‘तुमलोग इस शब्द के पीछे क्यों पड़े हो? कभी प्यार को समझने की कोशिश किया करो, यह एक खूबसूरत शब्द है| ये डायलाग अलीगढ़ फिल्म का है और शायद पहली बार किसी ने प्यार को समझने की बात इतने सादे शब्दों में की है| वरना बॉलीवुड में प्यार की बातों के साथ तो चांद-तारे तोड़ने जैसी बातों का जिक्र आम रहा है|

14 फरवरी यानी कि प्यार का दिन| ये हर शख्स के लिए खास होता है और जिस दिन सभी साहस जुटाकर अपने प्यार का इजहार करते है, शर्मीले लोग भी इस दिन अपनी झिझक भुलाकर प्यार का इजहार कर देते है| अब इतना सब पढ़कर आपके दिमाग में जरूर एक लड़का-ल़ड़की की छवि उभरी होगी और अक्सर प्रेम कहानियां भी तो ऐसी ही होती है, जहाँ हम लैला-मजनू, हीर-रांझा, शिरी-फरहाद, मिर्जा-साहिब की कहानी याद करते हैं, जिसके तहत हम प्यार को लड़का-लड़की तक सीमित करके देखते है| लेकिन क्या कभी आपने इसके विपरित सोचकर देखा है? यकीन के साथ कहती हूं कि नहीं सोचा होगा और सच कहूँ तो इसमें आपकी गलती भी तो नहीं है| क्योंकि हम जैसा देखते है, वैसा सोचते है, वैसा बनते है और वैसा ही गढ़ते है| खैर प्यार के संदर्भ में लड़का-लड़की ही सोचना आम है क्योंकि हमारे यहाँ तो प्रेम कहानियाँ ही लड़का-लड़की वाली गायी जाती है| पर इसका मतलब ये नहीं कि प्यार का दायरा सिर्फ यहीं तक है, वास्तविकता ये है कि प्यार की कहानी लड़का-लड़की तक सीमित सिर्फ इसलिए है क्योंकि समलैंगिक प्रेम कहानियाँ आज भी अंधेरे बक्से में बंद है|

प्यार के संदर्भ में लड़का-लड़की ही सोचना आम है क्योंकि हमारे यहाँ तो प्रेम कहानियाँ ही लड़का-लड़की वाली गायी जाती है|

जब मैं छोटी थी तो मुझे भी सफेद घोड़े वाले राजकुमार के बारे में ही बताया गया था| मुझे कभी बताया ही नहीं गया कि प्यार तो किसी से भी हो सकता है क्यों इसे भी धर्म व जाति की तरह बांट दिया गया और तय करा गया कि समलैंगिकता वो अभिशाप है जिसमे पैदा हुए लोगों को इसे हमेशा छुपना होगा| वे सामान्य नहीं है, बल्कि अछूत है, जिनसे दुर्गंध आती है, जो समाज में रहने वाले प्राणियों को नुक्सान पहुंचा सकता है|

अलीगढ़ फिल्म के डायलाग का जिक्र तो मैने शुरूआत में किया| लेकिन समलैंगिकता पर बॉलीवुड में बनी फिल्में बेहद सीमित है| इतनी कि आप अपनी ऊंगलियों पर गिन सकते है| वो फिल्में भी इस विषय से पूरे तरह से न्याय नहीं करती बल्कि समलैंगिकता का मजाक उड़ाती ही दिखती है|

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ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय लोग जब एक लड़का और ल़ड़की को किस करते हुए नहीं देख सकते तो लड़की-ल़ड़की व लड़का-लड़का को कैसे देखेंगे? जब मैंने अपनी दोस्त से इन सबका जिक्र किया तो उसने मुझे बहुत अच्छा उदाहरण दिया| उसका कहना था कि हम जब टीवी पर कोई विज्ञारन देखते है तो उसमें भी हम बचते है कि किसी गे कपल या किसी लेस्बियन कपल को दिखाने पर| अगर ऐसे में बॉलीवुड, जिसे हम कला का केंद्र समझते है, जब वहां हम समलैंगिकता के मुद्दे पर खुलकर बातचीत के बजाय भद्दे मज़ाक को देखते हैं तो ऐसे में अब क्या ही कल्पना की जाये समाज से? वो समाज जिसके चलन और संस्कृति की दिशा बॉलीवुड के बदलावों से प्रभावित होती है| हमारे संविधान से साल 2018 में धारा 377 को हटा दिया गया|

हम जैसा देखते है, वैसा सोचते है, वैसा बनते है और वैसा ही गढ़ते है|

गौरतलब है कि यह वो कानून था जो समलैंगिकता को कानूनी रूप से अवैध घोषित करता था| लेकिन अब अगर हम समाज की बात करें तो वहां सबसे ज्यादा असंवेदनशीलता देखने को मिलती है और वहीं काम करने की सबसे ज्यादा जरूरत है| हमारी शिक्षा व्यवस्था की ही बात करें तो हम देखते है कि हम स्कूल में समलैंगिकता से जुड़े विषय के बारे में जिक्र ही नहीं करते| हम नए-नए उपकरणों की बात करते है, लेकिन बच्चों को इसके बारें में अवगत कराना व उन्हें संवेदनशील बनाने के बारे में बिल्कुल नहीं सोचते और घर पर तो वो सीख ही नहीं पाते कि उनके पास भी कोई विक्लप ही नहीं बचता है| पर समलैंगिकता से जुड़ा कोई भी इंसान हमेशा डरता है क्योंकि उसे समाज से हमेशा भद्दे शब्द ही सुनने को मिलते है|

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हमें स्कूल व शिक्षा व्यव्स्था को ठीक करना होगा और समलैंगिकता पर बात करनी होगी| डाक्टर व काउंस्लर की व्यवस्था करनी होगी तभी बच्चों को हम जरूरी मुद्दों की जानकारी दे पाएंगे| गे व लेस्बियन के मौलिक अधिकारों के अलावा सामाजिक लड़ाई अभी बाकी है क्योंकि बड़े शहरों में तो फिर भी बात धीरे-धीरे ही सही पर शुरू हुई है| लेकिन यह बातचीत गांवो में अब तक नहीं पहुंच पाई है|


तस्वीर साभार : jutarnji.hr

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