अलका वर्मा 

मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार मामले में पटना हाई कोर्ट में पीआईएल करने वाली और उसकी कानूनी पैरवी करने वाली एडवोकेट अलका वर्मा इस मामले में जाति और जेंडर के बहुत से सवाल उठा रही हैं| इसके पहले स्त्रीकाल के लिए सुशील मानव ने उनसे बातचीत की थी, जिसमें उन्होंने सरकार को कटघरे में खड़ा किया था| बीते  6 अगस्त को हाईकोर्ट दुबारा इस मामले को सुन रहा है| उसके पहले पढ़ें अलका वर्मा का यह नोट| इसे पढ़ आश्वस्त हो जायेंगे आप कि हाईकोर्ट में आपकी जुबान का प्रतिनधित्व समुचित और असरकारी है|

हमारी चुप्पी आने वाली पीढ़ी के लिए खतरनाक और प्रदूषित है

ये मामला उन बच्चियों को लेकर है जिनका कोई नहीं, देखने वाला कोई नहीं है। उनके लिए ही हमने ‘चाइल्ड वेलफेयर केयर’ (सीडबल्यूसी), ‘चाइल्ड प्रोटेक्शन विंग’ बनाकर रखा है। जिस सरकार के पास इतना कुछ है वह सीडब्ल्यूसी को अपने कब्जे में क्यों नहीं रखती है? सरकार एनजीओ को पैसा देकर शेल्टर होम क्यों चलाने को दे रही है? वह खुद क्यों नहीं चला रही अपने अधीन रखकर। एनजीओ के बीच ताबड़तोड़ होड़ मची रहती है फंड लेने के लिए। मुजरिमों की तरह तो वे बच्चियों को रखते हैं, जबकि कोई फैसिलिटी भी नहीं देते हैं।

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मैंने मुजफ्फरपुर मामले में जो मांग हाईकोर्ट से की है उसमें यह भी है कि बिहार से एक लीगल सर्विस अथॉरिटी खुद सुपरवाइज करे। क्योंकि बिहार स्टेट लीगल थॉरिटी के अधीन एक डिस्ट्रिक्ट लेवल सर्विस अथॉरिटी हर जिले में होती है, जिस जिले में भी होम होगा उस जिले के एसपी, डीएसपी भी उसके मेंबर होंगे तो होम डायरेक्टली एडमिनिस्ट्रेशन के तहत उनके हाथ में आ जाएगा। मेरा ये भी प्रेयर है कि बिहार लीगल अथॉरिटी सारे होम की सुपरवाइजरी बॉडी बन जाए और सुपरवाइज करे। बिहार में बिहार लीगल अथॉरिटी सुपरविजन करे और डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट लीगल अथॉरिटी सुपरविजन करे। डीएम और एसपी को सुपरविजन का काम दिया जाए। जहाँ पर डीएम और एसपी पहुँच रहे हैं सुपरविजन के लिए वहाँ पर मुझे नहीं लगता किसी की हिम्मत होगी कि कोई ऐसा काम करेगा। जब उन्हें पता हो कि डीएम और एसपी सुपरवाइज कर रहें हैं तो बृजेश ठाकुर जैसे लोगो की हिम्मत होगी किसी अनाथ बच्ची को छूने की

बहुत से लोग बहुत माडर्न बनते हैं रहन-सहन के स्तर पर। लेकिन विचारों में माडर्निटी नहीं लाते हैं।

बताइये लड़की को मार देते हैं जान से। बोन इंजरी कर देते हैं| लड़कियां अपना हाथ काट लेती हैं, सुसाइड करने के लिए। यह कितना दुखद है| यह राज्य के लिए शर्म की बात है। शर्म की बात है कि इतने लोग वहाँ इस्पेक्शन के लिए आते थे, वे भी इनवाल्व थे और बाकी के लोगो को खबर ही नहीं हुई। टाटा इंस्टीट्यूट के बच्चे थे, वे फ्रेश माइंड के थे तो उन्होंने इसको उजागर कर दिया। हम लोगो की संवेदना भोथर हो गई है। अगर हम लोग इसी तरह से चुप रहे तो हमारी आनेवाली पीढ़ी बेहद खतरनाक और प्रदूषित होगी।

खोखली आधुनिकता के समाज के सभ्य लोग

मेरे बैंक में पैसा आ गया| हमारी ज़रूरतें पूरी हो गई| हमारे बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ने लग गए| हमारी पर्सनल विश पूरी हो गई तो बस समाज से कट गए| बाकी के समाज से कोई मतलब ही नहीं है। माना कि आपकी ज़िंदग़ी बन गई पर आपके बच्चों को भी समाज में जीना है। समाज को सुंदर बनाइए इसीलिए ये आपकी अकाउंटिबिलिटी है, अगर समाज आपको कुछ दे रहा है तो गिव बैक टू सोसायटी। यह हमारा नैतिक कर्तव्य है।

