भारत में शादी से पहले यौन संबंधों में तेज़ी दर्ज की गयी है और अध्ययनों से पता चलता है कि बहुत कम युवा नियमित तौर पर कंडोम या किसी अन्य गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे वे अनचाहे गर्भधारण का खतरा मोल लेते हैं| उदाहरण के तौर पर, हाल ही में कॉलेज के अविवाहित छात्रों पर किये गये एक अध्ययन से पता चला कि पहले से ही यौन रूप से सक्रिय युवकों की 8 से 12 फीसद युवतियों या उनकी महिला मित्रों ने कभी न कभी अनचाहा गर्भधारण किया था और इन सभी का गर्भ समापन कराया गया|

कई अध्ययनों से ये पता चलता है कि भारत में गर्भ समापन कराने की इच्छुक अविवाहित युवतियों के अनुभव विवाहित महिलाओं से अलग होते हैं| लेकिन इसके सबूत सीमित है| बिहार और झारखंड के प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों द्वारा संचालित क्लीनिकों में गर्भ समापन कराने वाली 15-24 साल की अविवाहित युवतियों के बीच एक अध्ययन किया गया था| साल 2007-08 में 14 महीनों के दौरान, गर्भ समापन कराने की इच्छुक 246 विवाहित और 549 अविवाहित युवतियों में अपनी मर्जी के बिना यौन संबंध बनाए जाने की संभावना कहीं ज्यादा थी| सिर्फ नौ फीसद विवाहित युवतियों की तुलना में कुल  25 फीसद अविवाहित युवतियों ने गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में गर्भ समापन करवाया था, जिसमें अविवाहितों ने गर्भधारण का कारण मर्जी के बिना यौन संबंध बनाया जाना और उनका अविवाहित होना कहीं ज्यादा बताया गया था|

लोक-लाज की संस्कृति में गर्भ समापन

यूँ तो बिन ब्याही माँ होने पर लोक-लाज के कारण गर्भ समापन करवाना या फिर नवजात बच्चे को कचरे के ढेर में फेंकना ये सब अपनी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है, जिसकी झलक हमें अपनी पौराणिक कथाओं में हम कुंती व अन्य महिला पात्रों के तौर पर देख सकते है| अब इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि पौराणिक कथाओं में समाज के दिखाए गये नजरिये का जीवंत स्वरुप आज भी हम देखते है, जिसके चलते अक्सर कभी महिला को असुरक्षित गर्भ समापन के चलते तो कभी बच्चे को कचरे में ढेर में जाकर अपनी जान गंवानी ही पड़ती है|

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वैसे गर्भ समापन महिला अधिकार का अहम मुद्दा है| लेकिन जब हम अध्ययन करते है तो अक्सर यह पाते है कि हर केस में यह ज़रूरी नहीं है कि महिला ने अपनी मर्जी से गर्भ समापन का फैसला लिया हो| कई बार सामाजिक रीतियों के नामपर भी वे गर्भ समापन करवाने के दबाव में आ जाती है और कई बार न चाहते हुए भी उन्हें गर्भ समापन करवाना पड़ता है|

कानून के बावजूद असुरक्षित गर्भ समापन की दर है ज्यादा

भारत में 1972 से गर्भ समापन क़ानूनी रूप से मौजूद है| लेकिन अध्ययनों से ये पता चलता है कि हर साल कराए जाने वाले करीब 60 से 70 लाख गर्भ समापनों में से केवल 10 लाख गर्भ समापन किसी पंजीकृत स्वास्थ्य केन्द्रों और प्रमाणित स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा करवाए जाते हैं, जिसके चलते कुल मातृ मृत्यु की घटनाओं में से 8 फीसद मामलों में मृत्यु का कारण असुरक्षित गर्भ समापन होता है| जाहिर है कि कानून होने के बावजूद हमारी पहुंच उस सुविधा तक बेहद सीमित है और इसका कारण है हमारा समाज|

डॉक्टर को जैसे ही यह पता चलता है कि गर्भ समापन करवाने आई लड़की शादीशुदा नहीं है तो उनका रवैया अचानक से बदल जाता है|

