विनीता परमार

भादो महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषी पंचमी का व्रत किया जाता है। आज भी बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं। महिलाएं जब माहवारी में होती हैं तब अगर गलती से भी कभी मंदिर में चली जाती हैं, कहीं पूजा हो वहाँ चली जाती हैं या रसोई में चली जाती हैं तो मान्यता ये है कि ये पाप होता है और इसका दोष लगता है। ऐसे में ऋषि पंचमी व्रत को इस पाप का काट बताया जाता  है| अगर किसी औरत ने गलती से भी माहवारी के दौरान अपने घर के किसी आदमी का भोजन पानी छू दिया है तो उन्हें मुक्ति मिलेगी।

धर्म-ग्रंथों की मूर्खतापूर्ण मान्यता है कि रजस्वला (माहवारी के दौरान) औरत अपवित्र होती हैं। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। अगर यह शुद्ध मन से कभी भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी। इस अटल सौभाग्य की कामना में भादों शुक्ल पक्ष की तृतीया को महिलाओं ने हरितालिका तीज का निर्जला व्रत किया तो फिर चतुर्थी की पूजा और पंचमी को राजस्वला होने के बाद पापों से मुक्त होने के लिये ऋषि पंचमी व्रत करेंगी।  इसमें औरत को 108 बार चीरचीड़ी के दातुन से मुँह धोना, 108 लोटे पानी से नहाने और पसही धान का चावल खाने जैसे नियम है ।

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जब मैंने पहली बार इस व्रत पर नज़र दौड़ाया तो फिर प्रकृति का संरक्षण नज़र आया। चीरचीड़ी का पौधा औषधीय गुण से भरा हुआ होता है जिससे माहवारी की अनियमितायें दूर होती है। साथ-ही-साथ इस व्रत में हल से जोतकर ऊगनेवाले अनाज को खाना मना है। वहीं पसही धान अपने आप उग जाता है जो अब भारत के खत्म होनेवाले अनाज की किस्म है। इस व्रत में सप्तऋषियों की पूजा होती है। यानि पूर्ण प्रकृति पूजा| मुझे इस व्रत के तरीके से कोई ऐतराज नहीं| लेकिन इसकी नियत यानी जो सोचकर यह व्रत बनाया गया उसपर गहरी आपत्ति है।

माहवारी के दौरान कोई भी औरत खाना नहीं बना सकती और  ना ही वो किसी दूसरे आदमी के खाने व पानी को छू सकती है। क्योंकि  ऐसा माना जाता है कि माहवारी के दौरान महिलायें अशुद्ध हो जाती है। इसलिए अगर वे खाना-पानी को हाथ लगाती है तो इससे खाने का अपमान होता है। इस प्रक्रिया के दौरान महिलाओं को ना तो पूजा-पाठ करने की अनुमति नहीं है| यहाँ तक कि उन्हें मंदिर के पास तक नहीं जाने दिया जाता। आज पढ़ी-लिखी महिलायें भी अपने लालन-पालन और जड़ों की वजह से पूजा नहीं कर पाती। जानबूझकर कर बनाये गये इस तरह के नियमों में महिलाएं पिसती रहती है बस।

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अब इसे संयोग कहें या विडंबना कि हमारे देश में पीरियड को लेकर जानकारी से ज्यादा भ्रांतियों का फैलाव है| इस दौरान खानपान और साफ़-सफाई में किन बातों का ध्यान रखना है इसके बारे बात हो या न हो, लेकिन इस दौरान कौन-कौन से काम नहीं करने हैं इसका पाठ हमें बखूबी पढ़ाया जाता है|  इन पाबंदियों को देखने पर ऐसा महसूस होता है जैसे कि माहवारी महिलाओं किस तरह धर्म-रिवाज के नामपर अछूत बना दिया गया है । लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि और आधार में इसका कोई जवाब नहीं है| बस ये एक ऐसी परम्परा है जो सदियों से लगातार चली आ रही है। महिलाएँ भी इस तरह की सोच के साथ आने वाली पीढ़ी को इस तरह की सीख देती हैं, जिससे शिक्षा और अशिक्षा का कोई मायने नहीं रह जाता है।

ज़रूरी है कि समाज में बारीकी से फैले इन मजबूत पहलुओं को प्रभावी ढंग से उजागर कर इनकी तार्किकता पर बात हो| समाज में फैले माहवारी से जुड़े अनेक मिथक हैं और उनका मूल कारण स्त्री का शरीर और उनमें होने वाली एक सहज घटना है, पर आशा की किरण यहाँ दिखाई देती है कि इस टैबू को खत्म करने के प्रयास में स्त्रियाँ अब अपनी आवाज उठा रही हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे ट्विटर,फेसबुकइंस्टाग्राम पर लेख, तस्वीरों एवं विचारों के माध्यम से इस रूढ़ि को खत्म करने की एक जागरूक मुहिम की लहर-सी दिखाई देती है। मासिकधर्म से जुड़ी रूढ़ियों को पूरी तरह से खत्म करने का सपना तभी साकार किया जा सकता है, जब हर इंसान इस समस्या को जड़ से मिटाने की जिम्मेदारी ले।


यह लेख विनीता परमार ने लिखा है, जो इससे पहले स्त्रीकाल में प्रकाशित किया जा चुका है|

तस्वीर साभार : gajabkhabar

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