सावित्रीबाई फुले: ज़माने को बदला अपने विचारों से

सावित्रीबाई फुले: ज़माने को बदला अपने विचारों से

ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने दलितों को शिक्षा में हिस्सेदार बनाया। दलित लड़कियों के लिए ज्योतिबा ने स्कूल खोला। इसमें टीचर बनीं सावित्रीबाई। 1848 से 1851 तक ऐसे 18 स्कूल खोले गए।
Toxic Lives: When Enough Is Enough चुनरी में दाग भर से तय नहीं होता 'चरित्र'

चुनरी में दाग भर से तय नहीं होता ‘चरित्र’

पितृसत्तात्मक समाज में जब बात महिलाओं की हो, तो उनका भूगोल देह और ‘चरित्र’ के इर्द-गिर्द ही चक्कर लगाता दिखाई पड़ता है।
पता है तुम्हें कि तुम कितनी सुंदर हो?

पता है तुम्हें कि तुम कितनी सुंदर हो?

अपनी ज़िंदगी के लिए सिर्फ दो शब्द हमेशा कायम रखो- ‘तुम सुंदर हो’ देखना फिर, ये दुनिया कैसे सुंदर हो जाएगी। बस तुम आगे बढ़ती जाओ।
इंटरनेट पर हर पल होती है आधी दुनिया के साथ यौन हिंसा

इंटरनेट पर हर पल होती है आधी दुनिया के साथ यौन हिंसा

आज जब ये गैंग रेप जैसी अमानवीय यौन हिंसा पर मजे ले सकते हैं, तो कल ये ऐसा सच में होते हुए देख कर भी चुप ही रहेंगे।
एक थी अमृता

एक थी अमृता: पंजाबी की पहली लेखिका

अमृता प्रीतम के लेखन में नारीवाद और मानवतावाद दो मुख्य विषय रहे है, जिसके जरिए उन्होंने समाज को यथार्थ से रू-ब-रू करवाने का सार्थक प्रयास किया।
मंटो की वो अश्लील औरतें

मंटो की वो अश्लील औरतें

ऐसे ही झंझावतों वाले दौर में हिंदुस्तानी साहित्य में एक ऐसे सितारे का उदय हुआ, जिसने अपनी कहानियों से अपने समय और समाज को नंगा सच दिखाया। इस लेखक का नाम था- सआदत हसन मंटो।
हैप्पी डेज में बदल डालो पीरियड्स के उन पांच दिनों को

हैप्पी डेज में बदल डालो पीरियड्स के उन पांच दिनों को

आज भी शिक्षित लड़कियां सेनेटरी नैपकिन पिता या भाई से मंगवाने से हिचकती हैं। पीरियड्स के बारे में बताना तो बहुत दूर की बात है।
इस्मत चुगताई का सेक्सी ‘लिहाफ’

इस्मत चुगताई का सेक्सी ‘लिहाफ’

इस्मत चुगताई उर्फ ‘उर्दू अफसाने की फर्स्ट लेडी’ ने महिला सशक्तीकरण की सालों पहले एक ऐसी बड़ी लकीर खींच दी, जो आज भी अपनी जगह कायम है।
ब्रा

मेरी ब्रा की स्ट्रेप या सेनेटरी नैपकीन देखकर आपको शर्म आती है?

ऐसी सूरत में सलोनी की बात बेहद सटीक लगती है कि "जिंदगी एक ब्रा की तरह हैl" जिसमें न जाने कितनी बुराइयां ढकी हुई है। और जब आज के दौर की युवतियां उन्हें उघाड़ती है, तो समाज को शर्म अती है। तो क्यों न इस समाज को शर्मिंदा होने पर ही मजबूर किया जाए। सच में शर्म हमें नहीं, उन्हें आनी चाहिए।
नारीवाद

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

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Crowds in hundreds gathered in about 30 cities and towns of India to come together for #IWillGoOut marches.
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What Women Want! Protest Marches By Women In India And USA On January 21

Women in India and USA are going on protest marches. Here's all that you need to know and march with them!
Why Women In India Are Marching On January 21? #IWillGoOut

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As women from a dozen cities prepare for a nation-wide march triggered by the appalling stories of mass molestation in Bengaluru, we protest not only the right of a woman to loiter in public, but also the impunity with which they are seen as “fair game” when they choose to own the streets. #IWillGoOut