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औरतों को चुप कराने का नया चलन ये है कि उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दे दो या उन्हें बलात्कार कर देने के मैसेज से इतना डरा दो कि वह लिखना-बोलना ही छोड़ दे| मर्दों को ग्रुप में मस्ती करते हुए तो आपने भी देखा होगा और आपको उनका पसंदीदा चुटकुला भी याद होगा कि – ‘दो औरतें चुप थी’ , ऐसा बोलते ही सब ठहाका मार कर हंसने लगते है|

आज की सच्चाई यह है कि पत्रकारों ने जब हाल ही के पुलवामा हमले पर बोला तो असहमति जाहिर करने के चक्कर में लोगों ने महिला-विरोधी गालियां लिखनी शुरू कर दी| वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार जो एक पुरूष है, लेकिन उन्हें जो गालियां दी गई वो उनके घर की महिलाओं पर थी और इतना ही नहीं उनमें बलात्कार जैसे मैसेज भी भेंजे गए| इतना ही नहीं, इस घटना के बाद करीब हर गाँव-शहर-कस्बे में पाकिस्तान के खिलाफ़ प्रदर्शन किया गया, जिनमें से कुछ प्रदर्शन में भारत माता की जय के साथ पाकिस्तान के लिए महिला-केंद्रित गालियों के नारे लगाये गये|

अब अगर इतिहास की बात करें तो जब से औरतों ने किसी भी मुद्दे पर बोलना शुरू किया, तभी से उनको चुप कराने के लिए समाज ने अपना चलन शुरू किया| इसी तर्ज पर, आज की डिजिटल दुनिया भी इससे अछूती नहीं रही| यहाँ कभी धर्म के ठेकेदार तो कभी समाज के तथाकथित कर्ता-धर्ता औरतों को चुप कराने गाहे-बगाहे आ ही जाते है| कमाल की बात तो ये है कि असहमति, विवाद या झगड़ा किसी का किसी से भी हो लेकिन इनकी गालियाँ हमेशा महिला-केंद्रित ही होती है|

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हर क्रिया के प्रति होने वाले प्रतिक्रिया के तहत महिला-केंद्रित गालियाँ देना, साफ़तौर पर समाज की पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाता है, जिसके तहत महिला को न केवल नीचा दिखाया जाता है बल्कि उसके लिए गालियाँ इस्तेमाल करना उसकी पहचान जैसा बताया जाता है| साथ ही, ये यह भी बखूबी दर्शाती है कि पितृसत्तामक समाज में बोलने का अधिकार सिर्फ पुरुषों के पास है|

जब से औरतों ने किसी भी मुद्दे पर बोलना शुरू किया, तभी से उनको चुप कराने के लिए समाज ने अपना चलन शुरू किया|

अब सवाल ये है कि वो समाज जो महिला के मूर्तिरूप को देवी की संज्ञा देकर पूजता है, उसके नामपर पंडाल सजाता है और तमाम व्रत रखता है| वही समाज दूसरी तरफ महिला के जीवंत रूप को न केवल कमतर आंकता है बल्कि उसपर केंद्रित गालियों से अपने गुस्से को जाहिर करता है, आख़िर इस दोहरे चरित्र की मूल वजह क्या है? जब भी इस सवाल के जवाब को तलाशने की कोशिश करती हूँ तो यही जवाब मिलता है कि – पितृसत्ता को हर वक़्त अपनी सत्ता को खो देने का डर लगा रहता है| उन्हें हर उस आवाज़ से दिक्कत होती है जो उनकी आवाज़ को चुनौती देती है या फिर उनके विचारों पर अपनी असहमति दर्ज करती है| सरल भाषा में कहूँ तो पितृसत्तात्मक समाज को पढ़ती-लिखती-आगे बढ़ती-बोलती-सुनती और सवाल करती लड़की कभी नहीं भाती है|

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इसी सोच के चलते आज हमारे समाज में राजनीतिक हस्ती, फिल्मी अदाकाराएं, महिला पत्रकार से लेकर आम महिला भी सोशल मीडिया से लेकर सड़कों-घरों तक हिंसा झेल रही है| गौरी लंकेश की हत्या के बाद उन्हें गालियां दी गई, प्रियंका चोपड़ा को कपड़े पर हिदायतें दी गई और राना अय्यूब को तो जान से मारने की धमकी भी मिल चुकी है| महिलाएं हर तरह  की हिंसा को झेल रही है|

पितृसत्तात्मक समाज को पढ़ती-लिखती-आगे बढ़ती-बोलती-सुनती और सवाल करती लड़की कभी नहीं भाती है|

सवाल ये आता है कि इस तरह की हिंसा को ठीक कैसे किया जा सकता है? सच कहूँ तो इसका जवाब देना बेहद मुश्किल है क्योंकि इस समस्या की मूल जड़ हमारी सामाजिक व्यवस्था में है| इसलिए सामाजिक व्यवस्था में बदलाव लाना एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसे बदलने के लिए पहले कदम है इस सोच पर या यों कहूँ कि इस व्यवस्था पर सवाल करने का सिलसिला यूं ही ज़ारी रखना होगा|

बाकी महिला-केंद्रित गालियाँ या उनके अंगों पर टिप्पणी करने वालों के लिए यही कहूंगी कि ‘महिला के अंगो पर टिप्पणी करना, बेशक आपको तथाकथित ‘मर्द’ बनाती हो, पर एक इंसान कतई नहीं बनाती| मैं ये नहीं कहती कि विरोध या मतभेद दर्ज करना बुरा है, बल्कि बुरा है किसी भी जेंडर पर केंद्रित कर गालियों का इस्तेमाल करना| अब चूँकि ये पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था इसलिए ये बोलती औरत के डरती है, तभी तो महिला-केंद्रित गालियाँ बोलती है…!


यह लेख जगीशा अरोरा ने लिखा है|तस्वीर साभार : newindianexpress

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