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महिला सशक्तिकरण के विषय पर बड़ा मंच सजा था शहर में| प्रसिद्ध  महिला वक्ताओं को आमंत्रित किया गया| खूब बातें हुई| पर एकबात जो सबकी बातों में आम रही वो थी – ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है’ वाली कहावत| बातों में कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, लैंगिक भेदभाव और तमाम महिला हिंसा पर चर्चा हुई और सभी के केंद्र में थी महिलाएं| पीड़िता और अपराधी दोनों ही भूमिका में|

औरत ही औरत की दुश्मन होती है – ये बात हम बचपन से ही मज़ाक से लेकर गंभीर घटनाओं में सुनते हैं| महिला हिंसा या भेदभाव की कोई भी बात हो हमारे घर-समाज में बेहद आसानी से इस कहावत को दोहराया जाता है| इतना ही नहीं अक्सर कुछ रिश्तों को इन कहावतों की पुष्टि के लिए बकायदा इस्तेमाल भी किया जाता है| भाभी-ननद का रिश्ता, सास-बहु का रिश्ता या देवरानी-जेठानी का रिश्ता ऐसे सभी रिश्तों की मिशाल के तौर पर कहा जाता है कि ये रिश्ते जीवंत उदाहरण है इस बात के कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है|

ये तो बात हुई चलन की जो सदियों से महिलाओं के संदर्भ में हमारे समाज का हिस्सा रही है| पर असल में कहूँ तो ऐसा नहीं है| ये बात पूरी तरह से गलत है| कैसे? आइये जानते हैं|

औरत के खिलाफ ‘डिवाइड एंड रूल’ की नीति

हाल ही में, जब मैं एक डिग्री कॉलेज में महिला मुद्दों पर एक कार्यशाला के लिए गयी तो चर्चा की शुरुआत ही इस कहावत से हुई| महिला हिंसा के संदर्भ में जब एक लड़की ने बोला कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है| वही महिला हिंसा में अहम भूमिका अदा करती है| इसपर मैंने एक छोटी-सी एक्टिविटी के माध्यम से इस पहलू पर उनके विचारों के द्वार खोलने की कोशिश की| मैंने एक कुर्सी के लिए दस पुरुष दावेदारों को खड़ा किया और सभी को कहा कि ‘ये कुर्सी आपकी है|’ लाजमी था उन सभी में से कोई भी कुर्सी में बैठने की बजाय एक-दूसरे को हटाने की फ़िराक में लग गये|

औरतों को आपस में बांटने की गलती जानबूझकर सदियों से लगातार दोहरायी गई है|

इसके बाद मैंने लड़कियों से यही कहा कि देखो ये है सत्ता का खेल| जब एक घर का पुरुष मुखिया अपने घर में माँ, बहन, बेटी, पत्नी, बहु और तमाम महिला रिश्तों के नामपर घर में सत्ता की दावेदारी खड़ी करता है तो आपसी कलह होना स्वाभाविक है और इसकी जगह अगर पुरुष भी होगा तो बात वही होगी| पैतरे और चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन मूल एक होता है – सत्ता को पाने की ललक| इसमें आपसी द्वेष का पनपना भी लाजमी है|

इसी तर्ज पर, अगर सरल शब्दों में कहूँ तो कभी इस वक्तव्य (औरत ही औरत की दुश्मन होती है|) के मूल का अनुसंधान या समाजशास्त्रीय शोध किया जाए तो इस अन्वेषण पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ब्रिटिश शासननुमा कूटनीति के तहत इस तरह के वक्तव्यों से औरतों को ‘डिवाइड एंड रुल’ की साजिश का शिकार बनाना ही किसी खुराफाती पुरुष के दिमाग की उपज रही है|

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अब सवाल यह है कि क्या कभी आपने ‘पुरुष ही पुरुष का दुश्मन है’ जैसा कोई तयशुदा वक्तव्य सुना है? क्या सहकर्मी पुरुष ईर्ष्या-द्वेष और गला-काट प्रतिस्पर्धा के शिकार नहीं होते? क्या बाप-बेटे या भाई-भाई के बीच भीषण तकरार कभी-कभी मारपीट या खून-खराबे में तब्दील नहीं हो जाती? फिर एक-दूसरे की जड़ें काटने की यह तोहमत सिर्फ औरत पर क्यों?

