बात चाहे राजनीति की हो या समाज के दमित वर्ग की, इनमें ‘विशेषाधिकार’ और ‘उत्पीड़न’ शब्द का इस्तेमाल किये बिना इससे संबंधित मुद्दों पर बात कर पाना मुश्किल है| पर जब बात विशेषाधिकार या उत्पीड़न के मायने की हो तो हर बार हम उसे अपने-अपने तरीके से परिभाषित करते है| वास्तव में विशेषाधिकार का संबंध एक ऐसे अनर्जित लाभों के समूह से है जो समाज में एक विशिष्ट सामाजिक या जैविक समूह है और जो किसी भी ख़ास तरह के उत्पीड़न से पीड़ित नहीं है| अक्सर समाज में विशेषाधिकारों को इतना सामान्य तरीके से दर्शाया गया है कि लोग खुद अपने विशेषाधिकारों को पहचान नहीं पाते है| या यों कहें कि विशेषाधिकारों को समाज की प्रथाओं के ज़रिए इस तरह दमनकारी रूप में लोगों की ज़िन्दगी में शामिल किया जाता है कि वे खुद इनपर ध्यान नहीं दे पाते है| पर इससे उनके विशेषाधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है|

वहीं दूसरी तरफ दमन, विशेषाधिकार के मुकाबले बहुत आसान है खासतौर पर दमनग्रस्त लोगों के लिए। इसकी वजह से ऐसे दमनग्रस्त लोग मुख्यधारा से अलग हो जाते है जिनके लिए कोई संस्थागत सिस्टम नहीं होता है जो उनकी मदद कर सके| मुख्यधारा से अलग होना एक दमनग्रस्त इंसान को हरपल अपने साथ हुए दमन का एहसास दिलाता रहता है, जबकि विशेषाधिकारी इंसान मुख्यधारा में अपना कब्जा कायम रखता है और अक्सर उन्हें इस बात का एहसास भी नहीं होता|

विशेषाधिकार का संबंध एक ऐसे अनर्जित लाभों के समूह से है|

विशेषाधिकार एक ऐसी व्यवस्था है जो पीढ़ी शक्ति, जातिवाद या सक्षमता जैसी दमनकारी ऊर्जा प्रणालियों की खामियों का सामना नहीं करती है। यह उस समूह को बेहद व्यवस्थित ढंग से और भी शक्तिशाली बनाता है| इस अवधारणा को पैगी मैकिंतोश ने अपने लोकप्रिय निबंध ‘व्हाइट प्राइवेज : अनपैकिंग द इनजेबल नॉपकॉक’ में बनाया जिसमें उन्होंने सफ़ेद त्वचा की वजह से दी गई चीज़ों के उदाहरणों को सूचीबद्ध किया| इसमें वह कहती है कि एक सफेद इंसान के तौर में मुझे एहसास हुआ कि मुझे नस्लवाद के बारे में सिखाया गया है  जो कि दूसरों को नुकसान में डालता है| लेकिन मुझे अपने लाभ के पहलुओं यानी कि ‘सफेद विशेषाधिकार’ के तहत उन नुकसानों को न देखना सिखाया गया है| उच्च वर्ग, ऊंची जाति, निष्पक्ष-चमड़ी महिला के रूप में मेरा जन्म तमाम विशेषाधिकारों के साथ हुआ था|  हम जब कभी भी अपनी शक्ति संरचना के बारे में सोचते हैं तो यह पाते हैं कि हमारी पहचान के लिए ज़रूरी विशेषाधिकार हमारी शक्ति के तौर पर हमपर हावी होते है| इस लेख के ज़रिए हम उन विशेषाधिकारों की चर्चा करेंगे जो जन्म से हमें वो स्वरूप देते है जो वास्तव में हम अपने जन्म के समय नहीं होते हैं|

विशेषाधिकार को स्वीकार करना एक असहज प्रक्रिया है|

विशेषाधिकारी ‘मैं’

समाज में हमारा जन्म कई विशेषाधिकारों के साथ होता है| इन्हीं विशेषाधिकारों में कुछ विशेषाधिकार हैं –

जाति विशेषाधिकार  

जाति-व्यवस्था यानी कि जन्म पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था जिसे आप चाहकर भी नहीं बदल सकते| नतीजतन यह आपकी पहचान बनती जाती है| एक ऐसी पहचान जिसके आधार पर आपके काम, संस्कार, जीवनशैली यहाँ तक की कई बार शारीरिक संरचना तक को मापा जाता है| जैसे – अगर आप ऊंची जाति से ताल्लुक रखते हैं तो गोरा रंग, स्वस्थ शरीर, पैसा और शोहरत या यों कहें कि समाज में अच्छे कहे जाने वाले गुण आपके हिस्से में होंगे| इस आधार पर हम यह कह सकते है कि जाति के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकार कहीं न कहीं इंसान के अस्तित्व की बजाय उस जाति के आधार पर न केवल आँका जाता है बल्कि उनके मानक के आधार पर ज़िन्दगी गुजारने के लिए भी मजबूर किया जाता है|

और पढ़ें: इंटरसेक्शनल फेमिनिज्म: शक्ति के सीमित दायरों और दमन के विस्तार का विश्लेषण

