हम जब कभी-भी महिला-पुरुष समानता या महिला अधिकारों से संबंधित मुद्दों का विश्लेषण करते हैं तो उनमें कुछ ऐसे शब्दों या अवधारणाओं का जिक्र होता हैं जिनको समझे बिना हम इन समस्याओं को नहीं समझ सकते हैं| इन्हीं में से एक है – पितृसत्ता| इसका जिक्र हमें किसी भी महिला विषयक मुद्दों में आसानी से मिल सकता है पर वास्तव में यह है क्या…? आइये जाने –

महिला आंदोलन और दुनियाभर में उससे उपजे नारीवादी विमर्श का एक अहम पहलू, विश्लेषण के लिए ऐसे उपकरणों और सिद्धांतों की खोज रहा है जिसके ज़रिए सामान्य तौर पर जेंडर विभेदीकरण को और खासकर महिलाओं के अधीनीकरण को समझा जा सके| नारीवादी विमर्श का करीब पहला काम यही था कि महिलाओं को अधीन करने वाली जटिल संरचना को पहचाना जाए और उसे एक उचित नाम दिया जाए| इस तरह, बींसवी सदी के आठवें दशक के बीच से नारीवादी विशेषज्ञों ने पितृसत्ता शब्द का इस्तेमाल और उसे परिभाषित करना शुरू किया|

क्या है पितृसत्ता?

पितृसत्ता जिसके ज़रिए अब संस्थाओं के एक खास समूह को पहचाना जाता है, को “सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं|” गर्डा लर्नर के अनुसार पितृसत्ता “परिवार में महिलाओं और बच्चों पर पुरुषों के वर्चस्व की अभिव्यक्ति-संस्थागतकरण और सामान्य रूप से महिलाओं पर पुरुषों के सामाजिक वर्चस्व का विस्तार है|” वह यह भी कहती हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाएं पूरी तरह शक्तिहीन हैं या पूरी तरह अधिकारों, प्रभाव और संसाधनों से वंचित हैं| इस व्यवस्था की ख़ास बात इसकी विचारधारा है जिसके तहत यह विचार प्रभावी रहता है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए| इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है|

‘पितृसत्ता’ शब्द का मतलब

पितृसत्ता अंग्रेजी शब्द पैट्रियार्की का हिंदी अनुवाद है| अंग्रेजी में यह शब्द दो यूनानी शब्दों पैटर और आर्के को मिलाकर बना है| पैटर का मतलब है – पिता और आर्के का मतलब है  – शासन| यानी कि ‘पिता का शासन|’ पीटर लेसलेट ने अपनी किताब ‘द वर्ल्ड वी लॉस्ट’ में औद्योगिकीकरण से पहले के इंग्लैण्ड के समाज की परिवार-व्यवस्था की पहली ख़ासियत उसका पितृसत्तात्मक होना बताया है| भारत में इस तरह की परिवार-व्यवस्था (संयुक्त परिवार) आज़ादी के बाद काफी सालों तक बनी रही|

पितृसत्ता की ख़ास बात इसकी विचारधारा है जिसके तहत यह विचार प्रभावी रहता है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए|

पितृसत्ता का भौतिक आधार

पितृसत्ता एक व्यवस्था के रूप में किस तरह से काम करती है इस बात को समझने के लिए इसकी विचारधारा को अहम माना गया है| विचारधारा के तौर पर पितृसत्ता की व्यवस्था का मुख्य पहलू महिलाओं में सहमति पैदा करता है| इसके तहत महिलाएं पितृसत्ता को बनाये रखने में मदद करती हैं, क्योंकि समाजीकरण के ज़रिए वो खुद पुरुष वर्चस्व को आत्मसात करके उसके प्रति अपनी सहमति देती है|

उनकी इस सहमति को कई तरीकों से हासिल किया जाता है – जैसे उत्पादक संसाधनों तक उनकी पहुंच का न होना और परिवार के मुखिया पर उनकी आर्थिक निर्भरता| इस तरह अलग-अलग पैंतरों के ज़रिए महिलाओं से पितृसत्ता में उनकी सहमति उगलवा ली जाती है| इस आधार पर यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि पितृसत्ता सिर्फ एक वैचारिक व्यवस्था नहीं है बल्कि इसका भौतिक आधार भी है|

पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है| वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है|

पितृसत्ता के काम करने का ये तरीका पहले महिलाओं को दो अलग-अलग खेमे (‘अच्छी’ – जो कि पितृसत्ता को सहयोग देती है और ‘बुरी’ – जो कि पितृसत्ता को सहमति नहीं देती है) में बांटकर इनदोनों के बीच कभी खत्म न होने वाले प्रतिस्पर्धा का खेल शुरू कर देता है|

पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है|

भारत में है ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज

भारतीय समाज को पितृसत्ता की व्यवस्था के तहत ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज कहा जाता है क्योंकि यहाँ का समाज जाति-व्यवस्था पर आधारित है|

पितृसत्तात्मक व्यवस्था की यह ख़ासियत रही है कि यह समाज के हर सदस्य को एक बराबर न मानकर ऊँचा या नीचा मानता है| इस तरह पितृसत्तात्मक व्यवस्था लोकतान्त्रिक मूल्यों के हमेशा विपरीत रही है|  इसमें जाति,  लिंग,  वर्ण, वर्ग, धर्म जैसे भेद से ऊपर “एक व्यक्ति, एक मत” के सिद्धांत को अपनाकर मानवीय गरिमा को सबसे ऊपर माना गया है|

औरतों की रोजमर्रा की ज़िन्दगी में कहाँ है पितृसत्ता?

एक पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं हर पल पितृसत्ता के अलग-अलग रूपों से रु-ब-रु होती हैं| अब बात चाहे तरह-तरह के आधारों पर भेदभाव की हो या आज़ादी में बिना वजह कटौती और सुविधाओं में भारी कमी की हो – ये सभी पितृसत्ता के ही पहलू है| पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है| वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है| साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है|

महिला के अनुसार बदल जाते है पितृसत्ता के रूप

महिलाएं चाहे किसी भी जाति या वर्ग की हों पितृसत्ता समान रूप से उनकी ज़िन्दगी को कठिन बनाती है| जैसे – अगर कोई महिला कामकाजी नहीं है तो उससे ज्यादा से ज्यादा घरेलू काम करवाया जायेगा| वहीं अगर महिला कामकाजी है तो उस पर अधिक से अधिक पैसे कमाने का दबाव डाला जायेगा| यहाँ शोषण दोनों महिलाओं का होता है बस उनके तरीके अलग-अलग होते हैं| इसी तर्ज पर, महिलाएं जिस खास वर्ग, जाति, धर्म, राष्ट्र या कबीले से ताल्लुक रखती हैं, उनके अनुसार पितृसत्ता के शोषण-दमन के तरीकों में बदलाव आता है|

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