साजिश औरतों को आपस में लड़ाने की

ज़ाहिर है कि यह तोहमत बिला वजह नहीं लगाई गई है| इस तथाकथित वक्तव्य को बार-बार दोहराने वाले इस वक्तव्य की प्रमाणिकता पर मोहर लगाने के लिए औरत के जिन संबंधों को सूली पर चढ़ाते हैं वह है – सास-बहु या ननद-भाभी का रिश्ता|  इसके बारे में यह तर्क दिया जाता है कि वह औरत, जो की प्रताड़नाओं को भूलकर, हुक्मरा हो जाती है और घर आई एक नई लड़की के साथ ऐसा जालिमाना सलूक करने लगती है कि उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि औरत ही औरत की दुश्मन है|

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इस सुलूक का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो यह तथ्य बहुत साफ़ समझ में आता है कि इस व्यवहार की वजह सास का औरत होना या बहु का उसकी हमजाति होना कतई नहीं है| यह सीधे-सीधे शोषक और शोषित का रिश्ता है| बरसों से दमित-दलित-प्रताड़ित एक औरत के हाथ जैसे ही सत्ता आती है, वह सत्ताधारी शोषक का प्रतिरूप बन जाती है| यह कुछ उसी प्रकार का रवैया है जिसमें दलितों के हक में लड़ने वाला एक दलित नेता सत्ता की कुर्सी पाते ही अपना दलित तबका भूल जाता है और सत्ताधारियों की ज़ुबान बोलने लगता है और उनके बीच उठने-बैठने में अपनी शान समझता है|

पैतरे और चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन मूल एक होता है – सत्ता को पाने की ललक|

प्रसिद्ध बंगला कथाकार आशापूर्णा देवी की एक बेहद खूबसूरत कहानी है – ‘अनावृत्ता’ (जिस पर एनएफडीसी सेएक फीचर फिल्म भी बन चुकी है) जिसमें एक औरत सारी ज़िन्दगी चुप रहकर अपने पति की हर बात मानती है, पर जब वह देखती है कि उसका अपना बेटा अपने बाप के साथ मिलकर घर छोड़कर चली गई उसकी बहु के खिलाफ़ मुकदमा दायर कर रहा है और उस साजिश में उसके पांच साल के पोते को भी शामिल कर रहा है तो वह अपनी स्थिति को पहचानती है और अपनी बहु के पक्ष में जा खड़ी होती है| उसका पति और बेटा कहता हैं कि इस उम्र में इस औरत का दिमाग खराब हो गया है, जो वह घर छोड़कर चली गई पराई लड़की की हिमायत कर रही है| पर वह अपने दृणनिश्चय पर अटल रहती है| वह कहती है – ‘मैंने बहुत सोच-समझकर ही निर्णय लिया है| तुम दोनों के साथ तो कोर्ट-कचहरी है| पूरी दुनिया तुम्हारे साथ है उसके साथ तो सिर्फ मैं हूं|’

यह एक समझदार औरत का दूसरी औरत के हक में खड़ा होना है| ऐसे उदाहरण कहानियों में ही नहीं, ज़िन्दगी में भी सैकड़ों मिल जायेंगे|

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औरत ही औरत दुश्मन नहीं बल्कि सच्ची हमदर्द होती है

औरत ही औरत की सच्ची हमदर्द है – साथिन है, सहेली है, इसलिए औरतों को एकजुटहो कर रहना चाहिए| ‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ जैसे हाथों में थमाए हुए गलत झुनझुने को बजा-बजाकर औरतों को आपस में बांटने की गलती जानबूझकर सदियों से लगातार दोहरायी गई है| इसलिए अब यह जिम्मेदारी हम सभी महिलाओं की है कि हम इस जुमले को अपने शब्दकोश से बाहर निकाल दें, क्योंकि इस बदलाव की शुरुआत हमें खुद से करनी होगी| वरना पितृसत्ता यह कभी नहीं चाहती कि महिलाएं एक-दूसरे को लेकर अपनी उलझनों को दूर कर एकजुट हों|

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तस्वीर साभार : TheQuint 

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