वर्ग विशेषाधिकार

वर्ग यानी कि आर्थिक प्रस्थिति पर आधारित विशेषाधिकार| इसे उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है कि अगर हमारा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ है जहाँ पैसे की कोई कमी नहीं है, ऐसे में हमारे ऊपर कभी-भी पढ़ाई पूरी करने के बाद खुद का पेट पालने के लिए रोजगार तलाशने का दबाव नहीं दिया जाएगा| वहीं दूसरी ओर, किसी मजदूर के घर जन्म लेने वाले बच्चे का जीवन पैसे को लेकर तमाम तरह के संघर्षों के भरा होता है| पर अमीर घर में जन्में बच्चे को इस तरह के किसी भी संघर्ष का सामना करने की बजाय अपने सपनों को पूरा करने के लिए खुला आकाश दिया जाता है, जहाँ उसे पैसों के लिहाज से कभी कोई कमी नहीं होने दी जाती है, ऐसी परिस्थिति में अमीर घर के बच्चे का ओहदा समाज में उसकी जाति की बजाय उसके पैसे के आधार पर ऊंचा हो जाता है और वह अमीरों के एक वर्ग में शामिल हो जाता है जिन्हें उनके अधिक पैसे के आधार पर कुछ विशेषाधिकार मिले होते, यही वर्ग विशेषाधिकार कहलाता है|

धार्मिक विशेषाधिकार 

मेरा जन्म हिन्दू परिवार में हुआ है| चूँकि हमलोग एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ मुस्लिम धर्म के किसी भी इंसान को बेहद आसानी से आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है, ऐसे में मैं हिन्दू होने के नाते इस समस्या के बच सकती हूँ| धर्म के आधार इस तरह मेरा बचना ही धार्मिक विशेषाधिकार कहलायेगा| यानी कि धर्म के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकार|

योग्यता विशेषाधिकार 

मैं मानसिक और शारीरिक रूप से कोई भी काम करने के लिए सक्षम हूँ| ये मेरी योग्यता है जिसके आधार पर कभी भी मुझे किसी तरह के दमन का शिकार नहीं होना पड़ा| पर दुनिया में हर इंसान मेरी तरह सक्षम हो ये ज़रूरी नहीं है| हो सकता है वो अपने पैरों पर चल पाने में असक्षम हो जिसके लिए उसे व्ह्वीलचेयर का सहारा लेना पड़ता हो| या फिर उसे कोई और मानसिक या शारीरिक समस्या हो| ऐसे में उन लोगों के लिए मंदबुद्धि, लंगड़ा या पागल जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके उनका मजाक उड़ाना या फिर उनकी असक्षमता की वजह से उन्हें परेशान करना हमारा योग्यता विशेषाधिकार कहलाता है| इसके तहत हम अपनी योग्यता का इस्तेमाल करके दूसरे का दमन करने की कोशिश करते है|

सिसजेंडर विशेषाधिकार

मैं एक सीआईएस-महिला हूँ| इसका मतलब यह है कि जिस शरीर के साथ मैं पैदा हुई थी मैं उस लिंग को पहचानती हूँ| किसी भी फॉर्म में महिला या पुरुष के कॉलम को भर पाना आसान है, क्योंकि मैं अपने लिंग को पहचानती हूँ| पर वहीं दूसरी ओर किसी समलैंगिक इंसान के लिए इस कॉलम को भर पाना मुश्किल होगा क्योंकि वह अपने आपको इनदोनों आप्शन में नहीं पाता है| ऐसे में हम अपने सिसजेंडर के आधार पर विशेषाधिकारी कहलायेंगे क्योंकि हमें वह कॉलम भरते हुए उस परेशानी का सामना नहीं करना पीडीए जो किसी समलैंगिक इंसान के कर पाना मुश्किल है, यह सिसजेंडर विशेषाधिकार कहलायेगा|

हम अपने विशेषाधिकारों के साथ जन्म लेते है और इसे बदला भी नहीं जा सकता है|

पुरुष विशेषाधिकार 

पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष को जन्म से ही औरतों की अपेक्षा अधिक मूल्यवान होने का एहसास करवाया जाता है| इसके तहत उन्हें घर से लेकर सड़कों और यहाँ तक की कार्यस्थल तक बलात्कार, उत्पीड़ित या यौन दुर्व्यवहार होने की संभावना बहुत कम होती है। बल्कि इसके विपरीत वे महिलाओं में इन हिंसाओं का शिकार बनाते है| सरल शब्दों में कहा जाए तो पुरुष होने के नाते उन्हें मिलने वाले हर अधिकार विशेषाधिकार होते है और जिनका इस्तेमाल वे दूसरों (खासकर महिलाओं) के दमन के लिए करते है| यह पुरुष विशेषाधिकार कहलाता है|

विशेषाधिकारों की इतनी परतें हैं कि हर दूसरा इंसान किसी न किसी आधार पर विशेषाधिकारी होता है और वह जाने-अनजाने में अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल दूसरों के दमन के लिए करता है| विशेषाधिकार को स्वीकार करना एक असहज प्रक्रिया है| हो सकता है आप अपने आपको दोषी महसूस करें या फिर अपनी रक्षा के लिए ज़रूरी समझे| हम अपने विशेषाधिकारों के साथ जन्म लेते है और इसे बदला भी नहीं जा सकता है| लेकिन जब समाज में प्रथा या चलन का अनुसरण करते हुए अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल दूसरों के दमन के लिए करते है तो यह एक समस्या बन जाता है|

Also read: Privilege 101: Your Handy Primer To Oppression And Privilege

Leave a Reply