कंचन सिंह चौहान बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। वे एक शायरा, कहानीकार और ब्लॉगर हैं। उनके भीतर एक पाठक और जहीन आलोचक भी सजग है। बीते कुछ सालों में आई उनकी कहानियाँ अपने यूनिक विषयों के चलते हमेशा पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचती रहीं हैं। प्रस्तुत है आप पाठकों के समक्ष मानवी वहाने की कंचन सिंह से ख़ास बातचीत के कुछ अंश –

मानवी : आपने लिखना कब शुरू किया और किन बातों से आपको लेखन की प्रेरणा मिली?

कंचन : कविताएँ तो मैंने बहुत कम उम्र से लिखनी शुरू कर दीं थीं| बल्कि कहनी शुरू कर दी थी| इतनी कम कि तब लिखना भी नहीं आता था। लेकिन मैं कोई भी रचना प्रकाशित करवाने के लिए नहीं भेजती थी, जो कुछ भी लिखती थी – अपनी डायरी में लिखती थी। मैं कविताएँ, कहानियाँ और संस्मरण वगैरह सब लिख – लिखकर कई डायरीज़ में ही रख लेती। फिर जब इंटरनेट आया और ऑर्कुट की शुरुआत हुई तो वहाँ मैंने अपना अकाउंट बनाया। उसी के ज़रिए मेरा परिचय राँची के मनीष कुमार जी से हुआ जो कि हिंदी के शुरुआती ब्लॉगर्स में से एक थे और उन्होंने मुझे इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि  मैं भी अपना एक ब्लॉग बनाऊँ। फिर उन्होंने ही मेरा ब्लॉग बना भी दिया जिसका नाम मैंने ‘हृदय गवाक्ष’ रखा क्योंकि मेरी ऐसी इच्छा थी कि अग़र कभी मेरी कविताओं की कोई किताब आए तो उसका शीर्षक मैं ‘हृदय गवाक्ष’ ही रखूँ। फिर ब्लॉग पर लिखते – लिखते ही प्रसिद्ध कहानीकार पंकज सुबीर जी से परिचय हुआ। वे अपने ब्लॉग पर ग़ज़ल का व्याकरण सिखा रहे थे। वहीं ग़ज़ल सीखते हुए ही रुझान साहित्य की तरफ हुआ और फिर धीरे-धीरे मैंने पत्र – पत्रिकाओं में भी रचनाएँ भेजना शुरू कर दिया| पहले कविताएँ – ग़ज़ल और फिर कहानियाँ प्रकाशित होने लगीं। अगर मुझे अपने लेखन के सफर का श्रेय देना हो तो मैं इंटरनेट को देना चाहूँगी। इस प्लेटफॉर्म पर मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला। इसके ज़रिए बहुत अच्छे लोगों, साथियों और पाठकों से मेरी मुलाकात हुई।

मानवी :  आपके प्रिय लेखक या लेखिकाएँ कौन हैं?

कंचन : सबसे पहले तो इस अपराधबोध का कन्फेशन करना चाहूँगी कि नौकरी, घर और स्वास्थ्य सबका तालमेल बैठाने के फेर में अब बहुत ज़्यादा पढ़ नहीं पाती हूँ मैं। फिर भी जिस क्रम में प्रिय साहित्यकारों को पसंद करती रही वह इसतरह का था कि जब युवावस्था में प्रवेश किया था तब ओज कविताओं की पसन्दगी के कारण दिनकर और सुभद्रा कुमारी चौहान पसन्द आते थे। फिर जब कुछ और बड़ी हुई तो महादेवी वर्मा का छायावादी प्रेम भी प्रिय लगने लगा।

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इसके आगे बढ़ी तो नीरज़ के गीतों और बशीर बद्र की ग़ज़लों की दीवानी हुई। फिर धीरे-धीरे जब काव्य के साथ-साथ गद्य विधा भी पढ़नी शुरू की, तब हरिवंश राय बच्चन, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, नरेंद्र कोहली और भगवतीचरण वर्मा को गड्ड-मड्ड पढ़ते हुए शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय और अमृता प्रीतम के लेखन से इश्क़ में पड़ गई। फिर चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, ममता कालिया, मन्नू भंडारी। शायद यह समय था जब स्त्री की लिखी स्त्री की कथा अनजाने में भाने लगी। मौजूदा लेखकों/लेखिकाओं में नब्बे फीसद लोगों को नहीं पढ़ा शायद। इसलिए अग्रिम क्षमा के साथ कहूँगी जिन साहित्यकारों को मैंने पढ़ा और पसन्द करती हूँ उनमें मुख्य नाम मनीषा कुलश्रेष्ठ, विवेक मिश्र, प्रियम्वद, किरण सिंह, ओमा शर्मा, पंकज सुबीर, वंदना राग, नीलाक्षी सिंह, सिनिवाली शर्मा और उपासना हैं। अभी बहुत सारे नाम छूट रहे हैं जो अचानक याद नहीं आ रहे और बहुत सारे वे भी जिन्हें पढ़ना बाकी है।

अगर मुझे अपने लेखन के सफर का श्रेय देना हो तो मैं इंटरनेट को देना चाहूँगी।

मानवी : आप अपनी कहानियों के किरदारों को कैसे रचती हैं?

