दुर्गा अष्टमी के दिन प्रतिष्ठित हिंदी अखबार ने भारतीय संस्कृति में महिलाओं के नामपर महिमामंडित इस दिन को आधुनिक चोला पहनाया और ‘नारी सशक्तिकरण’ के मुद्दे पर शहर की जानी-मानी महिलाओं के साथ परिचर्चा का कार्यक्रम आयोजित किया था| यों तो आजकल हर दूसरे मीडिया ग्रुप की तरफ से ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन आम है, जो वास्तव में मीडिया की टीआरपी और लोगों के साथ विशेष गोलबंदी का भी एक प्रमुख जरिया है| मुझे भी इस परिचर्चा में शामिल होने का आमन्त्रण मिला और मैं इस परिचर्चा की हिस्सा बनी|

भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाज में पितृसत्ता के विचारों से उबरना काफी मुश्किल है|

कार्यक्रम में करीब पच्चीस से तीस महिलाओं ने हिस्सा ने लिया था| कई चेहरे मेरे लिए अनजान थे| पर जैसे-जैसे परिचय और विचारों को रखने का दौर चला तो बहुत कम समय में सभी से परिचित हुई| इस चर्चा में अधिकाँश महिलाएं समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़ी हुई थी या कुछ ऐसी महिलाएं थी जिन्होंने अपने काम के ज़रिये समाजसेवा शुरू की थी| इस चर्चा में सभी महिलाओं ने नारी सशक्तिकरण पर अपने विचार रखे और उन सभी की बातों में जो आम था वो ये कि –

‘नारी अपने आप में बेहद सशक्त है|’….‘पुरुष महिला के खिलाफ होने वाली हिंसा के जिम्मेदार है|’ …. और गजब की बात ये रही कि इन बातों के बाद अधिकतर महिलाओं ने ये कहा कि ‘पर आज हम जो भी है अपने पति की बदौलत है|’ बातों-विचारों के इन उतार-चढ़ाव से आप इस परिचर्चा की रुपरेखा का अंदाज़ा बखूबी लगा सकते है|

और पढ़ें : देवी की माहवारी ‘पवित्र’ और हमारी ‘अपवित्र?’

लेकिन इस कार्यक्रम के ज़रिये एक और पहलू मैंने देखा जो मेरे लिए बिल्कुल नया और स्तब्ध करने वाला था| हुआ कुछ यों कि कई महिलाओं के विचारों के बाद एक डॉ साहिबा की बारी आई| मौजूदा समय में डॉ शिप्रा धर श्रीवास्तव जी बनारस की जानी-मानी डॉक्टर है क्योंकि वो लड़की पैदा होने पर डिलीवरी चार्ज नहीं लेती है, इसीलिए प्रतिष्ठित भी| मुझे उम्मीद थी कि उनके विचार सभी से अलग और तार्किक होंगें| पर इसके विपरीत उन्होंने बकायदा कई बिन्दुओं पर अपने विचार रखने का सिलसिला जब शुरू किया तो उनके हर शब्द मेरे लिए अविश्वसीय और सारी उम्मीदों को ढेर करने वाले थे| कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर उनके विचार आपसे साझा करती हूँ –

‘कई बार जब मैं पैदा होने वाली लड़कियों की संख्या देखती हूँ तो लगता है कि सरकार को कहीं बेटा बचाओं अभियान न चलाना पड़ जाए|’….

‘कुछ लड़कियां वाकई ऐसे कपड़े पहनती हैं कि हमलोग झेंप जाते है| फिर लड़के भला क्यों न आकर्षित हो|’….

‘पीरियड के दौरान मन्दिर न जाना और अन्य पाबंदियां महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए ही बनाई गयी| इन सभी का बकायदा जिक्र हमारी संस्कृति में है, जो सही भी है|’….

