरेक्टरलेस हूँ क्योंकि –

‘लड़के मेरे दोस्त है|’

‘बड़े होने के साथ-साथ मैंने जवाब देना और विरोध करना शुरू कर दिया है, जिससे सालों से वो मुझे कुछ भी नहीं कह पायी है|’   

‘मैं अपने घर से बाहर लड़कों के साथ जाती हूँ, जिन्हें मेरे पैरेंट्स अच्छी तरह से जानते है|’

‘मेरा रंग सांवला है|’

‘मैं अपने पेरेंट्स की एकलौती बेटी हूँ|’

ये कुछ ऐसे पहलू है जिन्हें वे अक्सर केंद्रित करके मेरे कैरेक्टर पर सवाल खड़े किया करती है| यों तो इन सब बातों को बारह साल हो गये और ये सिलसिला आज भी ज़ारी है| शुरुआत में अक्सर उनकी ये बातें मुझे मानसिक तौर पर बेहद परेशान करती थी, जिसकी वजह से मैं ग्रेजुएशन के दौरान डिप्रेशन का शिकार भी हुई| पर वो कहते है न समय के साथ सब ठीक हो जाता है और मेरे साथ भी यही हुआ| उनकी बातों का असर कभी-भी मैंने अपने करियर पर नहीं पड़ने दिया और आगे बढ़ते गयी| अच्छा लगता है कि जिस पढ़ाई-लिखाई को रोककर उन्होंने और उनसे प्रभावित होकर कई रिश्तेदारों ने मेरी शादी का प्रस्ताव दिया था आज वही लेखन मेरी पहचान बन चुका है और अगर उनके अनुसार कैरेक्टरलेस होने के मानक ये है तो ‘मुझे गर्व है कि मैं कैरेक्टरलेस हूँ|’ क्योंकि वास्तव में चरित्र तो चरित्रहीन का ही होता है|

ये मेरे जीवन का सबसे कड़वा अनुभव है जो आज भी लगातार कायम है|

लेकिन इन सबके बावजूद आज भी जब कोई मेरे कैरेक्टर के खिलाफ उनकी बातें बताता है तो कुछ समय के लिए दिमाग सुन्न हो जाता है और समझ नहीं आता कि आखिर इनबातों पर क्या प्रतिक्रिया दी जाये?

मुझे अच्छी तरह मालूम है कि इस लेख को पढ़ने के बाद कोई कहे न कहें लेकिन घरवाले और मोहल्ले वाले ज़रूर कहेंगे कि ये तो घर की बात है इसे समाज में उछालने की क्या ज़रूरत थी? उन सभी के लिए मैं कहना चाहूंगी कि मेरे लिए ये घरवाली बात नहीं, क्योंकि इसने सालों से लेकर आज तक मुझे मानसिक तौर पर लगातार परेशान किया है और कहीं न कहीं सामाजिक तौर पर मेरी छवि को भी प्रभावित किया है| इतना ही नहीं, अगर कैरेक्टर के नामपर मेरे लिए कही इन बातों को मेरे घरवालों ने गंभीरता से लिया होता तो क्या पता मेरा भी बाल-विवाह हो गया होता!

ये मेरे जीवन का सबसे कड़वा अनुभव है जो आज भी लगातार कायम है| जिसतरह मैं तमाम विषय-मुद्दों पर लिखती हूँ ठीक उसी तरह अपने व्यक्तिगत अनुभव पर लिखना खुद की जिम्मेदारी मानती हूँ|

चरित्र तो चरित्रहीन का ही होता है|

इन सभी बातों पर मुझे दुःख से ज्यादा ताज्जुब होता है कि स्कूल से लेकर कॉलेज तक, लेखन से लेकर सामाजिक कार्य तक मैंने कभी-भी किसी को अपने लिए ऐसा नजरिया रखते नहीं देखा| फिर बात चाहे ‘सांवली रंगत की हो’ या ‘लड़कों से दोस्ती की|’ पर दुर्भाग्यवश जो कहीं देखने-सुनने को नहीं मिला उसे मैंने अपने घर-रिश्ते-नाते में पाया है| अक्सर सोचती हूँ कि पढ़ा-लिखा इंसान कैसे इतनी घटिया मानसिकता लंबे समय तक कायम रख सकता है? कई बार मन में यह सवाल आता है कि क्या उनका नजरिया मेरे लिए सिर्फ इसलिए ऐसा है क्योंकि मैं एक लड़की हूँ?

लड़कियों के सन्दर्भ में अक्सर कहा जाता है कि उन्हें हर जगह खुद को साबित करना होता है, क्योंकि समाज हमेशा लड़कियों के लिए दोहरी चुनौती की पेशकश करता है| अब सवाल यह है कि आखिर कब तक खुद को साबित करने का सिलसिला ज़ारी रहेगा? क्योंकि वास्तव में खुद को साबित करने से भी लोगों की सोच में कुछ ख़ास बदलवा नहीं आते है| खासकर उनलोगों की सोच जिनके दिल-दिमाग में सड़ी हुई पितृसत्तात्मक सोच अपनी जड़ें जमाए बैठी हो|

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1 COMMENT

  1. Nicely and bravely written by you. Thanks for sharing. बदलाव की शुरुआत अपने घर से ही होनी चाहिए ऐसा मेरा मानना है। आपने अपने जीवन की कुछ पहलुओं को सामने रखा जोकि सराहनीय है। इसी तरह हम सब स्वयं से इन मुद्दों पर अपने घर से ही बात करने की शुरुआत करें तो बदलाव की उम्मीदें और बढ़ सकती हैं।

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