महेंद्र बिहार के बेगूसराय का रहने वाला है| घर का एकलौता बेटा महेंद्र इनदिनों दिल्ली यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र से पीएचडी कर रहा है| समाज की संरचना और उससे जुड़ी तमाम समस्याओं और मुद्दों पर उसकी अच्छी-खासी समझ है, जिनपर वह लगातार लेख लिखता है| पर छुट्टियों में जब महेंद्र अपने गाँव आता है तो घर-परिवार और समाज की हालात देखकर वो अपने-आप को हारा हुआ महसूस करता है| महेंद्र की तीन बहनें है| बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और बाकी की दो बहनों की शादी करनी है| कई जगह रिश्ते की बात चल रही है पर कहीं भी शादी तय नहीं हो पा रही और इसकी वजह है ‘दहेज|’

शादी के नामपर लड़के वाले अपने बेटे को मछलीबाज़ार में बिकने वाली मछली की तरह इस्तेमाल करते है|

किसान परिवार का महेंद्र और उसके पिता जब कभी-भी रिश्ते की बात करने जाते है तो हर बार बात दहेज़ पर अटक जाती है| लड़का इंटर पास हो तो दहेज का रेट पांच लाख, ग्रेजुएशन किया हो तो आठ लाख, दुकानदार होतो दस से बारह लाख और अगर किसी नौकरी में होतो पन्द्रह लाख से बात शुरू होती है| इसके बाद, सोने के गहने, सारे रिश्तेदारों के कपड़े, घर के लिए ढ़ेरों बर्तन-समान और पांच सौ से अधिक बरातियों का धूमधाम से स्वागत अलग से| महेंद्र लाख दहेज प्रथा पर लेख लिखे और सेमिनारों में पेपर प्रजेंट करें लेकिन जब बात अपने घर की आती है तो वह कुछ भी नहीं कर पाता है| चूँकि बहनें हमेशा से गाँव के परिवेश में रही है इसलिए उनकी शादी ज्यादा दूर करना किसी भी लिहाज से घरवालों को ठीक नहीं लगता है और बात ये भी है कि गाँव की लड़की को शहर में रहने वाला लड़का पत्नी बनाने से रहा| शादी के नामपर लड़के वाले अपने बेटे को मछलीबाज़ार में बिकने वाली मछली की तरह इस्तेमाल करते है|

यों तो ये किस्सा देश के करीब हर क्षेत्र का है लेकिन इस मामले में बिहार की हालत कुछ ज्यादा ही संजीदा है| ये कहानी और परेशानी सिर्फ गाँव या शहर की नहीं या फिर महेंद्र की ही नहीं मेरे जैसे कई युवाओं की है जिनके कंधे पर बहन की शादी करवाने की जिम्मेदारी है| बिहार में दहेज प्रथा के इस प्रचलन का का सीधा प्रभाव लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है| लोग अपनी बेटियों को इसलिए ज्यादा नहीं पढ़ाते है कि अगर लड़की ज्यादा पढ़-लिख लेगी तो उसके लिए उतना ही पढ़ा-लिखा दूल्हा खोजना होगा, जिसकी दहेज ही मांग और भी ज्यादा होगी| साथ ही, अक्सर वे दहेज के बोझ से बचने के लिए अपनी बच्चियों का बाल-विवाह तक करवा देते है|

गैर-क़ानूनी दहेज समाज के लिए ज़रूरी है

संविधान में दहेज प्रथा को गैर-क़ानूनी माना गया है और इसके लिए बकायदा सजा का भी प्रावधान है| लेकिन इन सबके बावजूद समाज में लोगों ने इसे मान्यता दे रखी है| आज भी दहेज की मोटी रकम लोगों के लिए उनके ऊंचे स्टेट्स का सिम्बल है| कई बार दहेज न लेना अस्वस्थ शादी का लक्षण मान लिया जाता है| मेरे एक मित्र ने जब अपनी शादी में किसी भी तरह से दहेज लेने से इनकार कर दिया तो ये बात लोगों को हज़म नहीं हुई और उन्होंने इस बात पर संशय करना शुरू दिया कि लगता है लड़के में कोई खोट (कमी) है तभी ये लोग दहेज नहीं ले रहे है|

वास्तविकता यह है कि दहेज को हमलोग कभी भी गैर क़ानूनी नहीं मानते है| अगर कोई अपनी बहन या बेटे की शादी का न्योता लेकर हमारे घर आता है तो हम बड़ी शान से पूछते है कि दहेज में क्या लिया या फिर मांग है लड़के वालों की और आस-पड़ोस से लेकर पूरे नाते-रिश्तेदारों तक शादी से बाद बच्चे पैदा होने तक सभी की बातचीत का मुद्दा सिर्फ दहेज की लेन-देन होता है| इसी के आधार पर लड़की और लड़के में दोष निकाला जाता है| हर अच्छी और बुरी बात को सिर्फ दहेज से चश्मे से देखा जाता है|

‘दहेज की मूल जड़ सामन्ती मिजाज है’