कंचन : मेरी कहानियों के किरदार कभी मेरी कल्पना से बाहर निकलकर आते हैं तो कभी मेरी ज़िंदगी की आसपास की सच्चाइयों से। मेरी हमेशा यह कोशिश रहती है कि मेरी कहानी की जो नायिका है, वह हार नहीं माने बल्कि संघर्ष करे और जितना हो सके उतना लड़े, किसी भी हालात में जीतकर ही बाहर आए। लेकिन यह कोशिश हमेशा कामयाब नहीं होती। लिखते-लिखते जाने कब पात्र हमारे हाथ से निकलकर अपनी कथा ख़ुद लिखवाने लगते हैं।

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मानवी : क्या आपको कभी अपने लेखन के लिए आलोचना झेलनी पड़ी ?

कंचन : आलोचना सफलता की अनुगामी है मानवी। मुझे लगता है कि अभी मैं इतनी सफल नहीं हुई कि लोग मुझसे ईर्ष्या करें और फिर आलोचना। फिलहाल तो मेरे कानों तक नहीं आयीं आलोचनाएं। हाँ, मुझे मेरे लेखन के लिए सलाहें मिलती रहती हैं लेकिन वह सब अच्छी भावना से ही दी जाती हैं। मुझे किसी भी तरह की कठोर आलोचना या पक्षपात का शिकार नहीं होना पड़ा है।

मानवी :  क्या लेखन ने किसी भी तरह से आपके पोलियो सरवाइवर होने के सफर को प्रभावित किया ?

कंचन : मेरे लेखन और बीमारी में वैसे आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि जिस उम्र में बच्चे खेलते – कूदते हैं,  दौड़ते – भागते हैं,  उसी उम्र में जब यह सब नहीं हो सका तो वह एनर्जी दौड़ने – भागने के बजाय सोचने में गई। खुद से बात करना और फिर वह सारी बात डायरी में उतारना और शायद इसी तरह लेखन के प्रति रुझान हो गया।

लिखते-लिखते जाने कब पात्र हमारे हाथ से निकलकर अपनी कथा ख़ुद लिखवाने लगते हैं।

मानवी :  आपके मुताबिक हिंदी के फेमिनिस्ट लिटरेचर में कौन-से ऐसे विषय हैं जिनपर अब तक बात नहीं हुई है?

कंचन : देखो मानवी, एक बात मैं स्पष्ट करना चाहूँगी कि मैं खुद को किसी वाद में नहीं रखना चाहती। मुझे नहीं लगता कि मैं स्त्रीवादी या कोई भी वादी लेखिका हूँ। मैं वह लिखती हूँ या लिख रही हूँ जो समाज में देख रही हूँ| उसमें चूँकि स्त्री अब भी बहुत सारी जगहों पर उसी स्थिति में है जहाँ सालों पहले थी या फिर स्त्री को अभी भी बहुत बदलना है। पीढ़ियाँ बदल जाती हैं स्त्री की दशा नहीं बदलती, जो बात मैंने अपनी कहानी ‘बदजात’ में कहनी चाही है। इसलिए मेरी कहानियों की संख्या का अधिक फीसद स्त्री – कथा है। तो फिलहाल मैं कहानी लिख रही हूँ| कोई वाद नहीं और आगे भी ऐसा ही करना चाहती हूँ तो कहानी में वैसे तो पहले ही बहुत सारे विषयों पर लिखा जा रहा है, बहुत सारी नई-पुरानी समस्याओं पर मेरे वरिष्ठ और समकालीन कथाकार क़लम चला रहे हैं। फ़िर भी अग़र ऐसा कोई विषय है जिसपर आज तक नहीं लिखा गया, तो इस बात की शिकायत या चर्चा करने के बजाय कि इन विषयों पर कोई नहीं लिख रहा – मैं खुद ऐसे विषयों को एक्सप्लोर करके लिखना चाहूँगी।

कहानी तो एक क्लिक है जिसपर अलग-अलग इंसान में अलग-अलग विज़न उभरता है। मेरे वरिष्ठ और समकालीन कहानीकार अपनी क्लिक पर अपना विज़न लिख रहे। मुझे अपने हिस्से का काम करना है।


फ़ोटो साभार : सेतुमग

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