गर्भ समापन के ढ़ेरों राज खोलते अध्ययन

वहीं स्वास्थ्य सुविधा केंद्र आधारित अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भ समापन कराने की इच्छुक सभी महिलाओं में से 27 से 30 फीसद की उम्र 25 साल से कम थी और गर्भ समापन कराने के कारण भी अलग-अलग थे| अविवाहितों के लिए इसका मुख्य कारण, उनका विवाहित नहीं होना था (92 फीसद), जबरदस्ती यौन संबंध बनाये जाने के कारण गर्भधारण होना (11 फीसद) या उनकी आगे की पढ़ाई जारी रखने की चाहत (13 फीसद) थी| वहीं विवाहितों के मामले में इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उनकी उम्र बहुत कम थी या शादी के बाद वे बहुत ज़ल्दी गर्भवती हो गयी थी (51 फीसद), आर्थिक कारण (37 फीसद), अपनी शिक्षा पूरी करने की चाहत (33 फीसद) या यह कि उनके पति या उनके परिवार के सदस्य बच्चा नहीं चाहते थे (22 फीसद)|

स्वास्थ्य केंद्र के चयन का आधार – प्रसिद्धि और गोपनीयता की बात

स्वास्थ्य केंद्र के चयन के बारे में सबसे अधिक बताया गया कारण यह था कि उस स्वास्थ्य केंद्र की प्रसिद्धि| यह 66 फीसद अविवाहित और 71 फीसद विवाहित महिलाओं द्वारा बताया गया| हालांकि विवाहितों की तुलना में ज्यादा अविवाहित युवतियों (18 फीसद विवाहितों की तुलना में 66 फीसद) ने गोपनीयता के वादे को प्रमुख कारण बताया था|

गर्भ समापन महिला अधिकार का अहम मुद्दा है|

भारत में गर्भ समापन को विशेष परिस्थितियों में वैधानिक रूप से स्वीकार्य किया गया है| लेकिन इसके बावजूद असुरक्षित गर्भ समापन की दर में कोई विशेष कमी नहीं आई है| यूं तो इसके कई कारण है| पर जब हम इन कारणों का विश्लेष्ण करते है तो यही पाते है कि इनमें सामाजिक पृष्ठभूमि एक बड़ा कारण है| वहीं दूसरी तरफ, अध्ययन में अविवाहित युवतियों की बातों से पता चला कि गर्भावस्था के लक्षणों के बारे में वे काफी अनजान थी| ये भी अपने आप में एक गंभीर समस्या है| आज के आधुनिक दौर में जब अविवाहितों में शारीरिक संबंध का चलन बढ़ा है, वहीं उनमें जागरूकता का अभाव साफ़ देखने को मिलता है जो अक्सर युवाओं के शरीर और सामाजिक प्रस्थिति को प्रभावित करती है|

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गर्भ समापन की चुनौतियों में अहम डॉक्टर की भूमिका

साथ ही, प्रशिक्षित डॉक्टरों का अभाव भी एक अहम समस्या है| इसके अंतर्गत डॉक्टरों का व्यवहार और उनके इलाज का तरीका दोनों बेहद मायने रखता है| कई बार यह देखा गया है कि डॉक्टर को जैसे ही यह पता चलता है कि गर्भ समापन करवाने आई लड़की शादीशुदा नहीं है तो उनका रवैया अचानक से बदल जाता है| उनकी निगाहें लड़की को अपने मरीज की बजाय एक संदिग्ध अपराधी की देखना शुरू कर देती है| इतना ही नहीं, किसी भी केस में जब वे इस बात को भांप लेते हैं कि लड़की को समाज में लोक-लाज का दबाव ज्यादा है तो वहीं से उनके व्यापार की शुरुआत हो जाती है|

आखिर में इन तमाम विश्लेषण के आधार पर अगर हम ये कहें कि भारत में सुरक्षित गर्भ समापन आज भी एक बड़ी चुनौती है तो ये कहीं से भी गलत नहीं होगा| गौरतलब है कि ये कोई वक्तव्य की बजाय हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है जो सीधेतौर पर पितृसत्ता की महिला विरोधी संस्कृति का हिस्सा है और इसे बदलना बेहद ज़रूरी है| क्योंकि ये न केवल महिला के जीवन बल्कि समाज के भविष्य को भी सिरे से प्रभावित कर रही है|


यह लेख क्रिया संस्था के वार्षिक पत्रिका हिंदी रिप्रोडक्टिव हेल्थ मैटर्स से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

#AbortTheStigma सुरक्षित गर्भसमापन के बारे में बातचीत को सामान्य करने के लिए क्रिया द्वारा चलाया जा रहा एक अभियान है। गर्भसमापन से जुड़ा कलंक और शर्मिंदगी सुरक्षित और कानूनी सेवाओं तक पहुंच में बाधा डालती है। हम भारत में गर्भसमापन के सेवाओं के बारे में मिथकों और गलतफहमी को दूर करना चाहते हैं और सभी के लिए प्रजनन न्याय को संभव  बनाना चाहते हैं।

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तस्वीर साभार : globalwomenconnected

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