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दुनियाभर में अब इस बात को माना जाने लगा है कि मौजूदा सामुदायिक स्वास्थ्य नीतियाँ और कार्यक्रम अक्सर एचआईवी बाधित लोगों के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अधिकारों, ज़रूरतों और इच्छाओं की पूर्ति करने में दिक्कत पैदा है| इसीलिए इन दिक्कतों को रोकने के लिए तुरंत कार्यवाई किये जाने की ज़रूरत है|

हालांकि एचआईवी बाधित महिलाओं और पुरुषों के यौन व प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अधिकार, ज़रूरतों और इच्छाएं एचआईवी मुक्त पुरुषों और महिलाओं से बहुत मिलती-जुलती हैं फिर भी इन लोगों में कुछ प्रमुख शारीरिक और सामाजिक अंतरों पर ख़ास ध्यान दिए जाने की ज़रूरत होती है| उदाहरण के लिए एचआईवी के अधिक प्रसार वाले क्षेत्रों में वहां के जनसंख्या समूहों में किन्हीं ख़ास मेडिकल समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशीलता को देखते हुए यह संभव है कि वहां इन समस्याओं को हल किये जाने को अधिक प्राथमिकता दी जाए| इसके अलावा, एचआईवी को कलंकित मानने के सामाजिक व्यवहार को देखते हुए यह भी ज़रूरी हो जाता है कि संक्रमण से बाधित लोगों की गोपनीयता बनाये रखने के विषय पर अधिक ध्यान दिया जाए| स्वास्थ्य सेवाओं व कार्यक्रमों से एचआईवी बाधित लोगों की आकाँक्षाओं और इच्छाओं को जान लेना ज़रूरी है, जिससे इनकी ख़ास ज़रूरतों के अनुसार कार्यक्रम तैयार किये जा सकें और सेवाएं प्रदान की जा सकें|

एचआईवी के प्रति मानवाधिकार का दृष्टिकोण

अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों की संरचना के अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रीय सरकारें ऐसे नियम, नीतियाँ और व्यवस्थाएं तैयार करें जिनसे कि एचआईवी बाधित महिलाओं और पुरुषों से अपने यौन व प्रजनन स्वास्थ्य की ज़रुरतों और इच्छाओं को पूरा कर पाने में मदद मिले| राज्यों का यह क़ानूनी दायित्व है कि वे एचआईवी बाधित लोगों के मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और सुरक्षित रखने के लिए काम करें| इनमें इन लोगों के यौन व प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अधिकार भी शामिल हैं| एचआईवी और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त काम करने के लिए मानवाधिकारों पर ध्यान देने से अनेक सुअवसर उत्पन्न होने के साथ-साथ कई दायित्व भी खड़े हो जाते हैं| एचआईवी के प्रति मानवाधिकारों के दृष्टिकोण में यह व्यवस्था की गयी है कि नीतियाँ और कार्यक्रम बनाते समय और उन्हें लागू करते समय प्रभावित समुदायों को इस काम में जोड़ा जाए और उनके साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया जाए|

मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं अर्थात सभी पर समान रूप से लागू होते हैं|

अब ऐसा माना जाता है कि यही सिद्धांत न केवल एचआईवी बाधित लोगों बल्कि पूरी जनसंख्या के व्यापक स्वास्थ्य लक्ष्यों को पूरा करने में भी सहायक होते है| समय के साथ-साथ इस बारे में साक्ष्य और अधिक पुष्ट हुए हैं कि अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण से एचआईवी और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य, दोनों ही क्षेत्रों में काम करने में सहायता मिलती है| इसी तरह अनेक अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों और कार्यक्रम दिशा-निर्देशों में भी यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और एचआईवी बाधित लोगों के जीवन से जुड़ी वैधानिक ज़रूरतों की पूर्ति होती दिखाई दे रही है| फिर भी यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और एचआईवी के क्षेत्र में, विशेष रूप से एचआईवी बाधित लोगों की ज़रूरतों और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य के उनके विशिष्ट अधिकारों की दिशा में प्रयासों को एक साथ लाने वाली अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक नीतियाँ अब भी बहुत कम देखने को मिलती हैं और ऐसी नीतियों का बनाया जाना अपेक्षाकृत एक नई घटना है|

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मानवाधिकार की संरचना में यौन व प्रजनन स्वास्थ्य