बिहार में दहेज प्रथा के बारे में समाजशास्त्री डीएम दिवाकर मानते हैं कि बिहार में दहेज और बाल विवाह जैसी कुरीतियों की जड़ यहां के सामंती मिजाज में हैं। इसके बीज अंग्रेजी राज के स्थायी बंदोबस्त वाले इलाकों में ज्यादा अंकुरित हुए। समय के साथ फैले और फसल आज भी बोई-काटी जा रही है। धर्मशास्त्र की आड़ लेने वाले भी हैं, जो कहते हैं दस-ग्यारह की उम्र तक बच्ची गौरी-पार्वती रहती है और रजस्वला होते ही उसकी शादी कर देनी चाहिए। यह पुरातनपंथी सोच है। उस समय की जब विज्ञान नहीं था। विज्ञान ने इस सोच को ही तर्कहीन बना दिया है। पहले तो महिलाओं के हाथ में ही सत्ता थी। धीरे-धीरे उन्हें उत्पादन व्यवस्था से पीछे ढकेला गया।

वास्तविकता यह है कि दहेज को हमलोग कभी भी गैर क़ानूनी नहीं मानते है|

एंगेल्स के मुताबिक महिलाओं को पहले खेती से अलग कर पशुपालन तक सीमित किया गया, फिर चूल्हे तक और फिर बच्चे संभालने तक। यह विकृति पुरुषों ने ही पैदा की। लेकिन औद्योगिक क्रांति के दौर में मसल्स की ताकत मशीनों में रुपांतरित हुई तो महिला-पुरुष समानता की बहस छिड़ी। अठारहवीं  सदी से जोर पकड़ने लगी और यह लगातार आगे बढ़ रही है।

बिहार होगा अब दहेजमुक्त – नीतीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गांधी जयंती (2 अक्टूबर) को कहा कि शराबबंदी के बाद अब बिहार को दहेजमुक्त बनाया जायेगा। महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने के मौके पर सम्राट अशोक कन्वेंशन सेंटर के ज्ञान भवन में दो दिवसीय राष्ट्रीय विमर्श का उद्घाटन सीएम नीतीश कुमार ने किया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘बिहार में शराबबंदी के लक्ष्य को पूरा कर लिया गया है, अब हम सबको दहेजमुक्त बिहार बनाना है। सीएम नीतीश कुमार ने इसके लिए अभियान चलाने की बात कही।‘

बिहार में दहेज-प्रथा के वीभत्स रूप को देखते हुए इस सरकार का एक अच्छा और ज़रूरी कदम माना जा सकता है|

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि लोक संवाद में महिलाओं ने दहेज प्रथा और बाल विवाह रोकने का सुझाव दिया है। लिहाजा बिहार सरकार अब नशा मुक्ति के साथ-साथ दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाएगी।

नीतीश कुमार सामाजिक न्याय और जनजागरण के जरिए शराबबंदी की सफलता के बारे में अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि शराबबंदी के अभियान में यहां तक कि बच्चों ने भी साथ दिया, उन्होंने अपने अभिभावकों से शराब नहीं पीने के लिए संकल्प पत्र भरवाया। बिहार में शराबबंदी को लेकर एक करोड़ 19 लाख संकल्प पत्र भरे गये।

बिहार में दहेज-प्रथा के वीभत्स रूप को देखते हुए इस सरकार का एक अच्छा और ज़रूरी कदम माना जा सकता है| पर इसकी सफलता इसे लागू करने की नीति पर निर्भर करेगी क्योंकि यहाँ बदलाव कानून में नहीं लोगों की मानसिकता में करना है, जो अपने आप में एक कड़ी चुनौती है| साथ ही, यह भी ज़रूरी है कि इस दिशा में होने वाले सरकारी प्रयासों का प्रभाव शहर से लेकर गाँव तक हो| इस बात में कोई संदेह नहीं कि बिहार में शराबबंदी का अभियान एक हद तक काफी सफल रहा है| अगर दहेज की दिशा में भी ऐसे ही सशक्त कदम उठाये गये तो उम्मीद है कि ये भी सफल अभियान हो सकता है|

और पढ़ें : दहेज प्रतिबंध अधिनियम | #LawExplainers

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रामकिंकर ने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से बैचलर्स ऑफ़ आर्ट्स (ऑनर्स) फ्रेंच से अपनी बैचलर्स की डिग्री पूरी की| साहित्य-क्षेत्र से यू-टर्न लेते हुए इन्होंने महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ से बैचलर्स ऑफ़ लॉ की डिग्री पूरी की| सालभर बच्चों के अखबार ‘बालगुरु प्लस’ में बतौर रीजनल मार्केटिंग हेड काम करने के बाद इन्होंने अपने लिए समाजकार्य के क्षेत्र को चुना और मौजूदा समय में बनारस के ग्रामीण क्षेत्रों में जेंडर और महिला-स्वास्थ्य के मुद्दे पर काम कर रहे है|

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