अगर हम लोग इसी तरह से चुप रहे तो हमारी आनेवाली पीढ़ी बेहद खतरनाक और प्रदूषित होगी।

हम अपनी प्रतिक्रियाओं में भी सेलेक्टिव हैं। बहुत से लोग बहुत माडर्न बनते हैं रहन-सहन के स्तर पर। लेकिन विचारों में माडर्निटी नहीं लाते हैं। उसमें खुलापन नहीं लाते हैं। एक दायरे में सिमटे रहते हैं और विशेषकर दलित पिछड़ी जातियों, वंचित वर्ग और गरीबों के साथ में कुछ ऐसा होता है तो ये उनकी संवेदनाओं को झकझोरता नहीं है| आमजन की घटनाओं को वे मानते हैं कि ये आम बात है| इनके साथ तो ऐसा होता रहता है। लोगों की संवेदनाएं भोथर हो गई हैं। आप देखिए किसी दलित के साथ में कोई कांड होता है तो सोशल मीडिया के पेज पर ही देखिए, जो लोग बहुजन के प्रति संवेदनशील हैं, बहुत सहिष्णु हैं, वही लोग बोलते हैं, उनके साथ खड़े होते हैं| बाकी लोग चुप रहते हैं। जो सवर्ण लोग हैं, वैसे तो बीजेपी का विरोध करेंगे लेकिन इन मुद्दों पर एकदम हटे रहेंगे। ये जो कास्टिज्म वाली फीलिंग है, बैकवर्ड-फॉरवर्ड वाली फीलिंग है, वह जीवित रहता ही है उनके भीतर।

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सिविल सोसाइटी की बंद आँखों का नतीजा है मुजफ्फरपुर की घटना

मुजफ्फरपुर की बच्चियां निश्चित तौर पर शोषित वंचित गरीब और पिछड़े तबके की लड़कियाँ हैं| यह बात कोई न भी बताए तो समझ लेना चाहिए कि वे पिछड़ी जाति से और आर्थिक तथा सामाजिक गरीब हैं। हालांकि उनकी जाति को लेकर प्रमाण कुछ भी नहीं है, कम-से-कम मेरे पास उसका डेटा नहीं है। कुछ आयोगों का मानना है कि लड़कियां दलित, आदिवासी हैं तो उनेक अपराधियों पर एट्रोसिटी एक्ट भी लगाया जाना चाहिए। मुझे भी लगता है कि अगर उनके जाति-प्रमाण पत्र मिल जाएँ तो हम अपने पीआईएल में एक प्रार्थना और जोड़ देंगे। अभी मैं उसमें इनके पुनर्वास का प्रेयर जोड़ने वाली हूँ। प्रॉपर रिहैबिलिटेशन ऑफ गर्ल्स, प्रॉपर काउंसिलिंग बहुत ज़रूरी है-और इसके लिए प्रयास होगा अब मेरा|क्योंकि मैंने भी सुना है कि कुछ लड़कियाँ बहुत ही विचित्र व्यवहार कर रही थीं तो ज़रूरी है कि उनकी मनोवैज्ञानिक-काउंसिलिंग हो। उन लड़कियों को बहुत संवेदना की ज़रूरत है।

साथ ही, जरूरत है कि शेल्टर होम से एनजीओ के हाथ एकदम हटा दिए जायें। अब एनजीओ को शेल्टर होम न सौंपा जाए कभी। क्योंकि एनजीओ बहुत बंदरबांट करता है। गलत तरीके से फंड लेने के लिए समझौते करेगा| ब्रजेश ठाकुर के एनजीओ द्वारा चलाये जा रहे शेल्टर होम की कुछ रोज पहले जाँच हुई थी फिर नौ और कॉन्ट्रैक्ट मिले थे। यह बेहद अफसोसजनक है। उसके अख़बार का सर्कुलेशन मिनिमम था। लेकिन उसके पास सरकारी विज्ञापन लाखों लाख के आते थे। इसपर सवाल होने ही चाहिए। वह कई अधिकारियों, पत्रकारों के साथ दिल्ली जाता था, वे सब बिहार भवन में रुकते थे। अगर सिविल सोसायटी अपनी आँख बंद करके रखेगा तो यही होगा।

आख़िरी बात ये है कि कि हमें बच्चियों को न्याय मिलने तक लड़ना होगा| इस घटना को सबक के लिए एक उदाहरण बनाना होगा|


यह लेख इससे पहले स्त्रीकाल में प्रकाशित किया जा चुका है|

तस्वीर साभार : स्क्रोल 

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