अन्तर्राष्ट्रीय कानून की परिभाषा के अनुसार यौन व प्रजनन स्वास्थ्य के विषय को मुख्य रूप से मानवाधिकारों की संरचना के अंतर्गत उठाया जाता है और इससे जुड़े समाधान दिए जाते हैं| मानवाधिकारों का ख़ास ध्यान राज्य के उत्तरदायित्वों पर होता है, लेकिन यौनिकता और यौन स्वास्थ्य ऐसे विषय हैं जिन्हें पर्याप्त रूप से सुरक्षा नहीं मिल पाती| प्रजनन कार्यों के अतिरिक्त यौन गतिविधियां करते हुए संतोषजनक यौन जीवन जीने की ज़रूरत को पहचानते हुए राज्य के उत्तरदायित्व की सीमाएं निर्धारित नहीं की जाती हैं| प्रजनन कर पाने का अधिकार, यौन व प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकारों का केवल एक भाग मात्र है और इससे इस पूरी व्यापक परिभाषा के अंतर्गत आने वाले हर तरह के व्यवहारों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल पाती| अन्तर्राष्ट्रीय वैधानिक परिभाषाओं के अंतर्गत यौन स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए समर्थक वातावरण बनाने के राज्य के उत्तरदायित्व को परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे कि एचआईवी बाधित लोगों और पूरे जनसंख्या समूहों का यौन स्वास्थ्य नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है|

राज्यों का यह क़ानूनी दायित्व है कि वे एचआईवी बाधित लोगों के मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और सुरक्षित रखने के लिए काम करें|

एचआईवी बाधित लोगों के लिए मानवाधिकार के अहम बिंदु

मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं अर्थात सभी पर समान रूप से लागू होते हैं और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य की ज़रूरतों और इच्छाएं भी एचआईवी बाधित व दूसरे लोगों में एक समान ही होती हैं| फिर भी एचआईवी बाधित महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों, ज़रूरतों और इच्छाओं से जुड़े कुछ ऐसे सिद्धांत भी हैं जिनपर विशेष ध्यान दिए जाने की ज़रूरत होती है| मानवाधिकारों के मानकों और इस तरह के दृष्टिकोण की प्रभावशीलता के आधार पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत इस तरह से हैं –

  •  एचआईवी बाधित व्यक्ति अपनी यौनिकता और प्रजननशीलता के संबंध में बिना किसी डर के स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पाने में सक्षम हों|
  •  एचआईवी बाधित वयस्कों और युवा लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से सटीक जानकारी, परामर्श और सेवाएं मिलनी चाहिए जो उनकी यौन व प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी ख़ास ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक हों|
  •  एचआईवी बाधित लोगों के साथ पूरी गोपनीयता बरती जानी चाहिए और हर तरह की सेवाएं देने से पहले उनकी सहमति ली जानी चाहिए|
  •  जहाँ तक संभव हो, एचआईवी बाधित पुरुषों और महिलाओं को यह अवसर मिलना चाहिए कि वे अपनी यौनिकता, प्रजनन स्वास्थ्य और बच्चों की देखभाल से जुड़े फैसलों में अपने साथियों को भी शामिल कर सकें|

स्वास्थ्य अनुसंधान और नीतियों से जुड़े साहित्य में हाल ही के कुछ सालों में एचआईवी बाधित लोगों की यौन व प्रजनन स्वास्थ्य की चिंताओं को पहचाना जाने लगा है|

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मानवाधिकारों के अंतर्गत एक वैधानिक संरचना की व्यवस्था है जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय कानून, नीतियों और सेवाओं को लागू किया जा सकता है और इनका आकलन किया जा सकता है| इस व्यवस्था में नीतियों और कार्यक्रमों की रुपरेखा भी तैयार की जा सकती है| एचआईवी बाधित लोगों की यौन व प्रजनन अधिकारों के प्रति स्पष्ट अन्तर्राष्ट्रीय समर्पण की भावना न होने से लगातार चुनौतीपूर्ण हालात बने रहते है| अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों में एचआईवी की स्थिति के आधार पर भेदभाव किये जाने की अनुमति नहीं दी जाती| इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एचआईवी बाधित लोग भी एचआईवी संक्रमण से मुक्त लोगों की तरह ही समान अधिकारों का लाभ उठा सकें और सभी लोगों को अपनी यौन व प्रजनन ज़रूरतों और इच्छाओं की पूरा करने का समान अवसर मिले|

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की क़ानूनी और नीतिगत संधियों में स्पष्ट रूप से देशों की सरकारों को यह निर्देश दिए गये हैं कि वे बिना कोई भेदभाव किये किशोरों और वयस्कों के लिए पर्याप्त और गुणकारी सेवाएं और जानकारियाँ उपलब्ध कराएं| सरकारों का यह दायित्व है कि वे सुनिश्चित करें कि किसी भी कानून, नीति या व्यवहार के अंतर्गत लोगों की जाति, रंग, लिंग, राष्ट्रीय या सामाजिक परिपेक्ष्य या अन्य किसी स्थिति के आधार पर लोगों को यौन व प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं और जानकारी मिल पाने में भेदभाव न बरता जाए| अन्य किसी स्थिति में एचआईवी संक्रमण की स्थिति भी शामिल है|


यह लेख क्रिया संस्था की वार्षिक पत्रिका एचआईवी/एड्स और मानवाधिकार : एक विमर्श (अंक 4, 2009) से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

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तस्वीर साभार : Keith Haring Foundation

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