इन सभी बातों पर कई सवाल किये जा सकते है| पर दुर्भाग्यवश कार्यक्रम में मौजूद सभी (जिसमें मीडियाकर्मी भी शामिल हैं|) चुप रहे| जब मैंने इन पहलुओं पर बात शुरू की तो मुझे एकसाथ सभी का विरोध झेलना पड़ा| मैंने अपनी बात पूरी की, ये जानते हुए भी कि इसका कोई असर नहीं होने वाला है| याद रहे कि ये विचार उस महिला डॉक्टर के थे, जो लड़कियों के पैदा होने पर पैसे न लेकर खूब नाम कमा रही हैं| लेकिन वहीं दूसरी तरफ बुरी तरीके से पितृसत्ता और स्त्रीद्वेष से पीड़ित है| महिला डॉक्टर के ऐसे विचार हर बार हमारी शिक्षा व्यवस्था और समाजकार्य के मानकों पर सवाल खड़े करते हैं|

लोगों के विचारों को एक समय और ओहदे पर आने के बाद बदलना बेहद मुश्किल हो जाता है|

स्त्रीद्वेष से पीड़ित रहकर ‘नारी सशक्तिकरण’ कभी नहीं होगा

भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाज में पितृसत्ता के विचारों से उबरना काफी मुश्किल है| इसके बावजूद हमें समझना होगा कि जब आप महिला-हित या नारी सशक्तिकरण की दिशा में कोई भी प्रयास करते हैं तो ‘ऐसी लड़की-वैसे लड़की’ वाले विचारों से कहीं-न-कहीं महिलाओं को आपस में बांटने का काम करते हैं और ये कुछ हो या न होने ‘महिला सशक्तिकरण’ तो नहीं हो सकता है| वास्तव में मौजूदा समय में ऐसे विचार महिला के खिलाफ बेहद बारीकी से अपना काम कर रहे हैं| इस स्त्रीद्वेष का असर समाज के हर तबके में देखा जा सकता है, जिसमें #MeToo अभियान पर पत्रकार तवलीन सिंह के विचार भी जीवंत उदाहरण है| इनके माध्यम से हम देख सकते हैं कि किस तरह ये महिलाओं के हर प्रयासों को अंदर ही अंदर खोखला करने लगता है|

हर महिला-हिंसा को संस्कृति से जोड़ने की आदत – बदल दीजिये

कार्यक्रम में बहुमत विचारों की सहमति ये भी थी कि पीरियड के दौरान महिलाओं पर लगाई जाने वाली पाबंदियां सही है और हमारी संस्कृति का हिस्सा भी| ऐसे विचार रखने वालों लोगों से यही कहूंगी कि आधुनिकता के इस दौर में कम से कम अब तो आप संस्कृति का महिमामंडन चलन की बजाय प्रमाणित तर्कों पर आधारित कीजिए| साथ ही, हर पाबंदी और महिला-विरोधी को अगर हम अपनी संस्कृति का हिस्सा मान लें तो फिर महिला हित की हर बात ही खत्म हो जाए| क्योंकि अपने पितृसत्तात्मक समाज का हर हिस्सा महिलाओं के लिए हिंसा, विरोध और दमन का ही किस्सा रहा है|

मैं मानती हूँ कि लोगों के विचारों को एक समय और ओहदे पर आने के बाद बदलना बेहद मुश्किल हो जाता है| पर ज़रूरी है कि महिला हित के नामपर – बलात्कार के लिए महिला के कपड़ों को दोष देने वाले जैसे स्त्रीद्वेष से पीड़ित विचारों की आलोचना हो फिर वो किसी महिला की तरफ से हो या किसी अन्य की तरफ से| उल्लेखनीय है कि इस पूरी चर्चा के दौरान मीडिया के साथी वहां मौजूद थे लेकिन इसके बावजूद अगले दिन के अखबार में सभी महिलाओं के विचारों के साथ डॉ साहिबा के भी पढ़ने में अच्छे लगने वाले विचार मीडिया साथियों ने चुनकर-सजाकर प्रकाशित किये| यहाँ मीडिया की भूमिका भी कई सवाल खड़े करती है, जिसपर गौर करना ज़रूरी है|

जब भी कोई इंसान समाज में प्रतिष्ठित माना जाने लगता है तो कहीं-न-कहीं वो समाज का आईना बन जाता है, जो दूसरे के विचारों को भी प्रभावित करता है| ऐसे में ज़रूरी है कि हमें अपने प्रतिष्ठा के मानकों की जांचकर उस इंसान के विचारों का विश्लेषण करना चाहिए| मीडिया जो खुद समाज को आईना दिखाती है, अगर वो समाज को ऐसे चेहरे दिखायेगी तो असल मायनों में कभी भी आधी आबादी को आधा क्या एक-चौथाई हिस्सा भी नसीब नहीं होगा|

और पढ़ें : खबर अच्छी है : सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का फ़ैसला और पितृसत्ता की सड़ती जड़ें

Leave a Reply